भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 320

गीतावली ३१४ वियोगकी मूर्ति ही उदासचित्तसे बैठी हो ॥ १ ॥ उनके नेत्र चित्रके समान निश्चल थे, हाथ-पाँव मानो गढ़े-से जान पड़ते थे तथा कर्ण मढ़े हुए-से हो रहे थे; अतः वे पुकारनेपर भी नहीं सुनती थीं। वे जिह्वासे आपका नाम रटती रहती हैं, हाथ अधिक देरतक मस्तकपर ही रक्खा रहता है तथा नेत्र सर्वदा अपने ही चरणकमलोंकी ओर टकटकी लगाये रहते हैं ॥ २ ॥ उनके मनमें आपके दर्शनोंकी इच्छा है; अतः उन्होंने आपके ध्यानको ही अपने प्राणोंकी रखवालीपर रख छोड़ा है; तुलसीदासजी कहते हैं, हाँ, त्रिजटा राक्षसी आपके गुणगणरूप पुष्पोंसे उन्हें अवश्य अच्छी तरह पूजती रहती है ॥ ३ ॥ [ १९ ] अतिहि अधिक दरसनकी आरति। राम-बियोग असोक-बिटपतर सीय निमेष कलपसम टारति ॥१॥ बार बार बर बारिजलोचन भरि भरि बसत बारि उर ढारति। मनहु बिरहके सद्य घाय हिये लखि तकि तकि धरि धीरज तारति ॥२॥ तुलसिदास जद्यपि निसिबासर छिन-छिन प्रभुमूरतिहि निहारति। मिटति न दुसह ताप तउ तनकी, यह बिचारि अंतर गति हारति ॥३॥ जानकीजीको आपके दर्शनोंकी बड़ी लालसा है। वे राम- वियोगमें उस अशोकवृक्षके नीचे एक-एक पलको कल्पके समान बिताती हैं ॥ १ ॥ वे अपने कमलरूप नेत्रोंमें गर्म जल भरकर बारंबार अपने हृदयपर डालती हैं, मानो हृदयमें विरहके नये-नये घाव देखकर वे धैर्यपूर्वक तक तककर उन्हें गर्म जलकी धारासे धोती हैं ॥ २ ॥ तुलसीदास कहते हैं, यद्यपि वे रात-दिन क्षण-क्षणमें प्रभुकी मूर्तिको दर्शन करती हैं तो भी उनके शरीरका दुःसह ताप दूर नहीं होता।