गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०३ सुन्दरकाण्ड मेरे दुःखको कृपा करके कब दूर करेंगे ? ॥१॥ अबतक विरहानलसे संतप्त हुए अपने प्राणवायुसे मेरे शरीरके दग्ध हो जानेमें कोई सन्देह नहीं था; परन्तु मेरे ये दोनों नेत्र रात-दिन एकतार होकर बड़े वेगसे जल बरसाते रहते हैं [इसीसे वह ज्वाला शान्त होती रहती है और शरीर भी अभीतक बचा हुआ है ] ॥२॥ पुत्र ! सुनो, मैं तो सुदृढ़ ज्ञानका आश्रय लेकर ही अपने प्राण बचाये हुए हूँ और इस शरीरको दग्ध नहीं होने देती । मैं हर समय अपने मन-ही-मन प्रभुके सगुण-स्वरूप और दिव्य लीलाविलासका स्मरण करती हुई उन्हें हृदयमें धरती रहती हूँ ॥ ३ ॥ हनुमान् ! सुनो, लक्ष्मणजीके भाई बड़े ही करुण-स्वभाववाले शान्त और अत्यन्त कोमल हैं । अतः यह समझकर कि इन बातोंको सुनकर उन्हें बड़ा दुःख होगा, मैं यद्यपि बहुत कष्ट सह रही हूँ तो भी प्रकटमें नहीं कह सकती॥४॥ राग केदारा [ १० ] कबहूँ, कपि ! राघव आवहिंगे ? मेरे नयन चकोर प्रीतिबस राकासंसि मुख दिखरावहिंगे ॥१॥ मधुप, मराल, मोर, चातक ह्वै लोचन बहु प्रकार धावहिगे । अंग अंग छवि भिन्न भिन्न सुख निरखि निरखि तहँ तहँ छावहिगे ॥२॥ बिरह-अगिनि जरि रही लता ज्यों कृपादृष्टि-जल पलुहावहिगे । निज बियोग-दुख जानि दयानिधि मधुर बचन कहि समुझावहिगे ॥३॥ लोकपाल, सुर, नाग, मनुज सब परे बंदि कब मुनिजन गावहिगे ? रावनबध रघुनाथ-बिमल-जस नारदादि मुनिजन गावहिगे ॥४॥ यह अभिलाष रैन-दिन मेरे, राज बिभीषन कब पावहिगे । तुलसिदास प्रभु मोहजनित भ्रम, भेदबुद्धि कब बिसरावहिगे ? ॥५॥