गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली २६८ ही आपसे कहूँगा' ॥ ६ ॥ हृदयमें हर्ष और शोकका उद्वेग होनेसे हनूमानजी कोई कर्तव्य निश्चित नहीं कर पाते थे, अन्तमें तुलसीके प्रभु उन पवननन्दनने अपने मनमें कहा कि 'लङ्काको मैं घनी घमोइ (सत्यानाशी या भड़भाँड़) बना डालूँगा । [अर्थात् सोनेकी लंकाको खण्डहरके रूपमें परिणत कर डालूँगा, उसे उजाड़ डालूँगा ]' ॥ ७ ॥ राग केदारा [ ६ ] हौं रघुबंसमनि को दूत । मातु मानु प्रतीति जानकी ! जानि मारुतपूत ॥ १ ॥ मैं सुनी बातें असैली, जे कही निसिचर नीच । क्यों न मारै गाल, बैठो काल-दाढ़नि बीच ॥ २ ॥ निदरि अरि, रघुबीर-बल लै जाऊँ जौ हठि आज । डरौं आयसु-भंगतें, अरु बिगरिहै सुरकाज ॥ ३ ॥ बांधि बारिधि साधि रिपु, दिन चारिमें दोउ बीर । मिलिहिंगे कपि भालु-दल संग, जननि ! उर धरु धीर ॥ ४ ॥ चित्रकूट कथा-कुसल, कहि सीस नायो कीस । सुहृद-सेवक नाथको लखि दई अचल असीस ॥ ५ ॥ भये सीतल स्त्रवन-तन-मन सुने बचन-पियूष । दास तुलसी रही नयननि दरसहीकी भूख ॥ ६ ॥ माता जानकि ! विश्वास करो, मैं रघुवंशमणि भगवान् राम- का दूत हूँ; मुझे साक्षात् पवनपुत्र समझो ॥ १ ॥ नीच निशाचर रावणने जो अण्डबण्ड बातें कही हैं वे मैंने सब सुन ली हैं। वह कालकी दाढ़ोंके बीचमें पड़ा हुआ है, फिर बैठा-बैठा इस प्रकार गाल