भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 291, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 291

२८५ अरण्यकाण्डः छन भवन, छन बाहर, बिलोकति पंथ भ्रूपर पानि कैं । दोउ भाइ आये सबरिकाके प्रेम-पन पहिचानिकैं ॥ ३ ॥ फिर शबरीने कन्द, मूल, फल और फूलोंसे भरे हुए सुन्दर दोने बनाये, जो बड़े ही अनुपम, अमृतसे भी अधिक स्वादिष्ट और नेत्रोंसे देखनेमें सुहावने थे। माता जिस प्रकार अपने बालकके लिये अच्छी-अच्छी चीजें रख छोड़ती है, उसी प्रकार उसने वे प्रिय और दर्शनीय फलादि भगवान्‌के लिये लाकर उन्हें मानो अमृतसे भी हजारों गुने अधिक स्नेहमें डुबोकर रक्खा। वह क्षणमें घरके भीतर चली जाती और क्षणभरमें ही बाहर आकर भृकुटिपर हाथ रखकर मार्गकी ओर ताकने लगती। इसी समय शबरीका ऐसा प्रेम और व्रत जानकर दोनों भाई उसके यहाँ आये ॥ ३ ॥ श्रवन सुनत चली, आवत देखि लषन-रघुराउ । सिथिल सनेह कहै, 'है सपना बिधि, कैधौं सति भाउ' ॥ सति भाउ कैं सपनो ? निहारि कुमार कोसलरायके । गहे चरन, जे अघहरन नत-जन, बचन-मानस-कायके ॥ लघु-भाग-भाजन उदधि उमग्यो लाभ-सुख चित चाय कैं। सो जननि ज्यौं आदरी सानुज, राम भूखे भायकैं ॥ ४ ॥ प्रभुका आगमन कानोंसे सुनकर वह आगे बढ़ी और फिर राम और लक्ष्मण दोनों भाइयोंको देख स्नेहसे शिथिल होकर कहने लगी 'अरे विधाता ! यह कोई स्वप्न है या सच्ची घटना है ?' कोशल- राज महाराज दशरथके पुत्रोंको देखकर उसने 'यह स्वप्न है या सच्ची घटना ?' ऐसे कहते हुए उनके चरण पकड़े, जो विनीत भक्तोंके मन, वचन और शरीरके पापोंको दूर करनेवाले हैं। शबरीके हृदयमें