गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ३०२ इस समय सीताका स्नेह और रघुनाथजीकी दशा स्मरण कर पवन- पुत्र प्रेममें डूब गये । तुलसीदासजी कहते हैं, तब जगज्जननी जानकीजीने अपने जन हनूमान्जीको 'हे तात ! इस संसारको विधाताके अधीन समझो' ऐसा कहकर समझाया ॥ ३ ॥ राग जैतश्री [ ९ ] कहु कपि ! कब रघुनाथ कृपा करि, हरिहैं निज वियोग- संभव दुख । राजिवनयन, मयन-अनेक-छबि, रबिकुल-कुमुद-सुखद, मयंक-मुख ॥ १ ॥ बिरह-अनल स्वासा-समीर निज तनु जरिबे कहँ रही न कछु सक । अति बल जल बरषत दोउ लोचन, दिन अरु रैन रहत एकहि तक ॥ २ ॥ सुदृढ़ ग्यान अवलंबि, सुनहु सुत ! राखति प्रान बिचारि दहन मत । सगुन रूप, लीला-बिलास-सुख सुमिरति करति रहति अंतरगत ॥ ३ ॥ सुनु हनुमंत ! अनंत-बंधु करुनासुभाव सीतल कोमल अति । तुलसिदास यहि त्रास जानि जिय, बरु दुख सहौं, प्रगट कहि न सकति ॥ ४ ॥ [ फिर वे कहने लगीं—] 'कपिवर ! बताओ, जिनका मुख- चन्द्र सूर्यवंशरूप कुमुदको सुख देनेवाला है, वे अनेकों कामदेवों- की-सी कान्तिवाले कमलनयन भगवान् राम अपने वियोगसे प्राप्त हुए