गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली २८४ आनन्द है, नेत्रोंमें जल भरा हुआ है और शरीर पुलकित हो रहा है। वह फूसकी पर्णकुटी बना, कलशमें जल भर, अपने शकुनका फल देखनेके लिये चली। वह मङ्गलमय मनोरथ करती है और बारम्बार मुनिवर मतङ्गकी शुभ वाणीका [कि तुझे श्रीरामजीका दर्शन होगा] स्मरण करती है, मानो सुन्दर फूलोंसे फूली हुई कल्पलता सम्पूर्ण सुकृतोंको एकत्र कर आज सुखरूप फलसे युक्त हुई है॥ १ ॥ प्रानप्रिय पाहुने ऐहैं राम-लषन मेरे आजु। जानत जन-जियकी मृदु चित राम गरीवनिवाजु॥ मृदु चित गरीवनिवाज आजु बिराजिहैं गृह आइकै। ब्रह्मादि संकर-गौरि पूजित पूजिहौं अब जाइकै॥ लहि नाथ हौं रघुनाथ-बानको पतितपावन पाइकै। दुहु ओर लाहु अघाइ तुलसी तीसरेहु गुन गाइकै॥ २ ॥ [वह सोचती है—] अहा! आज मेरे प्राणप्यारे पाहुने राम और लक्ष्मण आवेंगे। दीनवत्सल मृदुलचित्त भगवान् राम भक्तोंके अन्तःकरणकी बात जानते हैं। वे मृदुलचित्त गरीवनिवाज आज मेरे घर आकर विराजेंगे। अब मैं ब्रह्मा, शंकर और पार्वती आदि देवेश्वरोंसे पूजित भगवान् रामको जाकर पूजूँगी। रघुनाथजीका पतितपावन बाना पाकर अब मैं उन्हें अपने प्रभुरूपसे देखकर लोक- परलोक दोनों ओरका लाभ अघाकर लूटूँगी; और उनका गुण गाकर तीसरे तुलसीदास भी लाभान्वित होंगे॥ २ ॥ दोना रुचिर रचे पूरन कंद-मूल फल-फूल। अनुपम अमियहुतें अंबक अवलोकत अनुकूल॥ अनुकूल अंबक अंब ज्यों निज डिंब हित सब आनिकै। सुंदर सनेहसुधा सहस जनु सरस राखे सानिकै॥