गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६६ सुन्दरकाण्ड क्यों न बजावेगा ? ॥२॥ मैं रघुनाथजीकी कृपासे आज ही शत्रु का तिरस्कार कर हठपूर्वक तुम्हें ले जा सकता हूँ; किन्तु स्वामीकी आज्ञा भंग करने से डरता हूँ और इससे देवताओंका काम भी बिगड़ता है ॥ ३ ॥ मातः ! तुम हृदयमें धैर्य धारण करो; दोनों भाई चार दिन पीछे ही समुद्रपर पुल बांध, शत्रुको परास्तकर रीछ और वानरोंकी सेनाके सहित तुमसे मिलेंगे ॥ ४ फिर हनूमान्- जीने चित्रकूटकी कथा और रघुनाथजीकी कुशल कह उन्हें सिर नवाया। इससे उन्हें स्वामीका प्रिय दास समझकर सीताजीने अटल आशीर्वाद दिया ॥ ५ ॥ हनूमान्जीके वचनामृत सुनकर सीताजीके कान, शरीर और हृदय तो शीतल हो गये; अब नेत्रोंको केवल भगवान्के दर्शनोंकी ही भूख रह गयी है ॥ ६ ॥ [ ७ ] तात ! तोहूसों कहत होति हिये गलानि । मनको प्रथम पन समुझि अछत तनु लखि नइ गति भइ मति म्लानि ॥ १ ॥ पियको बचन परिहरयो जियके भरोसे संग चली बन बड़ो लाभ जानि । पीतम-बिरह तौ सनेह सरबसु सुत ! औसरकौ चूकिबो सरिस न हानि ॥ २ ॥ १. इन्द्रके पुत्र जयन्तकी कथा । इस कथाको सुनानेमें हनूमान्जीके दो अभिप्राय थे । एक तो यह कि जिस प्रकार तुमसे विरोध करनेके कारण जयन्तकी दुर्दशा हुई थी, उसी प्रकार अब रावण भी बच नहीं सकता । दूसरे इसे सुनाकर उन्होंने रघुनाथजीके प्रिय दूत होनेकी साक्षी दी; क्योंकि यह कथा बहुत गुप्त थी ।