गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
गीतावली २६८ ही आपसे कहूँगा' ॥ ६ ॥ हृदयमें हर्ष और शोकका उद्वेग होनेसे हनूमानजी कोई कर्तव्य निश्चित नहीं कर पाते थे, अन्तमें तुलसीके प्रभु उन पवननन्दनने अपने मनमें कहा कि 'लङ्काको मैं घनी घमोइ (सत्यानाशी या भड़भाँड़) बना डालूँगा । [अर्थात् सोनेकी लंकाको खण्डहरके रूपमें परिणत कर डालूँगा, उसे उजाड़ डालूँगा ]' ॥ ७ ॥ राग केदारा [ ६ ] हौं रघुबंसमनि को दूत । मातु मानु प्रतीति जानकी ! जानि मारुतपूत ॥ १ ॥ मैं सुनी बातें असैली, जे कही निसिचर नीच । क्यों न मारै गाल, बैठो काल-दाढ़नि बीच ॥ २ ॥ निदरि अरि, रघुबीर-बल लै जाऊँ जौ हठि आज । डरौं आयसु-भंगतें, अरु बिगरिहै सुरकाज ॥ ३ ॥ बांधि बारिधि साधि रिपु, दिन चारिमें दोउ बीर । मिलिहिंगे कपि भालु-दल संग, जननि ! उर धरु धीर ॥ ४ ॥ चित्रकूट कथा-कुसल, कहि सीस नायो कीस । सुहृद-सेवक नाथको लखि दई अचल असीस ॥ ५ ॥ भये सीतल स्त्रवन-तन-मन सुने बचन-पियूष । दास तुलसी रही नयननि दरसहीकी भूख ॥ ६ ॥ माता जानकि ! विश्वास करो, मैं रघुवंशमणि भगवान् राम- का दूत हूँ; मुझे साक्षात् पवनपुत्र समझो ॥ १ ॥ नीच निशाचर रावणने जो अण्डबण्ड बातें कही हैं वे मैंने सब सुन ली हैं। वह कालकी दाढ़ोंके बीचमें पड़ा हुआ है, फिर बैठा-बैठा इस प्रकार गाल
२६६ सुन्दरकाण्ड क्यों न बजावेगा ? ॥२॥ मैं रघुनाथजीकी कृपासे आज ही शत्रु का तिरस्कार कर हठपूर्वक तुम्हें ले जा सकता हूँ; किन्तु स्वामीकी आज्ञा भंग करने से डरता हूँ और इससे देवताओंका काम भी बिगड़ता है ॥ ३ ॥ मातः ! तुम हृदयमें धैर्य धारण करो; दोनों भाई चार दिन पीछे ही समुद्रपर पुल बांध, शत्रुको परास्तकर रीछ और वानरोंकी सेनाके सहित तुमसे मिलेंगे ॥ ४ फिर हनूमान्- जीने चित्रकूटकी कथा और रघुनाथजीकी कुशल कह उन्हें सिर नवाया। इससे उन्हें स्वामीका प्रिय दास समझकर सीताजीने अटल आशीर्वाद दिया ॥ ५ ॥ हनूमान्जीके वचनामृत सुनकर सीताजीके कान, शरीर और हृदय तो शीतल हो गये; अब नेत्रोंको केवल भगवान्के दर्शनोंकी ही भूख रह गयी है ॥ ६ ॥ [ ७ ] तात ! तोहूसों कहत होति हिये गलानि । मनको प्रथम पन समुझि अछत तनु लखि नइ गति भइ मति म्लानि ॥ १ ॥ पियको बचन परिहरयो जियके भरोसे संग चली बन बड़ो लाभ जानि । पीतम-बिरह तौ सनेह सरबसु सुत ! औसरकौ चूकिबो सरिस न हानि ॥ २ ॥ १. इन्द्रके पुत्र जयन्तकी कथा । इस कथाको सुनानेमें हनूमान्जीके दो अभिप्राय थे । एक तो यह कि जिस प्रकार तुमसे विरोध करनेके कारण जयन्तकी दुर्दशा हुई थी, उसी प्रकार अब रावण भी बच नहीं सकता । दूसरे इसे सुनाकर उन्होंने रघुनाथजीके प्रिय दूत होनेकी साक्षी दी; क्योंकि यह कथा बहुत गुप्त थी ।
गीतावली ३०० आरज-सुवनके तो दया दुवन्हुपर, मोहि सोच, मोतें सब बिधि नसानि । अपनौ भलाई भलो कियो नाथ सबहीको, मेरे ही दिन सब बिसरी बानि ॥ ३ ॥ नेम तौ पपीहाहीके, प्रेम प्यारो मीनहीके, तुलसी कही है नीके हृदय आनि । इतनी कही सो कही सोय, ज्योंही त्योंही रही, प्रीति परी सही, बिधिसों न बसानि ॥ ४ ॥ 'हे तात ! इस समय तुमसे बात कहते हुए भी चित्तमें खेद होता है। मेरे चित्तका जो पहला प्रण था [कि पतिके बिना प्राण नहीं रखूँगी] उसे याद कर और शरीरको विद्यमान जान, इस नयी गतिको देखकर मेरी बुद्धि मलिन हो रही है ॥ १ ॥ अपने चित्तका विश्वास करके ही मैंने पतिके वचनका उल्लंघन किया और बड़ा लाभ समझकर उनके साथ साथ वनको चली आयी। हे पुत्र ! पतिका वियोग तो स्नेह- का सर्वस्व लुटना है। [उस समय मुझे अवश्य प्राण त्याग देने चाहिये थे, परन्तु मुझसे ऐसा नहीं बना।] सच है, अवसर चूक जानेके समान और कोई हानि नहीं है ॥ २ ॥ आर्यपुत्रकी तो शत्रुओंपर भी दया है; मुझे तो इसी बातका शोक है कि मुझसे सब प्रकार उलटा ही हुआ है। प्रभुने अपनी भलमनसाहतसे ही सबकी भलाई की है; पर मेरे ही दिन (मेरे ऊपर कृपा करनेके अवसरपर ही) उन्हें अपना स्वभाव विस्मृत हो गया है ॥ ३ ॥ भैया ! नियम तो पपीहाका और प्यारा प्रेम तो मछलीका ही है जिसे लोगोंने भली- भाँति हृदयमें विचारकर कहा है। तुलसीदासजी कहते हैं कि
३०१ सुन्दरकाण्ड सीताजीने इतना कहा सो कहा, फिर वे ज्यों-की-त्यों रह गयीं। उनकी प्रीति सही पड़ गयी [अर्थात् वे रामचन्द्रके विरहमें व्याकुल होकर बेहोश हो गयीं]। विधातासे कुछ भी वश नहीं चलता॥ ४॥ [ ८ ] मातु ! काहेको कहति अति बचन दीन ? तबकी तुही जानति, अबकी हौं ही कहत, सबके जियकी जानत प्रभु प्रबीन ॥ १ ॥ ऐसे तो सोचहिं न्याय निठुर-नायक-रत सलभ, खग, कुरग, कमल, मीन । करुनानिधानको तो ज्यों ज्यों तनु छीन भयो, त्यों त्यों मनु भयो तेरे प्रेम पीन ॥ २ ॥ सियको सनेह, रघुबरकी दसा सुमिरि पवनपूत देखि भयो प्रीति-लीन । तुलसी जनको जननी प्रबोध कियो, 'समुझि तात ! जग बिधि-अधीन' ॥ ३ ॥ [हनूमान्जी कहने लगे—] 'माता ! तुम ऐसे अत्यन्त दीन वचन क्यों कहती हो ! पहले रघुनाथजीकी तुम्हारे प्रति कैसी प्रीति थी, सो तो तुम्हींको मालूम है, किन्तु अबकी तो मैं भी कह सकता हूँ। प्रभु बड़े प्रवीण हैं, वे सबके हृदयकी बात जानते हैं ॥ १ ॥ ऐसा शोक तो निष्ठुर प्रियतममें प्रीति करने वाले शलभ, पपीहा, मृग कमल और मत्स्य आदि किया करते हैं, सो ठीक ही है, परन्तु करुणानिधान भगवान् रामका तो जैसे-जैसे शरीर दुर्बल होता है वैसे-वैसे ही उनका मन तुम्हारे प्रेमसे पुष्ट होता जाता है' ॥ २ ॥
गीतावली ३०२ इस समय सीताका स्नेह और रघुनाथजीकी दशा स्मरण कर पवन- पुत्र प्रेममें डूब गये । तुलसीदासजी कहते हैं, तब जगज्जननी जानकीजीने अपने जन हनूमान्जीको 'हे तात ! इस संसारको विधाताके अधीन समझो' ऐसा कहकर समझाया ॥ ३ ॥ राग जैतश्री [ ९ ] कहु कपि ! कब रघुनाथ कृपा करि, हरिहैं निज वियोग- संभव दुख । राजिवनयन, मयन-अनेक-छबि, रबिकुल-कुमुद-सुखद, मयंक-मुख ॥ १ ॥ बिरह-अनल स्वासा-समीर निज तनु जरिबे कहँ रही न कछु सक । अति बल जल बरषत दोउ लोचन, दिन अरु रैन रहत एकहि तक ॥ २ ॥ सुदृढ़ ग्यान अवलंबि, सुनहु सुत ! राखति प्रान बिचारि दहन मत । सगुन रूप, लीला-बिलास-सुख सुमिरति करति रहति अंतरगत ॥ ३ ॥ सुनु हनुमंत ! अनंत-बंधु करुनासुभाव सीतल कोमल अति । तुलसिदास यहि त्रास जानि जिय, बरु दुख सहौं, प्रगट कहि न सकति ॥ ४ ॥ [ फिर वे कहने लगीं—] 'कपिवर ! बताओ, जिनका मुख- चन्द्र सूर्यवंशरूप कुमुदको सुख देनेवाला है, वे अनेकों कामदेवों- की-सी कान्तिवाले कमलनयन भगवान् राम अपने वियोगसे प्राप्त हुए
३०३ सुन्दरकाण्ड मेरे दुःखको कृपा करके कब दूर करेंगे ? ॥१॥ अबतक विरहानलसे संतप्त हुए अपने प्राणवायुसे मेरे शरीरके दग्ध हो जानेमें कोई सन्देह नहीं था; परन्तु मेरे ये दोनों नेत्र रात-दिन एकतार होकर बड़े वेगसे जल बरसाते रहते हैं [इसीसे वह ज्वाला शान्त होती रहती है और शरीर भी अभीतक बचा हुआ है ] ॥२॥ पुत्र ! सुनो, मैं तो सुदृढ़ ज्ञानका आश्रय लेकर ही अपने प्राण बचाये हुए हूँ और इस शरीरको दग्ध नहीं होने देती । मैं हर समय अपने मन-ही-मन प्रभुके सगुण-स्वरूप और दिव्य लीलाविलासका स्मरण करती हुई उन्हें हृदयमें धरती रहती हूँ ॥ ३ ॥ हनुमान् ! सुनो, लक्ष्मणजीके भाई बड़े ही करुण-स्वभाववाले शान्त और अत्यन्त कोमल हैं । अतः यह समझकर कि इन बातोंको सुनकर उन्हें बड़ा दुःख होगा, मैं यद्यपि बहुत कष्ट सह रही हूँ तो भी प्रकटमें नहीं कह सकती॥४॥ राग केदारा [ १० ] कबहूँ, कपि ! राघव आवहिंगे ? मेरे नयन चकोर प्रीतिबस राकासंसि मुख दिखरावहिंगे ॥१॥ मधुप, मराल, मोर, चातक ह्वै लोचन बहु प्रकार धावहिगे । अंग अंग छवि भिन्न भिन्न सुख निरखि निरखि तहँ तहँ छावहिगे ॥२॥ बिरह-अगिनि जरि रही लता ज्यों कृपादृष्टि-जल पलुहावहिगे । निज बियोग-दुख जानि दयानिधि मधुर बचन कहि समुझावहिगे ॥३॥ लोकपाल, सुर, नाग, मनुज सब परे बंदि कब मुनिजन गावहिगे ? रावनबध रघुनाथ-बिमल-जस नारदादि मुनिजन गावहिगे ॥४॥ यह अभिलाष रैन-दिन मेरे, राज बिभीषन कब पावहिगे । तुलसिदास प्रभु मोहजनित भ्रम, भेदबुद्धि कब बिसरावहिगे ? ॥५॥
गीतावली ३०४
हे कपि ! क्या रघुनाथजीकभी आवेंगे ? मेरे प्रीतिविवश नयन- चकोरोंको क्या वे अपना मुखचन्द्र दिखलायेंगे ? ॥ १ ॥ मेरे नेत्र भ्रमर, हंस, मयूर और पपीहा होकर अनेक प्रकारसे दौड़ेंगे और उनके अंग-अंगकी छविमें भिन्न-भिन्न प्रकारका सुख देखकर जहाँ-तहाँ वहीं छा जायेंगे* ॥ २ ॥ मैं लताके समान विरहरूप अग्निमें जल रही हूँ, क्या वे अपनी कृपादृष्टिरूप जलसे मुझे हरी-भरी करेंगे ? वे दयानिधान मुझे अपने वियोगका दुःख जानकर क्या मधुर वचनोंसे कह-सुनकर समझावेंगे ? ॥ ३ ॥ लोकपाल, देवगण, नाग और मनुष्य—ये सब वन्दीगृहमें पड़े हुए हैं। इन्हें वे कब मुक्त करेंगे और नारदादि मुनिजन रावणका वध और रघुनाथजीका विमल सुयश कब गान करेंगे ? ॥ ४ ॥ मुझे रात-दिन यही अभिलाषा रहती है कि न जाने विभीषण कब राज्य प्राप्त करेंगे ? और मोह- वश मुझे जो [ मारीचमें कनकमृगका ] भ्रम हुआ और [ लक्ष्मणजीमें ] भेदबुद्धि हुई उसे भगवान् कब भूल जायेंगे ? ॥ ५ ॥ [ ११ ] सत्य बचन सुनु मातु जानकी ! जनके दुख रघुनाथ दुखित अति, सहज प्रकृति करुनानिधानकी ॥१॥ तुव बियोग-संभव दारुन दुख बिसरि गई महिमा सुबानकी । तनु कहु कहँ रघुपति-सायक-रबि, तम-अनीक कहँ जातुधानकी ॥२॥
- अर्थात् भ्रमररूपसे उनके मुख, नेत्र, कर और चरणरूप कमलोंमें निवास करेंगे, हंस होकर नाभिसरोवरमें विहार करेंगे तथा प्रभुका मेघश्याम विग्रह और तडिद्वर्ण पीताम्बर देखकर मयूररूपसे नाचेंगे अथवा चातक रूपसे उनकी ओर दौड़ेंगे।
कहूँ हम पसु साखामृग चंचल, बात कहौं मैं बिद्यमानकी ! कहँ हरि सिव-अज-पूज्य ग्यान-घन, नहि बिसरति वह लगनि कानकी तुव दरसन-सँदेस सुनि हरिको बहुत भई अवलम्ब प्रानकी । तुलसिदास गुन सुमिरि रामके प्रेम-मगन, नहि सुधि अपानकी ॥४॥ [हनूमान्जी बोले—] 'माता जानकि ! तुम मेरा सत्य वचन सुनो । भगवान् राम अपने सेवकके दुःखसे अत्यन्त दुःखित रहते हैं—यह उन करुणानिधिकी स्वाभाविक प्रकृति है ॥ १ ॥ उन्हें तुम्हारे वियोगजनित दुःखके कारण ही अपने बाणोंकी महिमा विस्मृत हो गयी है; नहीं तो बताओ कहाँ तो रघुनाथजीके बाणरूप सूर्य और कहाँ निशाचरोंका दलरूप अन्धकार ? ॥ २ ॥ मैं इसी समयकी बात कहता हूँ—कहाँ तो हम अत्यन्त चपल पशु वानर और कहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महादेवके भी वन्दनीय ज्ञानघन भगवान् राम ? किन्तु [ हमसे गुह्य परामर्श करनेके लिये ] उनका वह हमारे कानोंसे लगना मुझे अभीतक नहीं भूलता ॥ ३ ॥ उन्हें तो सुग्रीवके मुखसे तुम्हारे दर्शन होनेका समाचार सुनकर ही प्राणोंका बड़ा भारी अवलम्ब मिला था।' तुलसीदासजी कहते हैं, इस प्रकार भगवान् रामके गुणोंका स्मरण कर हनूमान्जी प्रेममें डूब गये और उन्हें अपनी सुधि न रही ॥ ४ ॥ भगवान् और रावणकी भेंट राग कान्हरा [ १२ ] रावन ! जू पै राम रन रोषे । को सहि सकै सुर सुर समरथ, बिसिख काल-बसननितें चोषे ॥१॥ गी० २०—
गीतावली ३०६ तपबल, भुजबल, कैसनेह-बल सिव बिरंचि नीकी बिधि तोषे । सो फल राजसमाज-सुवन-जन आपु न नास आपने पोषे ॥२॥ तुला पिनाक, साहु नृप, त्रिभुवन भट बटोरि सबके बल जोषे । परसुराम-से सूर-सिरोमनि पलमें भए खेतके धोखे ॥३॥ कालिकी बात बालिकी सुधि करि समुझि हिताहित खोलि झरोखे। कह्यो कुमंत्रिनको न मानिये, बड़ी हानि, जिय जानि त्रिदोषे ॥४॥ जासु प्रसाद जनमि जग पुरषनि सागर सृजे, खने अरु सोखे । तुलसिदास सो स्वामि न सूझ्यो, नयन बीस मंदिर के-से मोखे ॥५॥ [अब रावणकी सभामें पहुँचनेपर हनूमान्जी उससे कहते हैं—] ‘हे रावण ! यदि भगवान् राम युद्धमें कुपित हो गये तो ऐसा सामर्थ्यवान् कौन देवता या असुर है जो उनके कालके दाँतोंसे भी पैने बाणोंको सहन कर सके ? ॥ १ ॥ तुमने अपने तपोबल, बाहुबल और स्नेहबलसे शिव और ब्रह्माजीको भी अच्छी तरह सन्तुष्ट किया है। अब उसके फलस्वरूप तथा अपने ही पोषित किये राजसमाज, पुत्र-पौत्रादि तथा सेवकोंको स्वयंही नष्ट न करो ? ॥२॥ राजा जनकरूप साहने तीनों लोकोंके शूरवीरोंको एकत्र कर उनके बलोंको पिनाकरूप तराजूसे अच्छी अच्छीतरह तौल लिया था; किन्तु वहाँ भगवान् रामके सामने परशुराम-जैसे शूर-शिरोमणि भी एक क्षणमें खेतके धोखे बन गये; [अर्थात् केवल देखनेमात्रके रह गये] ॥ ३ ॥ कलहीकी बात है' तनिक बालिकी गतिका ही विचार कर लो और अपने (हृदयके) झरोखेको खोलकर (उसके प्रकाशमें) हिताहितका विचार कर लो। देखो, अपने कुमन्त्रियोंकी बात मत मानना, इसमें बड़ी हानि होगी, अपने चित्तमें इन्हें त्रिदोषग्रस्त
३०७ सुन्दरकाण्ड समझो ॥ ४ ॥ अहो ! जिनकी कृपासे पूर्वपुरुषोंने जगत्में जन्म लेकर समुद्रोंको रचा, खोदा और शोषण भी किया, यदि उन प्रभुको तुमने न पहचाना तो तुम्हारे बीस नेत्र घरके झरोखोंके समान ही हैं ॥ ५ ॥ राग मारू [ १३ ] जो हौं प्रभु आयसु लै चलतो । तौ यहि रिस तोहि महित दसानन ! जातुधान-दल दलतो ॥ १ ॥ रावन सो रसराज सुभट-रस सहित लंक-खल खलतो । करि पुटपाक नाक-नायकहित घने घने घर घलतो ॥ २ ॥ बड़े समाज लाज-भाजन भयो, बड़ो काज बिनु छलतो । लंकनाथ ! रघुनाथ, बैरु-तरु आज फैलि फूलि फलतो ॥ ३ ॥ काल-करम, दिगपाल, सकल जग-जाल जासु करतल तो । ता रिपुसों पर भूमि रारि रन जीवन-मरन सुथल तो ॥ ४ ॥ देखो मैं दसकंठ ! सभा सब, मोंतें कोउ न सबल तो । तुलसी अरि उर आनि एक अब एतो गलानि न गलतो ॥ ५ ॥ 'रावण ! यदि मैं प्रभुकी आज्ञा लेकर आता तो इसी रिसमें तुम्हारे सहित सम्पूर्ण राक्षससेनाका संहार कर डालता ॥ १ ॥ मैं रावणरूप पारेको अन्य शूरवीररूप रसोंके सहित फूंककर लंकारूप खरलमें घोटता । इस प्रकार देवराज इन्द्रके लिये पुटपाकविधिसे औषध तैयार करनेके लिये बड़े-बड़े घरोंको नष्ट कर देता ॥ २ ॥ आज इस बड़े समाजमें मैं व्यर्थ ही लज्जाका पात्र हुआ; इस बड़े कार्यको मैं निःसन्देह कर सकता था । लंकेश्वर ! रघुनाथजीका बैररूप वृक्ष आज खूब फैल-फूलकर फलित होता ॥ ३ ॥ काल,
गीतावली ३०८ कर्म और दिकपालादि सम्पूर्ण प्रपञ्च जिस प्रभुके करतलगत है उसके शत्रुसे उसीके देशमें यदि मेरा युद्ध छिड़ जाता तो मेरा जीवन और मरण दोनों ही सफल हो जाते ॥४॥ रावण ! मैने तुम्हारी सारी सभा देख ली है ! इसमें मुझसे अधिक बलवान् कोई नहीं है । यदि मुझे स्वामीकी आज्ञा होती तो मैं शत्रु की शक्तिका अनुमान करके इतनी ग्लानि सहन न करता' ॥ ५ ॥ सीताजीसे बिदाई [ १४ ] तौलौं, मातु ! आपु नीके रहिबो । जौलौं हौं ल्यावौं रघुबीरहि, दिन दस और दुसह दुख सहिबो ॥ १ ॥ सोखिकै, खेतकै, बाँधि सेतु करि उतरिवो उदधि, न बोहित चहिबो । प्रबल दनुज-दल दलि पल आधमें, जीवत दुरित दसानन गहिबो ॥ २ ॥ बैरिबृंद-बिधवा-बनितन्हिको देखिबो बारि-बिलोचन बहिबो । साज सेनसमेत स्वामिपद निरखि परम मुद मंगल लहिबो ॥ ३ ॥ लंक-दाह उर आनि मानिबो सांचु राम-सेवकको कहिबो । तुलसी प्रभुसुर सुजस गाइहैं, मिटि जैहै सबको सोचु, दव दहिबो ॥ ४ ॥ [हनुमान्जी विदा होते समय सीताजीसे कहते हैं-] 'हे मातः ! जबतक मैं रघुनाथजीको यहाँ लाऊँ तबतक तुम अच्छी तरह रहना । इस दुःसह दुःखको दस दिन और सहन करना ॥ १ ॥ हमें समुद्रको सोखकर, पाटकर अथवा पुल बाँधकर उतरना होगा;
३०६ सुन्दरकाण्ड जहाज आदिकी हमें आवश्यकता नहीं होगी। फिर हमारा प्रबल कटक आधे पलमें ही शत्रु की सेनाका संहारकर पापी रावणको जीता ही पकड़ लेगा॥ २॥ तुम शत्रु-समूहकी विधवा नारियोंका अश्रुजल बहना देखोगी और भाई लक्ष्मण तथा सेनाके सहित प्रभुके चरणकमल देखकर परम आनन्द और मङ्गल लाभ करोगी॥ ३॥ मेरे द्वारा लंकाके दहनको देखकर ही तुम इस रामदूतके कथनको सत्य मानना।' तुलसीदासजी कहते हैं, अब शीघ्र ही देवतालोग प्रभुका सुयश गान करेंगे और सबका शोकाग्निमें जलना नष्ट हो जायगा॥ ४॥ [ १५ ] कपिके चलत सियको मनु गहुबरि आयो। पुलक सिथिल भयो सरीर, नीर नयनन्हि छायो॥१॥ कहन चह्यो संदेस, नहि कह्यो, पियके जिय की जानि हृदय दुसह दुख दुरायो। देखि दसा ब्याकुल हरोस, ग्रीषमके पथिक ज्यों घरनि तरनि-तायो॥२॥ नीचतें नीच लगी अमरता, छलको न बलको निरखि थल परुष प्रेम पायो। कें प्रबोध मातु-प्रीतिसों असीस दीन्हीं ह्वै है तिहारोई मन भायो॥३॥ करुना-कोप-लाज-भय-भरो कियो गौन, मौन हो चरन कमल सीस नायो। यह सनेह-सरबस समौ, तुलसी रसना रूखी, ताहीतें परत गायो॥४॥ हनूमान्जीके चलते ही सीताजीका हृदय भर आया। उनका शरीर रोमाञ्चित और शिथिल हो गया तथा नेत्रोंमें जल भर
गीतावली ३१० आया ॥ १॥ वे संदेश कहना चाहती थीं; परन्तु पतिके चित्तकी अवस्थाको विचारकर नहीं कहा, अपने दुःसह दुःखको हृदयमें ही छिपा रखा। उनकी वह दशा देखकर कपिपति हनूमान्जी व्याकुल हो गये, जैसे ग्रीष्म ऋतुमें सूर्यके तापसे तपी हुई भूमिपर चलनेवाला पथिक तिलमिला उठता है ॥ २ ॥ उन्हें अपनी अमरता मृत्युसे भी बुरी लगी। वहाँ छल या बल किसीका अवसर न देख कर उन्हें अपना प्रेम कठोर जान पड़ने लगा। तब जानकीजीने उन्हें मातृप्रेमसे समझाकर आशीर्वाद दिया कि 'तुम्हारे ही मनकी इच्छा पूर्ण होगी' ॥ ३ ॥ फिर हनूमान्जीने करुणा, कोप, लज्जा और भयसे भरे हुए ही वहाँसे प्रस्थान किया और चुपचाप सीताजी- के चरणकमलोंमें सिर नवाया। तुलसीदासकी रसना रूखी है, इसी- से वह उस स्नेहसर्वस्व समयका वर्णन कर सकी है [अन्यथा सरस- हृदय तो उसका वर्णन ही नहीं कर सकते] ॥ ४ ॥ हनूमान्जीका भगवान् रामके पास पहुंचना राग बसन्त [ १६ ] रघुपति ! देखो आयो हनूमंत । लंकेस-नगर खेल्यो बसंत ॥ १॥ श्रीराम-काजहित सुदिन साधि । साथी प्रबोधि लाँघ्यो पयोधि ॥ २॥ सिय पाँय पूजि, आसिष पाइ । फल अमिय सरिस खायो अघाई ॥ ३॥ कानन दलि, होरी रचि बनाइ । हठि तेल बसन बालधि बँधाइ ॥ ४॥ लिए ढोल चले संग लोग लागि । बरजोर दई चहुँ ओर आगि ॥ ५॥ आखत आहुति किये जातुधान । लखि लपट भभरि भागे बिमान ॥ ६॥ नभतल कौतुक, लंका बिलाप । परिनाम पचहिं पातकी पाप ॥ ७॥
३११ सुन्दरकाण्ड हनुमान-हाँक सुनि बरषि फूल । सुर बार बार बरनहिं लँगूर ॥८॥ भरि भुवन सकल कल्यान-धूम । पुर जारि बारिनिधि बोरि लूम ॥६॥ जानकी तोषि पोषेउ प्रताप । जय पवन-सुवन दलि दुअन-दाप ॥१०॥ नाचहिं-कूदहिं कपि करि बिनोद । पीवत मधु मधुबन मगन मोद ॥११॥ यों कहत लषन गहे पाँय आइ । मनि सहित मुदित भेंटयो उठाइ ॥१२॥ लगे सजन सेन, भयो हियो हुलास । जयजय जस गावत तुलसिदास ॥१३॥ [ इस समय लक्ष्मणजी किष्किन्धापुरीमें गये हुए थे, वहाँ हनूमान्जीके लौटनेका समाचार पाकर भगवान् रामके पास आकर कहने लगे— ] 'रघुनाथजी ! देखिये, हनूमान्जी आ गये हैं, इन्होंने रावणके नगरमें खूब फाग खेला है ॥ १ ॥ ये रामकार्यके लिये शुभ दिन निश्चित कर अपने साथियोंको समझाकर समुद्र लांघ गये थे ॥ २ ॥ वहाँ उन्होंने सीताजीकी चरणवन्दना कर उनसे आशीर्वाद पाया और अशोकवनके अमृतसदृश फलोंको खूब पेट भरकर खाया ॥ ३ ॥ फिर उस वाटिकाको उजाड़कर इन्होंने होली- की तैयारी की और आग्रहपूर्वक अपनी पूंछको तेल और वस्त्रसे बँधवाया ॥ ४ ॥ उस समय लोग ढोल बजाते इनके संग हो लिये । तब इन्होंने चारों ओर आग लगा दी ॥ ५ ॥ उस अग्निमें इन्होंने राक्षसरूप आखत (नवीन अन्न) हवन किये । उसकी लपटें उठती देख- कर देवताओंके विमान भी भड़भड़ाकर भाग गये ॥ ६ ॥ उस समय आकाशमें बड़ा कुतूहल और लंकामें घोर विलाप होने लगा । पापीके पाप अन्तमें उसको जलाते ही हैं ॥ ७ ॥ देवतालोग हनूमान्जीकी गर्जना सुनकर बारंबार फूल बरसाते थे और इनकी पूंछकी प्रशंसा करते थे ॥ ८ ॥ इस प्रकार सम्पूर्ण लोकोंमें मङ्गलकी धूम मचा,
नगरको भस्म कर समुद्रमें पूँछ बुझायी और जानकीजीको धैर्य बँधा आपके प्रतापको पुष्ट किया। अतः शत्रुओंके दर्पको दलित करने- वाले पवननन्दन हनूमान्जीकी जय हो ॥९-१०॥ इस समय इनके साथी वानर क्रीड़ा करते हुए नाच-कूद रहे हैं और आनन्द- मग्न होकर मधुवनमें मधु पी रहे हैं ॥११॥ जिस समय लक्ष्मणजी ये सब बातें कह रहे थे, उसी समय हनूमान्जीने आकर प्रभुके चरण पकड़ लिये तथा रघुनाथजीने उन्हें चूड़ामणिके सहित उठाकर अति प्रसन्नतापूर्वक आलिङ्गन किया ॥१२॥ हनूमान्जीके आनेसे सबके हृदयमें बड़ा आनन्द हुआ और लोग सेना सजाने लगे। तुलसीदास भी जय-जयकार करते हुए उनका सुयश गाते हैं ॥१३॥ राग जैतश्री [ १७ ] सुनहु राम बिश्रामधाम हरि ! जनकसुता अति बिपति जैसे सहति । 'हे सौमित्रि-बंधु करुनानिधि !' मन महँ रटति, प्रगट नहिं कहति ॥१॥ निजपद-जलज बिलोकि सोकरत नयनांनि बारि रहत न एक छन । मनहु नील नोरज ससि, संभव रवि-बियोग दोउ स्रवत सुधाकन ॥२॥ बहु राच्छसी सहित तरुके तर तुम्हरे बिरह निज जनम बिगोवति । मनहु दुष्ट इंद्रिय संकट महँ बुद्धि बिबेक उदय मगु जोवति ॥३॥ सुनि कपि बचन बिचारि हृदय हरि अनपायनी सदा सो एक मन । तुलसिदास दुख-सुखातीत हरि सोच करत मानहु प्राकृत जन ॥४॥ [ हनूमान्जी बोले—] 'हे शान्तिधाम भगवान् राम ! जिस प्रकार जनकनन्दिनी अत्यन्त दुःख सहन करती हैं सो सुनिये ! वे अपनी वियोग-व्यथाको प्रकट नहीं कहतीं, हर समय मन-ही-मन
३१३ सुन्दरकाण्ड 'हे सौमित्रिबन्धो ! हे करुणानिधे !' ऐसा रटती रहती हैं ॥१॥ अपने चरणकमलोंकी ओर देखते हुए उनके शोकातुर नेत्रोंका जल एक क्षणके लिये भी बन्द नहीं होता, मानो चन्द्रमामें प्रकट हुए दो नीलकमल सूर्यका वियोग होनेके कारण अमृतकी बूंदें टपकाते रहते हों [ यहाँ सीताजीका मुख चन्द्रमा है, उनके नेत्र नीलकमल हैं, भगवान् राम सूर्य हैं और आँसू अमृतकी बूंदें हैं ] ॥२॥ वे आपके वियोगमें बहुत-सी राक्षसियोंके साथ एक वृक्षके नीचे बैठी हुईं अपना जीवन काट रही हैं, मानों दुष्ट इन्द्रियोंके बीचमें पड़ी हुई बुद्धि-विवेकके उदयका मार्ग देख रही हों ॥ ३॥ हनुमान्जीके ये वचन सुन भगवान्ने हृदयमें विचार किया कि जानकीजीके मनमें सर्वदा एकमात्र मेरी अनपायिनी भक्ति ही है। तुलसीदासजी कहते हैं, यह सोचकर सुख-दुःखसे अतीत श्रीहरि इस प्रकार शोक करने लगे, मानो कोई साधारण पुरुष हों ॥ ४ ॥ राग केदारा [ १८ ] रघुकुलतिलक ! बियोग तिहारे । मैं देखी जब जाइ जानकी, मनहु बिरह-मूरति मन मारे ॥१॥ चित्र-से नयन अरु गढ़े-से चरन-कर, मढ़े-श्रवन नहि सुनति पुकारे । रसना रटति नाम, कर सिर चिर रहै, नित निजपद-कमल निहारे॥२॥ दरसन-आस-लालसा मन महँ, राखे प्रभु-ध्यान प्रान-रखवारे । तुलसिदास पूजति त्रिजटा नीके रावरे गुन-गन-सुमन सँवारे ॥३॥ हे रघुकुलतिलक ! जिस समय मैंने जाकर जानकीजीको देखा, उस समय वे आपके वियोगमें व्यथित ऐसी जान पड़ती थीं, मानो
गीतावली ३१४ वियोगकी मूर्ति ही उदासचित्तसे बैठी हो ॥ १ ॥ उनके नेत्र चित्रके समान निश्चल थे, हाथ-पाँव मानो गढ़े-से जान पड़ते थे तथा कर्ण मढ़े हुए-से हो रहे थे; अतः वे पुकारनेपर भी नहीं सुनती थीं। वे जिह्वासे आपका नाम रटती रहती हैं, हाथ अधिक देरतक मस्तकपर ही रक्खा रहता है तथा नेत्र सर्वदा अपने ही चरणकमलोंकी ओर टकटकी लगाये रहते हैं ॥ २ ॥ उनके मनमें आपके दर्शनोंकी इच्छा है; अतः उन्होंने आपके ध्यानको ही अपने प्राणोंकी रखवालीपर रख छोड़ा है; तुलसीदासजी कहते हैं, हाँ, त्रिजटा राक्षसी आपके गुणगणरूप पुष्पोंसे उन्हें अवश्य अच्छी तरह पूजती रहती है ॥ ३ ॥ [ १९ ] अतिहि अधिक दरसनकी आरति। राम-बियोग असोक-बिटपतर सीय निमेष कलपसम टारति ॥१॥ बार बार बर बारिजलोचन भरि भरि बसत बारि उर ढारति। मनहु बिरहके सद्य घाय हिये लखि तकि तकि धरि धीरज तारति ॥२॥ तुलसिदास जद्यपि निसिबासर छिन-छिन प्रभुमूरतिहि निहारति। मिटति न दुसह ताप तउ तनकी, यह बिचारि अंतर गति हारति ॥३॥ जानकीजीको आपके दर्शनोंकी बड़ी लालसा है। वे राम- वियोगमें उस अशोकवृक्षके नीचे एक-एक पलको कल्पके समान बिताती हैं ॥ १ ॥ वे अपने कमलरूप नेत्रोंमें गर्म जल भरकर बारंबार अपने हृदयपर डालती हैं, मानो हृदयमें विरहके नये-नये घाव देखकर वे धैर्यपूर्वक तक तककर उन्हें गर्म जलकी धारासे धोती हैं ॥ २ ॥ तुलसीदास कहते हैं, यद्यपि वे रात-दिन क्षण-क्षणमें प्रभुकी मूर्तिको दर्शन करती हैं तो भी उनके शरीरका दुःसह ताप दूर नहीं होता।
४. लंका एवं उत्तरकाण्ड: रावण-वध, राज्याभिषेक एवं रामराज्य पद उपसंहार
३१५ सुन्दरकाण्ड अतः आपके बाह्य वियोगके सामने उनका ध्यानादिजनित आन्तरिक सुख हार मान जाता है ॥ ३ ॥ [ २० ] तुम्हरे बिरह भई गति जोन । चित दै सुनहु, राम करुनानिधि ! जानौं कछु, पै सकौं कहिं हौं न ॥१॥ लोचन नीर कृपिनके धन ज्यों रहत निरंतर लोचनन-कोन । ‘हा’ धुनि-खगी लाज-पिंजरी महँ राखि हिये बड़े बधिक हठि मौन ॥२॥ जेहि बाटिका बसति, तहँ खग-मृग तजि-तजि भजे पुरातन भौन । स्वास-समीर भेंट भइ भोरेहु, तेहि मग पगु न धरचो तिहुँ पौन ॥३॥ तुलसिदास प्रभु ! दसा सीयको मुख करि कहत होति अति गौन । दीजै दरस, दूरि कीजै दुख, हौ तुम्ह आरत-आरति दोन ॥४॥ 'हे करुणानिधान रघुनाथजी ! आपके विरहमें जानकीजीकी जो गति हुई है, उसे ध्यान देकर सुनिये । मैं उसे कुछ जानता तो हूँ, पर कह नहीं सकता ॥ १ ॥ उनके नेत्रोंका जल कृपणके धनके समान सर्वदा नेत्रोंके कोनोंमें ही रह जाता है । मौनरूप भारी बधिकने ‘हा’ ध्वनिरूप पक्षिणीको हठपूर्वक लज्जारूप पिंजड़ेमें बंदकर हृदयमें ही रक्खा है। [अतः वह उनके हृदयमें ही रहती है, बाहर नहीं निकलने पाती] ॥ २ ॥ जिस वाटिकामें वे रहती हैं, वहाँके पशु- पक्षी [उनकी विरहाग्निसे संतप्त होकर] अपने पुराने निवासस्थानों- को छोड़कर चले गये हैं और उनके श्वासवायुके साथ भूलसे भी भेंट हो जानेपर शीतल-मन्द-सुगन्ध पवन फिर उस ओर पैर नहीं रखता ॥ ३ ॥ प्रभो ! सीताजीकी दशाका इस मुखसे वर्णन करनेसे तो वह अत्यन्त गौण-सी जान पड़ती है अतः अब आप उन्हें दर्शन
गीतावली ३१६ दीजिये और उनका दुःख दूर कीजिये, क्योंकि आप तो दीनजनों- के दुःखका दमन करनेवाले हैं ॥ ४ ॥ [ २१ ] कपिके सुनि कल कोमल बैन। प्रेमपुलकि सब गात सिथिल भए, भरे सलिल सरसीरुह-नैन ॥१॥ सिय-बियोग-सागर नागर-मनु बूडन लाग्यो सहित चित-चैन। लही नाव पवनज-प्रसन्नता, बरबस तहाँ गह्यो गुन मैन ॥२॥ सकत न बूझि कुसल, बूझे बिन गिरा बिपुल ब्याकुल उर-ऐन। ज्यों कुलीन शुचि सुमति बियोगिनि सनमुख सहै बिरह-सर पैन ॥३॥ धरि धरि धीर बीर कोसलपति किए जतन, सके उत्तरु दै न। तुलसिदास प्रभु सखा-अनुजसों सैनहिं कह्यो चलहु सजि सैन ॥४॥ हनूमान्जीके ये मधुर और कोमल वचन सुनकर रघुनाथजीके सब अङ्ग प्रेमसे पुलकित और शिथिल हो गये तथा उनके नेत्र-कमलों- में जल भर आया ॥ १ ॥ सीताजीके वियोगरूप समुद्रमें रामजीका मनरूप चतुर तैराक चित्तके आनन्दसहित डूबने लगा। इसी समय हनूमान्जीसे [सीताजीकी] सुधि पाकर उन्हें प्रसन्नतारूप नौका मिल गयी; तहाँ कामदेव (प्रेम) ने जबरदस्ती उस नावकी रस्सी- को पकड़ लिया कि पार न जा सकें ॥ २ ॥ इसलिये [गला भर आनेके कारण] वे सीताजीकी कुशल भी नहीं पूछ सकते थे और बिना पूछे उनकी वाणी भी हृदयरूप गृहमें अत्यन्त व्याकुल हो रही थी, जिस प्रकार कोई कुलीन और पवित्र बुद्धिवाली वियोगिनी स्त्री सामनेसे [अर्थात् दृढ़तापूर्वक] विरहके तीखे तीर सहन करती है ॥ ३ ॥ वीरवर कोसलनाथने अनेक बार धैर्य धारणकर बोलनेका
३१७ सुन्दरकाण्ड प्रयत्न किया, परंतु वे शब्द न निकाल सके। तुलसीदास कहते हैं, तब अन्तमें प्रभुने सखा सुग्रीव और भाई लक्ष्मणसे संकेतद्वारा कहा कि 'सेना सजाकर चलो' ॥ ४ ॥ वानरसेनाकी लंकायात्रा राग मारू [ २२ ] जब रघुबीर पयानो कीन्हों। क्षुभित सिंधु, डगमगत महीधर, सजि साहँग कर लीन्हों ॥ १ ॥ सुनि कठोर टंकोर घोर अति चौंके बिधि-त्रिपुरारि। जटापटल ते चली सुरसरी सकत न संभु संभारि ॥ २ ॥ भए बिकल दिग्पाल सकल, भय भरे भुवन दसचारि। खरभर लंक, ससंक दसानन, गरभ स्रवहिं अरि-नारि ॥ ३ ॥ कटकटात भट भालु, बिकट मरकट करि केहरि-नाद। कूदत करि रघुनाथ-सपथ उपरी-उपरा बदि बाद ॥ ४ ॥ गिरि तरुधर, नख मुख कराल, रद फालहु करत बिषाद। चले दस दिसि रिस भरि 'धनु धरु' कहि, 'को बराक मनुजाद'? ॥ ५ ॥ पवन पंगु पावक-पतंग-ससि दुरि गए, थके बिमान। जाचत सुर निमेष, सुरनायक नयन-भार अकुलान ॥ ६ ॥ गए पूरि सर धूरि, भूरि भय अग थल जलधि समान। नभ-निसान, हनुमान-हांक सुनि समुझत कोउ न अपान ॥ ७ ॥ दिग्गज-कमठ-कोल-सहसानन धरत धरनि धरि धीर। बारहि बार अमरषत, करषत, करकें परीं सरीर ॥ ८ ॥ चली चमू, चहु ओर सोर, कछु बनै न बरने भीर। किलकिलात, कसमसत, कोलाहल होत नीरनिधि तीर ॥ ९ ॥