गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६६ अरण्यकाण्ड भगवान् राम अपने सुन्दर धनुषपर बाण चढ़ाये वनमें मृगया खेलते फिर रहे हैं। वह मधुर मूर्ति मेरे हृदयमें निवास करती है ॥ १ ॥ उनकी कमरमें पीताम्बर और अति सुन्दर चार बाण हैं। उनकी चालको देखकर करोड़ों नट (नृत्यकार) मुग्ध होकर तण्ह तोड़ते हैं, [जिससे उस चालपर नजर न लगे]। प्रभुके श्याम शरीर- पर पसीनेकी बूंदें ऐसी शोभायमान हैं जैसे कोई नवीन मेघ अमृतके सरोवरमें डुबकी लगाकर निकला हो ॥ २ ॥ प्रभुके कन्धे बड़े सुन्दर हैं, भुजाएँ मनोहर हैं, वक्षःस्थल विशाल है और कण्ठकी रेखाएँ तो चित्तको चुराये लेती हैं। भगवान्का मुख देखनेसे बड़ा ही आनन्द देता है और मानो शरच्चन्द्रकी छबिको छीन लेता है ॥ ३ ॥ प्रभुके सिरपर जटाओंका मुकुट है और जिस समय वे भौंहें सिकोड़कर अपने नयनकमलोंसे निशानेकी ओर ताकते हैं, उस समयकी अपार सोभा तो सारे वनमें भी नहीं समाती; वह मर्यादा छोड़कर मानो चारों दिशाओंमें उमड़कर फैल जाती है ॥ ४ ॥ उस समय मृग और मृगी भी चकित होकर उन्हींकी ओर देखने लगते हैं, मानो सब-के-सब प्रभुको कामदेव समझकर मोहित हो गये हैं। तुलसीदास कहते हैं, किन्तु उस समय प्रभु बाण नहीं छोड़ते, क्योंकि वे स्वभावसे ही थोड़े-से प्रेमके भी वशीभूत हो जानेवाले हैं ॥ ५ ॥ मारीच-वध राग सोरठ [ ३ ] बैंठे हैं राम-लखन अरु सीता। पंचबटी बर परनकुटी तर, कहैं कछु कथा पुनीता ॥ १ ॥