भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 310

गीतावली ३०४

हे कपि ! क्या रघुनाथजीकभी आवेंगे ? मेरे प्रीतिविवश नयन- चकोरोंको क्या वे अपना मुखचन्द्र दिखलायेंगे ? ॥ १ ॥ मेरे नेत्र भ्रमर, हंस, मयूर और पपीहा होकर अनेक प्रकारसे दौड़ेंगे और उनके अंग-अंगकी छविमें भिन्न-भिन्न प्रकारका सुख देखकर जहाँ-तहाँ वहीं छा जायेंगे* ॥ २ ॥ मैं लताके समान विरहरूप अग्निमें जल रही हूँ, क्या वे अपनी कृपादृष्टिरूप जलसे मुझे हरी-भरी करेंगे ? वे दयानिधान मुझे अपने वियोगका दुःख जानकर क्या मधुर वचनोंसे कह-सुनकर समझावेंगे ? ॥ ३ ॥ लोकपाल, देवगण, नाग और मनुष्य—ये सब वन्दीगृहमें पड़े हुए हैं। इन्हें वे कब मुक्त करेंगे और नारदादि मुनिजन रावणका वध और रघुनाथजीका विमल सुयश कब गान करेंगे ? ॥ ४ ॥ मुझे रात-दिन यही अभिलाषा रहती है कि न जाने विभीषण कब राज्य प्राप्त करेंगे ? और मोह- वश मुझे जो [ मारीचमें कनकमृगका ] भ्रम हुआ और [ लक्ष्मणजीमें ] भेदबुद्धि हुई उसे भगवान् कब भूल जायेंगे ? ॥ ५ ॥ [ ११ ] सत्य बचन सुनु मातु जानकी ! जनके दुख रघुनाथ दुखित अति, सहज प्रकृति करुनानिधानकी ॥१॥ तुव बियोग-संभव दारुन दुख बिसरि गई महिमा सुबानकी । तनु कहु कहँ रघुपति-सायक-रबि, तम-अनीक कहँ जातुधानकी ॥२॥


  • अर्थात् भ्रमररूपसे उनके मुख, नेत्र, कर और चरणरूप कमलोंमें निवास करेंगे, हंस होकर नाभिसरोवरमें विहार करेंगे तथा प्रभुका मेघश्याम विग्रह और तडिद्वर्ण पीताम्बर देखकर मयूररूपसे नाचेंगे अथवा चातक रूपसे उनकी ओर दौड़ेंगे।