गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 276, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ेंगीता० २७० कपट-कुरंग कनकमनिमय लखि प्रियसों कहति हँसि बाला । आए पालिबे जोग मंजु मृग, मारेहु मंजुल छाला ॥ २ ॥ प्रिया-वचन सुनि बिहँसि प्रेमबस गवहिं चाप-सर लीन्हें । चल्यो भाजि, फिरि फिरि चितवत मुनिमख-रखवारे चीन्हें ॥ ३ ॥ सोहति मधुर मनोहर मूरति हेम हरिनके पाछे । धावनि, नवनि, बिलोकनि, बिनकनि बसे तुलसी उर आछे ॥ ४ ॥ पञ्चवटीमें सुन्दर पर्णकुटीके भीतर राम, लक्ष्मण और सीता बैठे हुए हैं और आपसमें कुछ पवित्र कथाएं कह रहे हैं ॥ १ ॥ इतनेमें ही एक सुवर्ण और मणिमय कपटमृगको देखकर सीताजीने अपने प्रियतमसे हँसकर कहा—'यह मनोहर मृग यदि पकड़ लिया जाय तो पालनेयोग्य है और यदि मारा भी जाय तो भी इसकी मृगछाला बड़ी सुन्दर है' ॥ २ ॥ प्राणप्रियाके ये वचन सुन हँसकर श्रीरघुनाथजीने उसके प्रेमवश धीरेसे हाथमें धनुष-बाण लिये । उन्हें देखकर वह मृग बार-बार पीछेको देखता हुआ दौड़ चला; उसने विश्वामित्र मुनिके यज्ञकी रक्षा करनेवाले भगवान् रामको पहचान लिया ॥ ३ ॥ सुवर्णमय मृगके पीछे भगवान्की अतिशय मधुर और मनोहर मूर्ति बड़ी शोभायमान जान पड़ती है । उस समयका प्रभुका दौड़ना, झुकना, देखना और थककर खड़ा रह जाना तुलसीदासके हृदयमें अच्छी तरह बसा हुआ है ॥ ४ ॥ राग कल्याण [ ४ ] कर सर-धनु, कटि रुचिर निषंग । प्रिया-प्रीति-प्रेरित बन-बीथिन्ह बिचरत कपट-कनक-मृग संग ॥१॥