गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 289, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें२८३ अरण्यकाण्ड [रघुनाथजी बोले—] 'हे तात ! मेरा सन्देश सुनिये । पिताजीसे सीताजीके हरणकी बात मत कहना; क्योंकि इससे उनकी चिन्ता अधिक हो जायगी ॥ १ ॥ आपके पुण्य-प्रतापरूपी अग्निमें सब शत्रु थोड़े ही दिनोंमें दग्ध हो जायेंगे; उस समय से सब समाचार स्वयं रावण अपने कुटुम्बसहित देवसभामें जाकर सुना देगा' ॥ २ ॥ प्रभुके ये वचन सुन गृध्रराज उनकी मधुर मूर्ति हृदयमें धारणकर उनके चरणकमलोंमें सिर नवा रामकी पवित्र कीर्ति तथा अपने भाग्यकी बड़ाई सुनता आकाश-मार्गसे चला गया ॥ ३ ॥ रामचन्द्रजीने गृध्रका पिताके समान संस्कार कर उसे निजधाम भेज दिया । तुलसीदास कहते हैं, रे शठ ! तू ऐसे प्रभुको भूलकर भी सुख पाना चाहता है ? ॥ ४ ॥ शबरीसे भेंट राग सूहो [ १७ ] सबरी सोइ उठी, फरकत बाल बिलोचन-बाहु । सगुन सुहावने सूचत मुनि-मन-अगम उछाहू ॥ मुनि-अगम उर आनंद, लोचन सजल, तनु पुलकावली । तृन-पर्नसाल बनाइ, जल भरि कलस, फल चाहन चली ॥ मंजुल मनोरथ करति, सुमिरति बिप्र-बरबानी भली । ज्यौं कलप-बेलि सकेलि सुकृत सुफूल-फूली सुख फली ॥ १ ॥ आज शबरी सोकर उठी है तो उसका बायाँ नेत्र और बायीं भुजा फड़क रही है । ये सुहावने शकुन मुनियोंके भी मनको अगम उत्साहकी सूचना दे रहे हैं । उसके हृदयमें मुनियोंके लिये भी दुर्लभ