भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 303

२६७ सुन्दरकाण्ड पवनपुत्र हनूमान्‌जी बड़े ही वीर और धीरधुरीण थे; किन्तु सीताजी और मुद्रिकाकी दशा देखकर वे बालकके समान रो पड़े ॥१॥ कुटिल रावणका कटु भाषण सुनकर हनूमान्‌जीका क्रोध- रूप विन्ध्याचल बढ़ने लगा था, परन्तु हृदयमें भगवान्‌के आदेशरूप अगस्त्यजीको देखकर वह संकोचवश सम अवस्थामें ही रह गया* ॥२॥ उन्होंने बुद्धि, बल, साहस और पराक्रम आदि सब गुणोंको होते हुए भी दबा लिया, क्योंकि सब साज-समाज समय- पर ही सिद्धि देनेवाला होता है, ऐसा सब कोई कोई कहते हैं ॥३॥ हनूमान्‌जीने वृक्षसे उतर सीताजीके चरणोंमें नमस्कार किया और सकुचाकर इस प्रकार सोचने लगे जैसे कोई सत्पुरुष किसी सज्जन- का काम पड़नेपर उसमें चूक करनेके बाद फिर उसके सामने आवे ॥४॥ फिर उन्होंने प्रीति, प्रतीति और नीतिसे भरे हुए अति विनीत वचन कहे। उन्हें सुनकर सीताजीने हनूमान्‌जीको भली प्रकार सत्पुरुष ही समझा ॥५॥ वे बोले—'हे देवि ! कोई कर्तव्य किये बिना केवल मुखसे ही कहनेसे लोग मुझे तुच्छ समझेंगे। अब तो मैं कल युद्धरूप सरितामें अपने मुखकी कालिमा धोकर *एक बार विन्ध्याचलने सूर्यसे मेरुप्रदक्षिणाके समान अपनी परिक्रमा करनेको कहा। सूर्यने इसपर कुछ ध्यान न दिया, तब वह सूर्यका मार्ग रोकनेके लिये बढ़ने लगा। इससे अनिष्टकी आशङ्का कर देवताओोंने उसके गुरु अगस्त्यजीसे उसकी प्रगति रोकनेकी प्रार्थना की। अगस्त्यजी उसके पास गये। उन्हें देखकर विन्ध्यने साष्टाङ्ग प्रणाम किया। तब अगस्त्यजी—यह कहकर कि 'जबतक मैं न आऊं उठना मत—चले गये। वे अभीतक वहाँ लौटकर नहीं आये और विन्ध्याचल भी ज्यों-का-त्यों लम्बा पड़ा हुआ है। —महाभारत