भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 307, कुल 454 में से

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पृष्ठ 307

३०१ सुन्दरकाण्ड सीताजीने इतना कहा सो कहा, फिर वे ज्यों-की-त्यों रह गयीं। उनकी प्रीति सही पड़ गयी [अर्थात् वे रामचन्द्रके विरहमें व्याकुल होकर बेहोश हो गयीं]। विधातासे कुछ भी वश नहीं चलता॥ ४॥ [ ८ ] मातु ! काहेको कहति अति बचन दीन ? तबकी तुही जानति, अबकी हौं ही कहत, सबके जियकी जानत प्रभु प्रबीन ॥ १ ॥ ऐसे तो सोचहिं न्याय निठुर-नायक-रत सलभ, खग, कुरग, कमल, मीन । करुनानिधानको तो ज्यों ज्यों तनु छीन भयो, त्यों त्यों मनु भयो तेरे प्रेम पीन ॥ २ ॥ सियको सनेह, रघुबरकी दसा सुमिरि पवनपूत देखि भयो प्रीति-लीन । तुलसी जनको जननी प्रबोध कियो, 'समुझि तात ! जग बिधि-अधीन' ॥ ३ ॥ [हनूमान्‌जी कहने लगे—] 'माता ! तुम ऐसे अत्यन्त दीन वचन क्यों कहती हो ! पहले रघुनाथजीकी तुम्हारे प्रति कैसी प्रीति थी, सो तो तुम्हींको मालूम है, किन्तु अबकी तो मैं भी कह सकता हूँ। प्रभु बड़े प्रवीण हैं, वे सबके हृदयकी बात जानते हैं ॥ १ ॥ ऐसा शोक तो निष्ठुर प्रियतममें प्रीति करने वाले शलभ, पपीहा, मृग कमल और मत्स्य आदि किया करते हैं, सो ठीक ही है, परन्तु करुणानिधान भगवान् रामका तो जैसे-जैसे शरीर दुर्बल होता है वैसे-वैसे ही उनका मन तुम्हारे प्रेमसे पुष्ट होता जाता है' ॥ २ ॥

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