भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 309, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 309

३०३ सुन्दरकाण्ड मेरे दुःखको कृपा करके कब दूर करेंगे ? ॥१॥ अबतक विरहानलसे संतप्त हुए अपने प्राणवायुसे मेरे शरीरके दग्ध हो जानेमें कोई सन्देह नहीं था; परन्तु मेरे ये दोनों नेत्र रात-दिन एकतार होकर बड़े वेगसे जल बरसाते रहते हैं [इसीसे वह ज्वाला शान्त होती रहती है और शरीर भी अभीतक बचा हुआ है ] ॥२॥ पुत्र ! सुनो, मैं तो सुदृढ़ ज्ञानका आश्रय लेकर ही अपने प्राण बचाये हुए हूँ और इस शरीरको दग्ध नहीं होने देती । मैं हर समय अपने मन-ही-मन प्रभुके सगुण-स्वरूप और दिव्य लीलाविलासका स्मरण करती हुई उन्हें हृदयमें धरती रहती हूँ ॥ ३ ॥ हनुमान् ! सुनो, लक्ष्मणजीके भाई बड़े ही करुण-स्वभाववाले शान्त और अत्यन्त कोमल हैं । अतः यह समझकर कि इन बातोंको सुनकर उन्हें बड़ा दुःख होगा, मैं यद्यपि बहुत कष्ट सह रही हूँ तो भी प्रकटमें नहीं कह सकती॥४॥ राग केदारा [ १० ] कबहूँ, कपि ! राघव आवहिंगे ? मेरे नयन चकोर प्रीतिबस राकासंसि मुख दिखरावहिंगे ॥१॥ मधुप, मराल, मोर, चातक ह्वै लोचन बहु प्रकार धावहिगे । अंग अंग छवि भिन्न भिन्न सुख निरखि निरखि तहँ तहँ छावहिगे ॥२॥ बिरह-अगिनि जरि रही लता ज्यों कृपादृष्टि-जल पलुहावहिगे । निज बियोग-दुख जानि दयानिधि मधुर बचन कहि समुझावहिगे ॥३॥ लोकपाल, सुर, नाग, मनुज सब परे बंदि कब मुनिजन गावहिगे ? रावनबध रघुनाथ-बिमल-जस नारदादि मुनिजन गावहिगे ॥४॥ यह अभिलाष रैन-दिन मेरे, राज बिभीषन कब पावहिगे । तुलसिदास प्रभु मोहजनित भ्रम, भेदबुद्धि कब बिसरावहिगे ? ॥५॥