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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 274

गीतावली २६८ पथिक रामको देखकर मयूर आनन्दित होकर नाचते हैं। वे सीतारामको देखकर मानो उन्हें बिजलीसहित सुन्दर मेघ समझते हैं तथा उनके धनुषको इन्द्रधनुष और उसके टंकारको मेघकी गर्जन जानते हैं ॥ १ ॥ सुन्दर-सुन्दर मोर अपने पिच्छसमूहको हिलाते हुए नाचते हैं और कोकिलशावक सुमधुर गान करते हैं। प्रभु जहाँ-जहाँ जाते हैं, वहीं-वहीं आनन्द दिखाया पड़ता है, इस प्रकार दण्डक वनमें कुछ कम कुतूहल नहीं है ॥ २ ॥ सघन वृक्षोंकी छायाके अन्धकारमें चाँदनी रातका भ्रम हो जानेसे चकोर प्रभुके मुखरूप चन्द्रमाकी ओर निहारने लगता है। तुलसीदासजी कहते हैं, इस समय मुनिजन भी पशु-पक्षियोंकी सराहना करते हैं और कहते हैं कि सारे सुकृत इन्हींके पक्षमें हैं ॥ ३ ॥ राग कल्याण [ २ ] सुभग सरासन सायक जोरे। खेलत राम फिरत मृगया बन, बसति सो मृदु मूरति मन मोरे ॥१॥ पीत बसन कटि, चारु चारि सर, चलत कोटि नट सो तृन तोरे। स्यामल तनु श्रम-कन राजत, ज्यों नव घन सुधा-सरोवर खोरे ॥२॥ ललित कंध, बर भुज, बिसाल उर, लेहिं कंठ-रेखें चित चोरे। अवलोकत मुख देव परम सुख, लेत सरद-ससिकी छबि छोरे ॥३॥ जटा मुकुट सिर, सारस-नयननि गौहैं तकत सुभौंह सकोरे। सोभा अमित समाति न कानन, उमगि चली चहुँ दिसि मिति फोरे ॥४॥ चितवत चकित कुरंग-कुरंगिनि, सब भए मगन मदनके भोरे। तुलसिदास प्रभु बान न मोचत सहज सुभाय प्रेमबस थोरे ॥५॥

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