गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१३ सुन्दरकाण्ड 'हे सौमित्रिबन्धो ! हे करुणानिधे !' ऐसा रटती रहती हैं ॥१॥ अपने चरणकमलोंकी ओर देखते हुए उनके शोकातुर नेत्रोंका जल एक क्षणके लिये भी बन्द नहीं होता, मानो चन्द्रमामें प्रकट हुए दो नीलकमल सूर्यका वियोग होनेके कारण अमृतकी बूंदें टपकाते रहते हों [ यहाँ सीताजीका मुख चन्द्रमा है, उनके नेत्र नीलकमल हैं, भगवान् राम सूर्य हैं और आँसू अमृतकी बूंदें हैं ] ॥२॥ वे आपके वियोगमें बहुत-सी राक्षसियोंके साथ एक वृक्षके नीचे बैठी हुईं अपना जीवन काट रही हैं, मानों दुष्ट इन्द्रियोंके बीचमें पड़ी हुई बुद्धि-विवेकके उदयका मार्ग देख रही हों ॥ ३॥ हनुमान्जीके ये वचन सुन भगवान्ने हृदयमें विचार किया कि जानकीजीके मनमें सर्वदा एकमात्र मेरी अनपायिनी भक्ति ही है। तुलसीदासजी कहते हैं, यह सोचकर सुख-दुःखसे अतीत श्रीहरि इस प्रकार शोक करने लगे, मानो कोई साधारण पुरुष हों ॥ ४ ॥ राग केदारा [ १८ ] रघुकुलतिलक ! बियोग तिहारे । मैं देखी जब जाइ जानकी, मनहु बिरह-मूरति मन मारे ॥१॥ चित्र-से नयन अरु गढ़े-से चरन-कर, मढ़े-श्रवन नहि सुनति पुकारे । रसना रटति नाम, कर सिर चिर रहै, नित निजपद-कमल निहारे॥२॥ दरसन-आस-लालसा मन महँ, राखे प्रभु-ध्यान प्रान-रखवारे । तुलसिदास पूजति त्रिजटा नीके रावरे गुन-गन-सुमन सँवारे ॥३॥ हे रघुकुलतिलक ! जिस समय मैंने जाकर जानकीजीको देखा, उस समय वे आपके वियोगमें व्यथित ऐसी जान पड़ती थीं, मानो