गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनगरको भस्म कर समुद्रमें पूँछ बुझायी और जानकीजीको धैर्य बँधा आपके प्रतापको पुष्ट किया। अतः शत्रुओंके दर्पको दलित करने- वाले पवननन्दन हनूमान्जीकी जय हो ॥९-१०॥ इस समय इनके साथी वानर क्रीड़ा करते हुए नाच-कूद रहे हैं और आनन्द- मग्न होकर मधुवनमें मधु पी रहे हैं ॥११॥ जिस समय लक्ष्मणजी ये सब बातें कह रहे थे, उसी समय हनूमान्जीने आकर प्रभुके चरण पकड़ लिये तथा रघुनाथजीने उन्हें चूड़ामणिके सहित उठाकर अति प्रसन्नतापूर्वक आलिङ्गन किया ॥१२॥ हनूमान्जीके आनेसे सबके हृदयमें बड़ा आनन्द हुआ और लोग सेना सजाने लगे। तुलसीदास भी जय-जयकार करते हुए उनका सुयश गाते हैं ॥१३॥ राग जैतश्री [ १७ ] सुनहु राम बिश्रामधाम हरि ! जनकसुता अति बिपति जैसे सहति । 'हे सौमित्रि-बंधु करुनानिधि !' मन महँ रटति, प्रगट नहिं कहति ॥१॥ निजपद-जलज बिलोकि सोकरत नयनांनि बारि रहत न एक छन । मनहु नील नोरज ससि, संभव रवि-बियोग दोउ स्रवत सुधाकन ॥२॥ बहु राच्छसी सहित तरुके तर तुम्हरे बिरह निज जनम बिगोवति । मनहु दुष्ट इंद्रिय संकट महँ बुद्धि बिबेक उदय मगु जोवति ॥३॥ सुनि कपि बचन बिचारि हृदय हरि अनपायनी सदा सो एक मन । तुलसिदास दुख-सुखातीत हरि सोच करत मानहु प्राकृत जन ॥४॥ [ हनूमान्जी बोले—] 'हे शान्तिधाम भगवान् राम ! जिस प्रकार जनकनन्दिनी अत्यन्त दुःख सहन करती हैं सो सुनिये ! वे अपनी वियोग-व्यथाको प्रकट नहीं कहतीं, हर समय मन-ही-मन