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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 302, कुल 454 में से

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पृष्ठ 302

गीतावली २६६ उन्होंने दसों दिशाओंमें ऐसे वानर भेजे हैं।' जो कभी भी प्रभुका कार्य करनेमें विमुख होनेवाले नहीं हैं। फिर भी इस कार्यमें समर्थ समझकर उन्होंने आदरपूर्वक हनुमान्‌को अपने पास बुलाया ॥ ४॥ और कुछ संकेत बतलाकर उन्होंने मुझे हनुमान्‌को देकर कहा कि 'सीताको हमारा कुशल-समाचार सुनाना और शत्रुके दुर्गको देख, उसकी गति (शक्ति) जान तथा विशेषतः जानकीसे मिलकर आ जाना' ॥ ५॥ इस प्रकार मुद्रिकाने सीताजीको समझाया और उन्हें हनुमान्‌जी दिखला दिये। तब हनूमान्‌जी अवसर जान सीताजीको सिर नवा तुलसीदासके प्रभुके गुणगान गाने लगे ॥ ६॥ [ ५ ] सुवन समीरको धीरधुरीन, बीर-बड़ोइ। देखि गति सिय-मुद्रिकाकी बाल ज्यों दियो रोइ ॥ १ ॥ अकनि कटु बानी कुटिलकी क्रोध-बिंध्य बढ़ोइ। सकुचि सम भयो ईस-आयसु-कलसभव जिय जोइ ॥ २ ॥ बुद्धि-बल, साहस-पराक्रम अच्छत राखे गोइ। सकल-साज-समाज साधक समउ, कहै सब कोइ ॥ ३ ॥ उतरि तरुतें नमत पद, सकुचात सोचत कोइ। चुके अवसर मनहु सुजनसि सुजन सनमुख होइ ॥ ४ ॥ कहे बचन बिनीत प्रीति-प्रतीति-नीति निचोइ। सीय सुनि हनुमान जान्यो भली भाँति भलोइ ॥ ५ ॥ देबि ! बिनु करतूति कहिबो जानिहैं लघु लोइ। कहौंगो मुखकी समरसरि कालि कारिख धोइ ॥ ६ ॥ करत कछू न बनत, हरिहिय हरष-सोक समोइ। कहत मन तुलसीस लंका करहुँ सघन घमोइ ॥ ७ ॥

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