गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ३०० आरज-सुवनके तो दया दुवन्हुपर, मोहि सोच, मोतें सब बिधि नसानि । अपनौ भलाई भलो कियो नाथ सबहीको, मेरे ही दिन सब बिसरी बानि ॥ ३ ॥ नेम तौ पपीहाहीके, प्रेम प्यारो मीनहीके, तुलसी कही है नीके हृदय आनि । इतनी कही सो कही सोय, ज्योंही त्योंही रही, प्रीति परी सही, बिधिसों न बसानि ॥ ४ ॥ 'हे तात ! इस समय तुमसे बात कहते हुए भी चित्तमें खेद होता है। मेरे चित्तका जो पहला प्रण था [कि पतिके बिना प्राण नहीं रखूँगी] उसे याद कर और शरीरको विद्यमान जान, इस नयी गतिको देखकर मेरी बुद्धि मलिन हो रही है ॥ १ ॥ अपने चित्तका विश्वास करके ही मैंने पतिके वचनका उल्लंघन किया और बड़ा लाभ समझकर उनके साथ साथ वनको चली आयी। हे पुत्र ! पतिका वियोग तो स्नेह- का सर्वस्व लुटना है। [उस समय मुझे अवश्य प्राण त्याग देने चाहिये थे, परन्तु मुझसे ऐसा नहीं बना।] सच है, अवसर चूक जानेके समान और कोई हानि नहीं है ॥ २ ॥ आर्यपुत्रकी तो शत्रुओंपर भी दया है; मुझे तो इसी बातका शोक है कि मुझसे सब प्रकार उलटा ही हुआ है। प्रभुने अपनी भलमनसाहतसे ही सबकी भलाई की है; पर मेरे ही दिन (मेरे ऊपर कृपा करनेके अवसरपर ही) उन्हें अपना स्वभाव विस्मृत हो गया है ॥ ३ ॥ भैया ! नियम तो पपीहाका और प्यारा प्रेम तो मछलीका ही है जिसे लोगोंने भली- भाँति हृदयमें विचारकर कहा है। तुलसीदासजी कहते हैं कि