भारतकोश
संग्रह पर लौटें

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

गीतावली २८६ यह सोचकर कि 'मैं तो छोटे ही सौभाग्यकी पात्री हूँ' इस परम लाभ और सुखको पाकर आनन्दका समुद्र उमड़ आया। भगवान् तो केवल भावके ही भूखे हैं। अतः उन्होंने तो भाई लक्ष्मणके सहित उसका माताके समान आदर किया ॥ ४ ॥ प्रेम-पट पाँवड़े देत, सुअरघ बिलोचन-बारि । आश्रम लै दिए आसन पंकज-पाँय पखारि ॥ पद-पंकजात पखारि पूजे, पंथ-श्रम-बिरहित भये । फल-फूल अंकुर-मूल घरे सुधारि भरि दोना नये ॥ प्रभु खात पुलकित गात, स्वाद सराहि आदर जनु जये । फल चारिहू फल चारि दहि, परचारि-फल सबरी दये ॥ ५ ॥ शबरी प्रेमरूप वस्त्रके पाँवड़े बिछाती और नेत्रजलसे अर्घ्य देती भगवान्‌को अपने आश्रमपर ले आयी और उनके चरणकमल धोकर उन्हें आसन दिये। भगवान्‌के चरणकमलोंको धोकर उसने उनका पूजन किया। इससे उनका मार्गका श्रम जाता रहा। फिर उसने फल, फूल, अंकुर और मूल आदि नये-नये दोनोंमें सजाकर भगवान्‌के आगे रखे और प्रभु उनका स्वाद सराह-सराहकर पुल- कितशरीर हो खाने लगे, मानो वे आदर उत्पन्न करते थे। भगवान् रामने शबरीके इन चार फलोंसे [अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष-इन] चारों फलोंको जलाकर उसे [प्रेमलक्षणा भक्तिरूप] सेवाका फल दिया ॥ ५ ॥ सुमन बरषि हरषे सुर, मुनि मुदित सराहि सिहात । 'केहि रुचि केहि छुधा सानुज मांगि मांगि प्रभु खात !! प्रभु खात माँगत देति सबरी, राम भोगी जागके ।' पुलकत प्रसंसत सिद्ध-सिव-सनकादि भाजन भागके ॥

२८७ अरण्यकाण्ड बालक सुमित्रा कौसिलाके पाहुने फल-सागके । सुनि समुझि तुलसी जानु रामहि बस अमल अनुरागके ॥ ६ ॥ इस समय देवतालोग पुष्प बरसाकर प्रसन्न हो रहे हैं और मुनिजन प्रसन्नचित्तसे प्रशंसा करते हुए आनन्दित होते हैं कि 'आज कैसी रुचि और कैसी क्षुधासे लक्ष्मणजीके सहित भगवान् राम माँग- माँगकर फल खा रहे हैं ! प्रभु राम तो सम्पूर्ण यज्ञोंके भोक्ता हैं, सो फल खाते हैं और माँग रहे हैं तथा शबरी भी बराबर दे रही हैं'—इस प्रकार बड़े भाग्यशाली शिव और सनकादि सिद्धगण पुलकित होकर शबरीकी प्रशंसा करते हैं । अहा ! माता कौसल्या और सुमित्राके पुत्र [जो तरह-तरहके व्यञ्जनोंका भोग लगानेवाले हैं] आज फल और शाकके मेहमान हैं ! तुलसीदास कहते हैं, यह सुन और समझकर तू यह निश्चय जान कि भगवान् राम एकमात्र निर्मल प्रेमके अधीन हैं ॥ ६ ॥ रघुबर अँचइ उठे, सबरी करि प्रनाम कर जोरि । हौं बलि बलि गई, पुरई मंजु मनोरथ मोरि ॥ पुरई मनोरथ स्वारथहु परमारथहु पूरन करी । अघ-अवगुनन्हिकी कोठरी करि कृपा मुद मंगल भरी ॥ तापस-किरातिनि-कोल मृदु मूरति मनोहर मन घरी । सिर नाइ, आयसु पाइ गवने, परमनिधि पाले परी ॥ ७ ॥ [इस प्रकार भोजन करनेके अनन्तर] प्रभु आचमन करके उठे । तब शबरीने प्रणाम कर हाथ जोड़कर कहा—'मैं बलि-बलि जाती हूँ, आज आपने मेरी प्रिय कामना पूरी कर दी । आपने मेरा

गीतावली २८८ मनोरथ पूर्ण कर दिया और स्वार्थ तथा परमार्थ भी पूरा कर दिया। मैं पाप और अवगुणोंकी कोठरी थी, जिसे आपने कृपा करके आनन्द और मङ्गलसे भर दिया।' उस समय तपस्वी, किरातिनी और कोल आदि वनवासियोंने प्रभुकी मृदुल और मनोहर मूर्ति हृदयमें धारण की तथा प्रभुको सिर नवा, उनकी आज्ञा पा, भक्तिरूप परमधन प्राप्त कर अपने-अपने धामोंको गये ॥ ७ ॥ सिय-सुधि सब कही नख-सिख निरखि निरखि दोउ भाइ। दै दै प्रदच्छिना करति प्रनाम, न प्रेम अघाइ ॥ अति प्रीति मानस राखि रामहि, राम-धामहि सो गई । तेहि मातु-ज्यों रघुनाथ अपने हाथ जल-अंजलि दई ॥ तुलसी-भनित, सबरी-प्रनति, रघुबर-प्रकृति करुनामई । गावत, सुनत, समुझत भगति हिय होइ प्रभुपद नित नई ॥ ८ ॥ शबरीने दोनों भाइयोंको नखसे शिखातक देख-देखकर उन्हें सीताजीका सारा समाचार सुना दिया। चलते समय उसने भगवान्‌की बारम्बार प्रदक्षिणा कर उन्हें प्रणाम किया; उस समय उसका हृदय प्रेमसे अघाता नहीं था। इस प्रकार अत्यन्त प्रीतिपूर्वक हृदयमें भगवान् रामको धारणकर वह भगवान्‌के धामको चली गयी। तब रघुनाथजीने उसे माताके समान अपने हाथोंसे जलाञ्जलि दी। तुलसीदासकी कविता, शबरीकी विनय और रघुनाथजीका करुणामय स्वभाव गाने, सुनने और समझनेसे हृदयमें प्रभुके चरणोंकी नित्य नयी भक्ति होती है ॥ ८ ॥

ॐ श्रीसीतारामभ्यां नमः गीतावली

किष्किन्धाकाण्ड
ऋष्यमूकपर राम
राग केदारा
[ १ ]
भूषन-बसन बिलोकत सियके ।
प्रेम-बिबस मन, कंप पुलक तनु, नीरजनयन नीर भरे पियके ॥१॥
सकुचत कहत, सुमिरि उर उमगत, सील-सनेह-सुगुनगन तियके ।
स्वामि-दसा लखि लखन सखा कपि, पिघले हैं आंच माठ मानो घियके २
सोचत हानि मानि मन, गुनि गुनि, गये निघटि फल सकल सुकियके ।
बरने जामवंत तेहि अवसर, बचन बिबेक बीररस बियके ॥३॥
धीर बीर सुनि समुझि परसपर बल-उपाय उघटत निज हियके ।
तुलसिदास यह समउ कहेतें कबि लागत निपट निठुर जड़ जियके ॥४॥
[ऋष्यमूक पर्वतपर पहुँचनेपर भगवान् रामकी सुग्रीवके साथ
मित्रता हुई । उन्होंने भगवान्‌को सीताजीके वस्त्राभूषण, जिन्हें वे
रावणके साथ आकाशमार्गसे जाते समय ऋष्यमूक पर्वतपर वानरोंको
देखकर डाल गयी थीं, दिखलाये । उस समय] सीताजीके वस्त्र और
आभूषणोंको देखते ही भगवान्‌का मन प्रेमसे अधीर हो गया,
गी० १९-

गीतावली २६० शरीरमें कम्प और पुलकावली छा गयी तथा नेत्रकमलोंमें जल भर आया ॥ १ ॥ सीताजीके शील, स्नेह और शुभ गुणोंको कहनेमें तो प्रभु सकुचाते हैं, परन्तु उनकी याद आनेसे हृदय उमड़ रहा है। स्वामीकी यह दशा देख लक्ष्मणजी, सखा सुग्रीव तथा अन्य वानरगण इस प्रकार द्रवीभूत हो गये, जैसे अग्निका संयोग पाकर घीके मटके चूने लगते हैं ॥ २ ॥ सीताजीके गुणोंको मन-ही-मन सोचकर, उनके वियोगसे बड़ी हानि मान वे शोक करते हैं, मानो उनके समस्त पुण्यफल समाप्त हो गये। उस समय जाम्बवान्‌ने विवेक और वीरता दोनोंसे सने हुए वचन कहे ॥ ३ ॥ उन्हें सुन और समझकर उन धीर-वीरोंने आपसमें अपने बल और हृदयमें सोचे हुए उपाय प्रकट किये। तुलसीदास कहते हैं, उस समयका वर्णन करनेसे कवि हृदयके सर्वथा निठुर और जड़ जान पड़ते हैं ॥४॥ सीताजीकी खोजका आदेव [ २ ] प्रभु कपि-नायक बोलि कह्यो है। बरषा गई, सरद आई, अब लगि नहि सिय-सोधु लह्यो है ॥ १ ॥ जा कारन तजि लोकलाज, तनु राखि बियोग सह्यो है। ताको तौ कपिराज आज, लगि कछु न काज निबह्यो है ॥ २ ॥ सुनि सुग्रीव सभीत नमित-मुख, उतरु न देन चह्यो है। आइ गए हरि जूथ, देखि उर पूरि प्रमोद रह्यो है ॥ ३ ॥ पठये बदि बदि अवधि दसहु दिसि, चले बलु सबनि गह्यो है। तुलसी सिय लगि भव-दधिनिधि मनु फिर हरि चहत मह्यो है ॥ ४ ॥ प्रभुने वानरराज सुग्रीवको बुलाकर कहा—'भाई ! वर्षा ऋतु बीत गयी और शरद् ऋतु भी आ गयी, किन्तु अभीतक तुमने

२६१ सुन्दरकाण्ड सीताकी कोई खोज नहीं की ॥ १ ॥ जिसके लिये मैंने लोकसज्जाको त्यागकर, शरीरको जीवित रख यह वियोग सहन किया है, हे कपिराज ! उसका आजतक तुमने कोई भी काम पूरा नहीं किया ॥ २ ॥ यह सुन सुग्रीवने भयभीत हो अपना मुख नीचा कर लिया और उसे कुछ भी उत्तर देनेका साहस न हुआ, इतने- हीमें किष्किन्धा नगरमें वानरोंके बहुत-से यूथ आ गये, जिन्हें देखकर सर्वत्र आनन्द छा गया ॥ ३ ॥ उन सबको लौटनेकी अवधि निश्चित कर दशों दिशाओंमें भेजा गया और उन सबने भी इस कार्य के लिये हृदयमें बल धारण किया। तुलसीदासजी कहते हैं, उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो भगवान् सीताजीके लिये एक बार फिर संसारसमुद्रको मथना चाहते हैं ॥ ४ ॥ —**— सुन्दरकाण्ड अशोकवनमें हनूमान् राग केदारा [ १ ] रजायसु रामको जब पायो । गाल मेलि मुद्रिका, मुदित मन पवनपूत सिर नायो ॥ १ ॥

गीतावली २३२ भालुनाथ-नल-नील साथ चले, बली बालिको जायो । फरकि सुअँग भए सगुन, कहत मानो मग मुद-मंगल छायो ॥ २ ॥ देखि बिबर, सुधि पाइ गीधसों सबनि अपनो बलु मायो । सुमिरि राम, तकि तरकि तोयनिधि, लंक लूक-सो आयो ॥ ३ ॥ खोजत घर-घर, जनु दरिद्र-मनु फिरत लागि धन घायो । तुलसी सिय बिलोकि पुलक्यो तनु, भूरिभाग भयो भायो ॥ ४ ॥ जिस समय भगवान् रामकी आज्ञा मिली, उस समय पवनपुत्र हनुमान्‌जीने भगवान्‌की दी हुई मुद्रिका (अँगूठी) को मुखमें डाल उन्हें प्रसन्नचित्तसे सिर नवाया ॥ १ ॥ उनके साथ जाम्बवान्, नल, नील और बालिपुत्र वीरवर अङ्गद चले । चलते समय उनके शुभ अङ्ग फड़ककर शकुन हुए, जो मानो मार्गके आनन्दपूर्ण और मङ्गलमय होनेकी सूचना देते थे ॥ २ ॥ मार्गमें उन्होंने एक गुहाका निरीक्षणकिया और फिर गृध्रराज सम्पातीसे सीताजीका पतापा सबने अपने-अपने बलका अन्दाज लगाया । [ अन्तमें जाम्बवान्‌के उत्तेजित करनेपर] हनुमान्‌जी भगवान् रामका स्मरण कर, समुद्रका ओर ताककर और उसे लाँघकर आकाशमें जाती हुई उल्काकी तरह लङ्कापुरीमें आये ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, जिस प्रकार धनके लिये दरिद्रका मन भटकता फिरता है, उसी प्रकार घर-घरमें ढूंढ़ते- ढूंढ़ते अन्तमें सीताजीका दर्शन होनेपर उनका शरीर पुलकित हो गया । इस प्रकार अभीष्ट सिद्ध होनेपर उन्होंने अपनेको बड़भागी समझा ॥ ४ ॥ [ २ ] देखी जानकी जब जाइ । परम धीर समीरसुतके प्रेम उर न समाइ ॥ १ ॥

२६३ सुन्दरकाण्ड कृस सरीर सुभाय सोभित, लगी उड़ि उड़ि धूलि । मनहु मनसिज मोहनी-मनि गयो भोरे भूलि ॥ २ ॥ रटति निसिबासर निरंतर राम राजिवनैन । जात निकट न बिरहिनी-अरि अकनि ताते बैन ॥ ३ ॥ नाथके गुनगाथ कहि कपि दई मुंदरी डारि । कथा सुनि उठि लई कर बर, रुचिर नाम निहारि ॥ ४ ॥ हृदय हरष-बिषाद अति पति-मुद्रिका पहिचानि । दास तुलसी दसा सो केहि भाँति कहै बखानि ? ॥ ५ ॥ जिस समय परमधीर हनुमान्जीने लङ्कामें पहुँचकर सीताजी- को देखा, उस समय उनके हृदयमें प्रेम नहीं समाता था ॥ १ ॥ उनका कृश शरीर स्वभावसे ही शोभायमान था, उसपर उड़-उड़कर धूल जम गयी थी, वे ऐसी जान पड़ती थीं, मानो कामदेव भूलसे अपनी मोहनी मणिको भूल गया हो ॥ २ ॥ वे रात-दिन निरन्तर कमलनयन भगवान् रामका नाम ही रट रही थीं । उनके उन शोक- संतप्त वचनोंको सुनकर विरहिणी स्त्रियोंका शत्रु [ शीतल-मन्द- सुगन्ध पवन ] उनके पास नहीं जाता था [ क्योंकि उसे स्वयं उस विरहाग्निमें दग्ध हो जानेका भय था ] ॥ ३ ॥ यह देख हनुमान्जी- ने प्रभु रामकी गुणगाथा कहते हुए वह मुद्रिका डाल दी । सीताजी- ने वह कथा सुनकर और उसपर भगवान्‌का मनोहर नाम देखकर वह मुद्रिका अपने सुन्दर हाथमें उठा ली ॥ ४ ॥ पतिकी मुद्रिकाको पहचानकर उनके हृदयमें बड़ा ही हर्ष और विषाद हुआ* । उस दशाका तुलसीदास किस प्रकार वर्णन कर सकता है ॥ ५ ॥ *प्रियतमकी वस्तु मिली—इससे तो हर्ष हुआ; परन्तु यह सोचकर कि यह यहाँ कैसे आयी, कोई अनिष्ट तो नहीं हो गया—दुःख हुआ ।

गीतावली २६४ राग सोरठ [ ३ ] बोलि, बलि, मूँदरी ! सानुज कुसल कोसलपालु । अमिय-बचन सुनाइ मेटहि बिरह-ज्वाला-जालु ॥ १ ॥ कहत हित अपमान मैं कियो, होत हिय सोइ सालु । रोष छमि सुधि करत कबहु ललित लछिमन लालु ॥ २ ॥ परस्पर पति-देवरहि का होति चरचा चालु । देवि ! कहु केहि हेत बोले बिपुल बानर-भालु ॥ ३ ॥ सीलनिधि समरथ सुसाहिब दीनबंधु दयालु । दास तुलसी प्रभुहि काहु न कह्यो मेरो हालु ॥ ४ ॥ [वे कहने लगीं—] 'अरी मुद्रिके ! मैं बलिहारी जाऊँ, बता तो क्या भाईसहित कृपालु कोसलनाथ कुशलसे हैं ? तू अमृतमय वचन सुनाकर मेरी विरहजनित ज्वालामालाओंको शान्त कर दे ॥१॥ हाय ! हितकी कहते हुए भी मैंने लक्ष्मणजीका तिरस्कार किया— मेरे हृदयमें अभीतक इसका खेद बना हुआ है ! वे ललित लखन- लाल अपने रोषको शान्त कर क्या कभी मेरी सुधि करते हैं ? ॥२॥ पतिदेव और देवरजीमें आजकल किस विषयकी चर्चा चला करती है ? देवि ! बता तो, उन्होंने बहुत-से रीछ-वानर किसलिये बुलाये हैं ? ॥ ३ ॥ अरी मुद्रिके ! प्रभु तो शीलके भण्डार, सब प्रकार समर्थ, सच्चे स्वामी, दीनबन्धु और परम दयालु हैं । मालूम होता है, अभी प्रभुको किसीने मेरा समाचार नहीं सुनाया [ इसलिये उनके आनेमें इतना विलम्ब हुआ है ]' ॥ ४ ॥

२६५ सुन्दरकाण्ड [ ४ ] सदल सलषन हैं कुसल कृपालु कोसल-राउ ! सील-सदन सनेह-सागर सहज सरल सुभाउ ॥ १ ॥ नींद-भूख न देवरहिं, परिहरेको पछिताउ । धीरधुर रघुबीरको नहि सपनेहू चित चाउ ॥ २ ॥ सोधु बिनु, अनुरोध रितुके, बोध बिहित उपाउ । करत हैं सोइ समय साधन, फलति बनत बनाउ ॥ ३ ॥ पठए कपि दिसि दसहु, जे प्रभुकाज कुटिल न काउ । बोलि लियो हनुमान करि सनमान, जानि समाउ ॥ ४ ॥ दई हौं संकेत कहि, कुसलात सियहि सुनाउ । देखि दुर्गं, बिसेषि जानकि, जानि रिपु गति आउ ॥ ५ ॥ कियो सीय-प्रबोध मुँदरी, दियो कपिहि लखाउ । पाइ अवसर, नाइ सिर तुलसीस-गुनगन गाउ ॥ ६ ॥ [यह सुनकर मुद्रिका कहने लगी—] कृपामय कोसलनाथ अपने दल-बल और लक्ष्मणजीके सहित कुशलपूर्वक हैं। वे तो स्वभावसे ही शीलके मन्दिर, स्नेह-समुद्र और सरलस्वभाव हैं ॥ १ ॥ तुम्हारे देवरको भी न नींद है और न भूख; उन्हें तुम्हें छोड़कर चले जानेका बड़ा पश्चात्ताप है तथा धीरधुरन्धर रघुनाथजीके चित्तमें तो स्वप्नमें भी प्रसन्नता नहीं है ॥ २ ॥ ऋतुके अनुरोधसे [ अर्थात् वर्षा ऋतुके कारण ] तुम्हारी शोध (खोज) के लिये विहित ( उचित ) उपायोंका अवलम्बन नहीं किया जा सका था। अब अवसर पाकर उन साधनोंका प्रयोग कर रहे हैं, जिनसे कार्य फलीभूत हो जाय [ अर्थात् तुम्हारा पता लग सके ] ॥ ३ ॥ इसी विचारसे

गीतावली २६६ उन्होंने दसों दिशाओंमें ऐसे वानर भेजे हैं।' जो कभी भी प्रभुका कार्य करनेमें विमुख होनेवाले नहीं हैं। फिर भी इस कार्यमें समर्थ समझकर उन्होंने आदरपूर्वक हनुमान्‌को अपने पास बुलाया ॥ ४॥ और कुछ संकेत बतलाकर उन्होंने मुझे हनुमान्‌को देकर कहा कि 'सीताको हमारा कुशल-समाचार सुनाना और शत्रुके दुर्गको देख, उसकी गति (शक्ति) जान तथा विशेषतः जानकीसे मिलकर आ जाना' ॥ ५॥ इस प्रकार मुद्रिकाने सीताजीको समझाया और उन्हें हनुमान्‌जी दिखला दिये। तब हनूमान्‌जी अवसर जान सीताजीको सिर नवा तुलसीदासके प्रभुके गुणगान गाने लगे ॥ ६॥ [ ५ ] सुवन समीरको धीरधुरीन, बीर-बड़ोइ। देखि गति सिय-मुद्रिकाकी बाल ज्यों दियो रोइ ॥ १ ॥ अकनि कटु बानी कुटिलकी क्रोध-बिंध्य बढ़ोइ। सकुचि सम भयो ईस-आयसु-कलसभव जिय जोइ ॥ २ ॥ बुद्धि-बल, साहस-पराक्रम अच्छत राखे गोइ। सकल-साज-समाज साधक समउ, कहै सब कोइ ॥ ३ ॥ उतरि तरुतें नमत पद, सकुचात सोचत कोइ। चुके अवसर मनहु सुजनसि सुजन सनमुख होइ ॥ ४ ॥ कहे बचन बिनीत प्रीति-प्रतीति-नीति निचोइ। सीय सुनि हनुमान जान्यो भली भाँति भलोइ ॥ ५ ॥ देबि ! बिनु करतूति कहिबो जानिहैं लघु लोइ। कहौंगो मुखकी समरसरि कालि कारिख धोइ ॥ ६ ॥ करत कछू न बनत, हरिहिय हरष-सोक समोइ। कहत मन तुलसीस लंका करहुँ सघन घमोइ ॥ ७ ॥

२६७ सुन्दरकाण्ड पवनपुत्र हनूमान्‌जी बड़े ही वीर और धीरधुरीण थे; किन्तु सीताजी और मुद्रिकाकी दशा देखकर वे बालकके समान रो पड़े ॥१॥ कुटिल रावणका कटु भाषण सुनकर हनूमान्‌जीका क्रोध- रूप विन्ध्याचल बढ़ने लगा था, परन्तु हृदयमें भगवान्‌के आदेशरूप अगस्त्यजीको देखकर वह संकोचवश सम अवस्थामें ही रह गया* ॥२॥ उन्होंने बुद्धि, बल, साहस और पराक्रम आदि सब गुणोंको होते हुए भी दबा लिया, क्योंकि सब साज-समाज समय- पर ही सिद्धि देनेवाला होता है, ऐसा सब कोई कोई कहते हैं ॥३॥ हनूमान्‌जीने वृक्षसे उतर सीताजीके चरणोंमें नमस्कार किया और सकुचाकर इस प्रकार सोचने लगे जैसे कोई सत्पुरुष किसी सज्जन- का काम पड़नेपर उसमें चूक करनेके बाद फिर उसके सामने आवे ॥४॥ फिर उन्होंने प्रीति, प्रतीति और नीतिसे भरे हुए अति विनीत वचन कहे। उन्हें सुनकर सीताजीने हनूमान्‌जीको भली प्रकार सत्पुरुष ही समझा ॥५॥ वे बोले—'हे देवि ! कोई कर्तव्य किये बिना केवल मुखसे ही कहनेसे लोग मुझे तुच्छ समझेंगे। अब तो मैं कल युद्धरूप सरितामें अपने मुखकी कालिमा धोकर *एक बार विन्ध्याचलने सूर्यसे मेरुप्रदक्षिणाके समान अपनी परिक्रमा करनेको कहा। सूर्यने इसपर कुछ ध्यान न दिया, तब वह सूर्यका मार्ग रोकनेके लिये बढ़ने लगा। इससे अनिष्टकी आशङ्का कर देवताओोंने उसके गुरु अगस्त्यजीसे उसकी प्रगति रोकनेकी प्रार्थना की। अगस्त्यजी उसके पास गये। उन्हें देखकर विन्ध्यने साष्टाङ्ग प्रणाम किया। तब अगस्त्यजी—यह कहकर कि 'जबतक मैं न आऊं उठना मत—चले गये। वे अभीतक वहाँ लौटकर नहीं आये और विन्ध्याचल भी ज्यों-का-त्यों लम्बा पड़ा हुआ है। —महाभारत

गीतावली २६८ ही आपसे कहूँगा' ॥ ६ ॥ हृदयमें हर्ष और शोकका उद्वेग होनेसे हनूमानजी कोई कर्तव्य निश्चित नहीं कर पाते थे, अन्तमें तुलसीके प्रभु उन पवननन्दनने अपने मनमें कहा कि 'लङ्काको मैं घनी घमोइ (सत्यानाशी या भड़भाँड़) बना डालूँगा । [अर्थात् सोनेकी लंकाको खण्डहरके रूपमें परिणत कर डालूँगा, उसे उजाड़ डालूँगा ]' ॥ ७ ॥ राग केदारा [ ६ ] हौं रघुबंसमनि को दूत । मातु मानु प्रतीति जानकी ! जानि मारुतपूत ॥ १ ॥ मैं सुनी बातें असैली, जे कही निसिचर नीच । क्यों न मारै गाल, बैठो काल-दाढ़नि बीच ॥ २ ॥ निदरि अरि, रघुबीर-बल लै जाऊँ जौ हठि आज । डरौं आयसु-भंगतें, अरु बिगरिहै सुरकाज ॥ ३ ॥ बांधि बारिधि साधि रिपु, दिन चारिमें दोउ बीर । मिलिहिंगे कपि भालु-दल संग, जननि ! उर धरु धीर ॥ ४ ॥ चित्रकूट कथा-कुसल, कहि सीस नायो कीस । सुहृद-सेवक नाथको लखि दई अचल असीस ॥ ५ ॥ भये सीतल स्त्रवन-तन-मन सुने बचन-पियूष । दास तुलसी रही नयननि दरसहीकी भूख ॥ ६ ॥ माता जानकि ! विश्वास करो, मैं रघुवंशमणि भगवान् राम- का दूत हूँ; मुझे साक्षात् पवनपुत्र समझो ॥ १ ॥ नीच निशाचर रावणने जो अण्डबण्ड बातें कही हैं वे मैंने सब सुन ली हैं। वह कालकी दाढ़ोंके बीचमें पड़ा हुआ है, फिर बैठा-बैठा इस प्रकार गाल

२६६ सुन्दरकाण्ड क्यों न बजावेगा ? ॥२॥ मैं रघुनाथजीकी कृपासे आज ही शत्रु का तिरस्कार कर हठपूर्वक तुम्हें ले जा सकता हूँ; किन्तु स्वामीकी आज्ञा भंग करने से डरता हूँ और इससे देवताओंका काम भी बिगड़ता है ॥ ३ ॥ मातः ! तुम हृदयमें धैर्य धारण करो; दोनों भाई चार दिन पीछे ही समुद्रपर पुल बांध, शत्रुको परास्तकर रीछ और वानरोंकी सेनाके सहित तुमसे मिलेंगे ॥ ४ फिर हनूमान्- जीने चित्रकूटकी कथा और रघुनाथजीकी कुशल कह उन्हें सिर नवाया। इससे उन्हें स्वामीका प्रिय दास समझकर सीताजीने अटल आशीर्वाद दिया ॥ ५ ॥ हनूमान्‌जीके वचनामृत सुनकर सीताजीके कान, शरीर और हृदय तो शीतल हो गये; अब नेत्रोंको केवल भगवान्‌के दर्शनोंकी ही भूख रह गयी है ॥ ६ ॥ [ ७ ] तात ! तोहूसों कहत होति हिये गलानि । मनको प्रथम पन समुझि अछत तनु लखि नइ गति भइ मति म्लानि ॥ १ ॥ पियको बचन परिहरयो जियके भरोसे संग चली बन बड़ो लाभ जानि । पीतम-बिरह तौ सनेह सरबसु सुत ! औसरकौ चूकिबो सरिस न हानि ॥ २ ॥ १. इन्द्रके पुत्र जयन्तकी कथा । इस कथाको सुनानेमें हनूमान्‌जीके दो अभिप्राय थे । एक तो यह कि जिस प्रकार तुमसे विरोध करनेके कारण जयन्तकी दुर्दशा हुई थी, उसी प्रकार अब रावण भी बच नहीं सकता । दूसरे इसे सुनाकर उन्होंने रघुनाथजीके प्रिय दूत होनेकी साक्षी दी; क्योंकि यह कथा बहुत गुप्त थी ।

गीतावली ३०० आरज-सुवनके तो दया दुवन्हुपर, मोहि सोच, मोतें सब बिधि नसानि । अपनौ भलाई भलो कियो नाथ सबहीको, मेरे ही दिन सब बिसरी बानि ॥ ३ ॥ नेम तौ पपीहाहीके, प्रेम प्यारो मीनहीके, तुलसी कही है नीके हृदय आनि । इतनी कही सो कही सोय, ज्योंही त्योंही रही, प्रीति परी सही, बिधिसों न बसानि ॥ ४ ॥ 'हे तात ! इस समय तुमसे बात कहते हुए भी चित्तमें खेद होता है। मेरे चित्तका जो पहला प्रण था [कि पतिके बिना प्राण नहीं रखूँगी] उसे याद कर और शरीरको विद्यमान जान, इस नयी गतिको देखकर मेरी बुद्धि मलिन हो रही है ॥ १ ॥ अपने चित्तका विश्वास करके ही मैंने पतिके वचनका उल्लंघन किया और बड़ा लाभ समझकर उनके साथ साथ वनको चली आयी। हे पुत्र ! पतिका वियोग तो स्नेह- का सर्वस्व लुटना है। [उस समय मुझे अवश्य प्राण त्याग देने चाहिये थे, परन्तु मुझसे ऐसा नहीं बना।] सच है, अवसर चूक जानेके समान और कोई हानि नहीं है ॥ २ ॥ आर्यपुत्रकी तो शत्रुओंपर भी दया है; मुझे तो इसी बातका शोक है कि मुझसे सब प्रकार उलटा ही हुआ है। प्रभुने अपनी भलमनसाहतसे ही सबकी भलाई की है; पर मेरे ही दिन (मेरे ऊपर कृपा करनेके अवसरपर ही) उन्हें अपना स्वभाव विस्मृत हो गया है ॥ ३ ॥ भैया ! नियम तो पपीहाका और प्यारा प्रेम तो मछलीका ही है जिसे लोगोंने भली- भाँति हृदयमें विचारकर कहा है। तुलसीदासजी कहते हैं कि

३०१ सुन्दरकाण्ड सीताजीने इतना कहा सो कहा, फिर वे ज्यों-की-त्यों रह गयीं। उनकी प्रीति सही पड़ गयी [अर्थात् वे रामचन्द्रके विरहमें व्याकुल होकर बेहोश हो गयीं]। विधातासे कुछ भी वश नहीं चलता॥ ४॥ [ ८ ] मातु ! काहेको कहति अति बचन दीन ? तबकी तुही जानति, अबकी हौं ही कहत, सबके जियकी जानत प्रभु प्रबीन ॥ १ ॥ ऐसे तो सोचहिं न्याय निठुर-नायक-रत सलभ, खग, कुरग, कमल, मीन । करुनानिधानको तो ज्यों ज्यों तनु छीन भयो, त्यों त्यों मनु भयो तेरे प्रेम पीन ॥ २ ॥ सियको सनेह, रघुबरकी दसा सुमिरि पवनपूत देखि भयो प्रीति-लीन । तुलसी जनको जननी प्रबोध कियो, 'समुझि तात ! जग बिधि-अधीन' ॥ ३ ॥ [हनूमान्‌जी कहने लगे—] 'माता ! तुम ऐसे अत्यन्त दीन वचन क्यों कहती हो ! पहले रघुनाथजीकी तुम्हारे प्रति कैसी प्रीति थी, सो तो तुम्हींको मालूम है, किन्तु अबकी तो मैं भी कह सकता हूँ। प्रभु बड़े प्रवीण हैं, वे सबके हृदयकी बात जानते हैं ॥ १ ॥ ऐसा शोक तो निष्ठुर प्रियतममें प्रीति करने वाले शलभ, पपीहा, मृग कमल और मत्स्य आदि किया करते हैं, सो ठीक ही है, परन्तु करुणानिधान भगवान् रामका तो जैसे-जैसे शरीर दुर्बल होता है वैसे-वैसे ही उनका मन तुम्हारे प्रेमसे पुष्ट होता जाता है' ॥ २ ॥

गीतावली ३०२ इस समय सीताका स्नेह और रघुनाथजीकी दशा स्मरण कर पवन- पुत्र प्रेममें डूब गये । तुलसीदासजी कहते हैं, तब जगज्जननी जानकीजीने अपने जन हनूमान्जीको 'हे तात ! इस संसारको विधाताके अधीन समझो' ऐसा कहकर समझाया ॥ ३ ॥ राग जैतश्री [ ९ ] कहु कपि ! कब रघुनाथ कृपा करि, हरिहैं निज वियोग- संभव दुख । राजिवनयन, मयन-अनेक-छबि, रबिकुल-कुमुद-सुखद, मयंक-मुख ॥ १ ॥ बिरह-अनल स्वासा-समीर निज तनु जरिबे कहँ रही न कछु सक । अति बल जल बरषत दोउ लोचन, दिन अरु रैन रहत एकहि तक ॥ २ ॥ सुदृढ़ ग्यान अवलंबि, सुनहु सुत ! राखति प्रान बिचारि दहन मत । सगुन रूप, लीला-बिलास-सुख सुमिरति करति रहति अंतरगत ॥ ३ ॥ सुनु हनुमंत ! अनंत-बंधु करुनासुभाव सीतल कोमल अति । तुलसिदास यहि त्रास जानि जिय, बरु दुख सहौं, प्रगट कहि न सकति ॥ ४ ॥ [ फिर वे कहने लगीं—] 'कपिवर ! बताओ, जिनका मुख- चन्द्र सूर्यवंशरूप कुमुदको सुख देनेवाला है, वे अनेकों कामदेवों- की-सी कान्तिवाले कमलनयन भगवान् राम अपने वियोगसे प्राप्त हुए

३०३ सुन्दरकाण्ड मेरे दुःखको कृपा करके कब दूर करेंगे ? ॥१॥ अबतक विरहानलसे संतप्त हुए अपने प्राणवायुसे मेरे शरीरके दग्ध हो जानेमें कोई सन्देह नहीं था; परन्तु मेरे ये दोनों नेत्र रात-दिन एकतार होकर बड़े वेगसे जल बरसाते रहते हैं [इसीसे वह ज्वाला शान्त होती रहती है और शरीर भी अभीतक बचा हुआ है ] ॥२॥ पुत्र ! सुनो, मैं तो सुदृढ़ ज्ञानका आश्रय लेकर ही अपने प्राण बचाये हुए हूँ और इस शरीरको दग्ध नहीं होने देती । मैं हर समय अपने मन-ही-मन प्रभुके सगुण-स्वरूप और दिव्य लीलाविलासका स्मरण करती हुई उन्हें हृदयमें धरती रहती हूँ ॥ ३ ॥ हनुमान् ! सुनो, लक्ष्मणजीके भाई बड़े ही करुण-स्वभाववाले शान्त और अत्यन्त कोमल हैं । अतः यह समझकर कि इन बातोंको सुनकर उन्हें बड़ा दुःख होगा, मैं यद्यपि बहुत कष्ट सह रही हूँ तो भी प्रकटमें नहीं कह सकती॥४॥ राग केदारा [ १० ] कबहूँ, कपि ! राघव आवहिंगे ? मेरे नयन चकोर प्रीतिबस राकासंसि मुख दिखरावहिंगे ॥१॥ मधुप, मराल, मोर, चातक ह्वै लोचन बहु प्रकार धावहिगे । अंग अंग छवि भिन्न भिन्न सुख निरखि निरखि तहँ तहँ छावहिगे ॥२॥ बिरह-अगिनि जरि रही लता ज्यों कृपादृष्टि-जल पलुहावहिगे । निज बियोग-दुख जानि दयानिधि मधुर बचन कहि समुझावहिगे ॥३॥ लोकपाल, सुर, नाग, मनुज सब परे बंदि कब मुनिजन गावहिगे ? रावनबध रघुनाथ-बिमल-जस नारदादि मुनिजन गावहिगे ॥४॥ यह अभिलाष रैन-दिन मेरे, राज बिभीषन कब पावहिगे । तुलसिदास प्रभु मोहजनित भ्रम, भेदबुद्धि कब बिसरावहिगे ? ॥५॥

गीतावली ३०४

हे कपि ! क्या रघुनाथजीकभी आवेंगे ? मेरे प्रीतिविवश नयन- चकोरोंको क्या वे अपना मुखचन्द्र दिखलायेंगे ? ॥ १ ॥ मेरे नेत्र भ्रमर, हंस, मयूर और पपीहा होकर अनेक प्रकारसे दौड़ेंगे और उनके अंग-अंगकी छविमें भिन्न-भिन्न प्रकारका सुख देखकर जहाँ-तहाँ वहीं छा जायेंगे* ॥ २ ॥ मैं लताके समान विरहरूप अग्निमें जल रही हूँ, क्या वे अपनी कृपादृष्टिरूप जलसे मुझे हरी-भरी करेंगे ? वे दयानिधान मुझे अपने वियोगका दुःख जानकर क्या मधुर वचनोंसे कह-सुनकर समझावेंगे ? ॥ ३ ॥ लोकपाल, देवगण, नाग और मनुष्य—ये सब वन्दीगृहमें पड़े हुए हैं। इन्हें वे कब मुक्त करेंगे और नारदादि मुनिजन रावणका वध और रघुनाथजीका विमल सुयश कब गान करेंगे ? ॥ ४ ॥ मुझे रात-दिन यही अभिलाषा रहती है कि न जाने विभीषण कब राज्य प्राप्त करेंगे ? और मोह- वश मुझे जो [ मारीचमें कनकमृगका ] भ्रम हुआ और [ लक्ष्मणजीमें ] भेदबुद्धि हुई उसे भगवान् कब भूल जायेंगे ? ॥ ५ ॥ [ ११ ] सत्य बचन सुनु मातु जानकी ! जनके दुख रघुनाथ दुखित अति, सहज प्रकृति करुनानिधानकी ॥१॥ तुव बियोग-संभव दारुन दुख बिसरि गई महिमा सुबानकी । तनु कहु कहँ रघुपति-सायक-रबि, तम-अनीक कहँ जातुधानकी ॥२॥


  • अर्थात् भ्रमररूपसे उनके मुख, नेत्र, कर और चरणरूप कमलोंमें निवास करेंगे, हंस होकर नाभिसरोवरमें विहार करेंगे तथा प्रभुका मेघश्याम विग्रह और तडिद्वर्ण पीताम्बर देखकर मयूररूपसे नाचेंगे अथवा चातक रूपसे उनकी ओर दौड़ेंगे।

कहूँ हम पसु साखामृग चंचल, बात कहौं मैं बिद्यमानकी ! कहँ हरि सिव-अज-पूज्य ग्यान-घन, नहि बिसरति वह लगनि कानकी तुव दरसन-सँदेस सुनि हरिको बहुत भई अवलम्ब प्रानकी । तुलसिदास गुन सुमिरि रामके प्रेम-मगन, नहि सुधि अपानकी ॥४॥ [हनूमान्‌जी बोले—] 'माता जानकि ! तुम मेरा सत्य वचन सुनो । भगवान् राम अपने सेवकके दुःखसे अत्यन्त दुःखित रहते हैं—यह उन करुणानिधिकी स्वाभाविक प्रकृति है ॥ १ ॥ उन्हें तुम्हारे वियोगजनित दुःखके कारण ही अपने बाणोंकी महिमा विस्मृत हो गयी है; नहीं तो बताओ कहाँ तो रघुनाथजीके बाणरूप सूर्य और कहाँ निशाचरोंका दलरूप अन्धकार ? ॥ २ ॥ मैं इसी समयकी बात कहता हूँ—कहाँ तो हम अत्यन्त चपल पशु वानर और कहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महादेवके भी वन्दनीय ज्ञानघन भगवान् राम ? किन्तु [ हमसे गुह्य परामर्श करनेके लिये ] उनका वह हमारे कानोंसे लगना मुझे अभीतक नहीं भूलता ॥ ३ ॥ उन्हें तो सुग्रीवके मुखसे तुम्हारे दर्शन होनेका समाचार सुनकर ही प्राणोंका बड़ा भारी अवलम्ब मिला था।' तुलसीदासजी कहते हैं, इस प्रकार भगवान् रामके गुणोंका स्मरण कर हनूमान्‌जी प्रेममें डूब गये और उन्हें अपनी सुधि न रही ॥ ४ ॥ भगवान् और रावणकी भेंट राग कान्हरा [ १२ ] रावन ! जू पै राम रन रोषे । को सहि सकै सुर सुर समरथ, बिसिख काल-बसननितें चोषे ॥१॥ गी० २०—