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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 292, कुल 454 में से

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पृष्ठ 292

गीतावली २८६ यह सोचकर कि 'मैं तो छोटे ही सौभाग्यकी पात्री हूँ' इस परम लाभ और सुखको पाकर आनन्दका समुद्र उमड़ आया। भगवान् तो केवल भावके ही भूखे हैं। अतः उन्होंने तो भाई लक्ष्मणके सहित उसका माताके समान आदर किया ॥ ४ ॥ प्रेम-पट पाँवड़े देत, सुअरघ बिलोचन-बारि । आश्रम लै दिए आसन पंकज-पाँय पखारि ॥ पद-पंकजात पखारि पूजे, पंथ-श्रम-बिरहित भये । फल-फूल अंकुर-मूल घरे सुधारि भरि दोना नये ॥ प्रभु खात पुलकित गात, स्वाद सराहि आदर जनु जये । फल चारिहू फल चारि दहि, परचारि-फल सबरी दये ॥ ५ ॥ शबरी प्रेमरूप वस्त्रके पाँवड़े बिछाती और नेत्रजलसे अर्घ्य देती भगवान्‌को अपने आश्रमपर ले आयी और उनके चरणकमल धोकर उन्हें आसन दिये। भगवान्‌के चरणकमलोंको धोकर उसने उनका पूजन किया। इससे उनका मार्गका श्रम जाता रहा। फिर उसने फल, फूल, अंकुर और मूल आदि नये-नये दोनोंमें सजाकर भगवान्‌के आगे रखे और प्रभु उनका स्वाद सराह-सराहकर पुल- कितशरीर हो खाने लगे, मानो वे आदर उत्पन्न करते थे। भगवान् रामने शबरीके इन चार फलोंसे [अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष-इन] चारों फलोंको जलाकर उसे [प्रेमलक्षणा भक्तिरूप] सेवाका फल दिया ॥ ५ ॥ सुमन बरषि हरषे सुर, मुनि मुदित सराहि सिहात । 'केहि रुचि केहि छुधा सानुज मांगि मांगि प्रभु खात !! प्रभु खात माँगत देति सबरी, राम भोगी जागके ।' पुलकत प्रसंसत सिद्ध-सिव-सनकादि भाजन भागके ॥

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