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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

नगरको भस्म कर समुद्रमें पूँछ बुझायी और जानकीजीको धैर्य बँधा आपके प्रतापको पुष्ट किया। अतः शत्रुओंके दर्पको दलित करने- वाले पवननन्दन हनूमान्जीकी जय हो ॥९-१०॥ इस समय इनके साथी वानर क्रीड़ा करते हुए नाच-कूद रहे हैं और आनन्द- मग्न होकर मधुवनमें मधु पी रहे हैं ॥११॥ जिस समय लक्ष्मणजी ये सब बातें कह रहे थे, उसी समय हनूमान्जीने आकर प्रभुके चरण पकड़ लिये तथा रघुनाथजीने उन्हें चूड़ामणिके सहित उठाकर अति प्रसन्नतापूर्वक आलिङ्गन किया ॥१२॥ हनूमान्जीके आनेसे सबके हृदयमें बड़ा आनन्द हुआ और लोग सेना सजाने लगे। तुलसीदास भी जय-जयकार करते हुए उनका सुयश गाते हैं ॥१३॥ राग जैतश्री [ १७ ] सुनहु राम बिश्रामधाम हरि ! जनकसुता अति बिपति जैसे सहति । 'हे सौमित्रि-बंधु करुनानिधि !' मन महँ रटति, प्रगट नहिं कहति ॥१॥ निजपद-जलज बिलोकि सोकरत नयनांनि बारि रहत न एक छन । मनहु नील नोरज ससि, संभव रवि-बियोग दोउ स्रवत सुधाकन ॥२॥ बहु राच्छसी सहित तरुके तर तुम्हरे बिरह निज जनम बिगोवति । मनहु दुष्ट इंद्रिय संकट महँ बुद्धि बिबेक उदय मगु जोवति ॥३॥ सुनि कपि बचन बिचारि हृदय हरि अनपायनी सदा सो एक मन । तुलसिदास दुख-सुखातीत हरि सोच करत मानहु प्राकृत जन ॥४॥ [ हनूमान्जी बोले—] 'हे शान्तिधाम भगवान् राम ! जिस प्रकार जनकनन्दिनी अत्यन्त दुःख सहन करती हैं सो सुनिये ! वे अपनी वियोग-व्यथाको प्रकट नहीं कहतीं, हर समय मन-ही-मन

३१३ सुन्दरकाण्ड 'हे सौमित्रिबन्धो ! हे करुणानिधे !' ऐसा रटती रहती हैं ॥१॥ अपने चरणकमलोंकी ओर देखते हुए उनके शोकातुर नेत्रोंका जल एक क्षणके लिये भी बन्द नहीं होता, मानो चन्द्रमामें प्रकट हुए दो नीलकमल सूर्यका वियोग होनेके कारण अमृतकी बूंदें टपकाते रहते हों [ यहाँ सीताजीका मुख चन्द्रमा है, उनके नेत्र नीलकमल हैं, भगवान् राम सूर्य हैं और आँसू अमृतकी बूंदें हैं ] ॥२॥ वे आपके वियोगमें बहुत-सी राक्षसियोंके साथ एक वृक्षके नीचे बैठी हुईं अपना जीवन काट रही हैं, मानों दुष्ट इन्द्रियोंके बीचमें पड़ी हुई बुद्धि-विवेकके उदयका मार्ग देख रही हों ॥ ३॥ हनुमान्‌जीके ये वचन सुन भगवान्‌ने हृदयमें विचार किया कि जानकीजीके मनमें सर्वदा एकमात्र मेरी अनपायिनी भक्ति ही है। तुलसीदासजी कहते हैं, यह सोचकर सुख-दुःखसे अतीत श्रीहरि इस प्रकार शोक करने लगे, मानो कोई साधारण पुरुष हों ॥ ४ ॥ राग केदारा [ १८ ] रघुकुलतिलक ! बियोग तिहारे । मैं देखी जब जाइ जानकी, मनहु बिरह-मूरति मन मारे ॥१॥ चित्र-से नयन अरु गढ़े-से चरन-कर, मढ़े-श्रवन नहि सुनति पुकारे । रसना रटति नाम, कर सिर चिर रहै, नित निजपद-कमल निहारे॥२॥ दरसन-आस-लालसा मन महँ, राखे प्रभु-ध्यान प्रान-रखवारे । तुलसिदास पूजति त्रिजटा नीके रावरे गुन-गन-सुमन सँवारे ॥३॥ हे रघुकुलतिलक ! जिस समय मैंने जाकर जानकीजीको देखा, उस समय वे आपके वियोगमें व्यथित ऐसी जान पड़ती थीं, मानो

गीतावली ३१४ वियोगकी मूर्ति ही उदासचित्तसे बैठी हो ॥ १ ॥ उनके नेत्र चित्रके समान निश्चल थे, हाथ-पाँव मानो गढ़े-से जान पड़ते थे तथा कर्ण मढ़े हुए-से हो रहे थे; अतः वे पुकारनेपर भी नहीं सुनती थीं। वे जिह्वासे आपका नाम रटती रहती हैं, हाथ अधिक देरतक मस्तकपर ही रक्खा रहता है तथा नेत्र सर्वदा अपने ही चरणकमलोंकी ओर टकटकी लगाये रहते हैं ॥ २ ॥ उनके मनमें आपके दर्शनोंकी इच्छा है; अतः उन्होंने आपके ध्यानको ही अपने प्राणोंकी रखवालीपर रख छोड़ा है; तुलसीदासजी कहते हैं, हाँ, त्रिजटा राक्षसी आपके गुणगणरूप पुष्पोंसे उन्हें अवश्य अच्छी तरह पूजती रहती है ॥ ३ ॥ [ १९ ] अतिहि अधिक दरसनकी आरति। राम-बियोग असोक-बिटपतर सीय निमेष कलपसम टारति ॥१॥ बार बार बर बारिजलोचन भरि भरि बसत बारि उर ढारति। मनहु बिरहके सद्य घाय हिये लखि तकि तकि धरि धीरज तारति ॥२॥ तुलसिदास जद्यपि निसिबासर छिन-छिन प्रभुमूरतिहि निहारति। मिटति न दुसह ताप तउ तनकी, यह बिचारि अंतर गति हारति ॥३॥ जानकीजीको आपके दर्शनोंकी बड़ी लालसा है। वे राम- वियोगमें उस अशोकवृक्षके नीचे एक-एक पलको कल्पके समान बिताती हैं ॥ १ ॥ वे अपने कमलरूप नेत्रोंमें गर्म जल भरकर बारंबार अपने हृदयपर डालती हैं, मानो हृदयमें विरहके नये-नये घाव देखकर वे धैर्यपूर्वक तक तककर उन्हें गर्म जलकी धारासे धोती हैं ॥ २ ॥ तुलसीदास कहते हैं, यद्यपि वे रात-दिन क्षण-क्षणमें प्रभुकी मूर्तिको दर्शन करती हैं तो भी उनके शरीरका दुःसह ताप दूर नहीं होता।

४. लंका एवं उत्तरकाण्ड: रावण-वध, राज्याभिषेक एवं रामराज्य पद उपसंहार

३१५ सुन्दरकाण्ड अतः आपके बाह्य वियोगके सामने उनका ध्यानादिजनित आन्तरिक सुख हार मान जाता है ॥ ३ ॥ [ २० ] तुम्हरे बिरह भई गति जोन । चित दै सुनहु, राम करुनानिधि ! जानौं कछु, पै सकौं कहिं हौं न ॥१॥ लोचन नीर कृपिनके धन ज्यों रहत निरंतर लोचनन-कोन । ‘हा’ धुनि-खगी लाज-पिंजरी महँ राखि हिये बड़े बधिक हठि मौन ॥२॥ जेहि बाटिका बसति, तहँ खग-मृग तजि-तजि भजे पुरातन भौन । स्वास-समीर भेंट भइ भोरेहु, तेहि मग पगु न धरचो तिहुँ पौन ॥३॥ तुलसिदास प्रभु ! दसा सीयको मुख करि कहत होति अति गौन । दीजै दरस, दूरि कीजै दुख, हौ तुम्ह आरत-आरति दोन ॥४॥ 'हे करुणानिधान रघुनाथजी ! आपके विरहमें जानकीजीकी जो गति हुई है, उसे ध्यान देकर सुनिये । मैं उसे कुछ जानता तो हूँ, पर कह नहीं सकता ॥ १ ॥ उनके नेत्रोंका जल कृपणके धनके समान सर्वदा नेत्रोंके कोनोंमें ही रह जाता है । मौनरूप भारी बधिकने ‘हा’ ध्वनिरूप पक्षिणीको हठपूर्वक लज्जारूप पिंजड़ेमें बंदकर हृदयमें ही रक्खा है। [अतः वह उनके हृदयमें ही रहती है, बाहर नहीं निकलने पाती] ॥ २ ॥ जिस वाटिकामें वे रहती हैं, वहाँके पशु- पक्षी [उनकी विरहाग्निसे संतप्त होकर] अपने पुराने निवासस्थानों- को छोड़कर चले गये हैं और उनके श्वासवायुके साथ भूलसे भी भेंट हो जानेपर शीतल-मन्द-सुगन्ध पवन फिर उस ओर पैर नहीं रखता ॥ ३ ॥ प्रभो ! सीताजीकी दशाका इस मुखसे वर्णन करनेसे तो वह अत्यन्त गौण-सी जान पड़ती है अतः अब आप उन्हें दर्शन

गीतावली ३१६ दीजिये और उनका दुःख दूर कीजिये, क्योंकि आप तो दीनजनों- के दुःखका दमन करनेवाले हैं ॥ ४ ॥ [ २१ ] कपिके सुनि कल कोमल बैन। प्रेमपुलकि सब गात सिथिल भए, भरे सलिल सरसीरुह-नैन ॥१॥ सिय-बियोग-सागर नागर-मनु बूडन लाग्यो सहित चित-चैन। लही नाव पवनज-प्रसन्नता, बरबस तहाँ गह्यो गुन मैन ॥२॥ सकत न बूझि कुसल, बूझे बिन गिरा बिपुल ब्याकुल उर-ऐन। ज्यों कुलीन शुचि सुमति बियोगिनि सनमुख सहै बिरह-सर पैन ॥३॥ धरि धरि धीर बीर कोसलपति किए जतन, सके उत्तरु दै न। तुलसिदास प्रभु सखा-अनुजसों सैनहिं कह्यो चलहु सजि सैन ॥४॥ हनूमान्‌जीके ये मधुर और कोमल वचन सुनकर रघुनाथजीके सब अङ्ग प्रेमसे पुलकित और शिथिल हो गये तथा उनके नेत्र-कमलों- में जल भर आया ॥ १ ॥ सीताजीके वियोगरूप समुद्रमें रामजीका मनरूप चतुर तैराक चित्तके आनन्दसहित डूबने लगा। इसी समय हनूमान्‌जीसे [सीताजीकी] सुधि पाकर उन्हें प्रसन्नतारूप नौका मिल गयी; तहाँ कामदेव (प्रेम) ने जबरदस्ती उस नावकी रस्सी- को पकड़ लिया कि पार न जा सकें ॥ २ ॥ इसलिये [गला भर आनेके कारण] वे सीताजीकी कुशल भी नहीं पूछ सकते थे और बिना पूछे उनकी वाणी भी हृदयरूप गृहमें अत्यन्त व्याकुल हो रही थी, जिस प्रकार कोई कुलीन और पवित्र बुद्धिवाली वियोगिनी स्त्री सामनेसे [अर्थात् दृढ़तापूर्वक] विरहके तीखे तीर सहन करती है ॥ ३ ॥ वीरवर कोसलनाथने अनेक बार धैर्य धारणकर बोलनेका

३१७ सुन्दरकाण्ड प्रयत्न किया, परंतु वे शब्द न निकाल सके। तुलसीदास कहते हैं, तब अन्तमें प्रभुने सखा सुग्रीव और भाई लक्ष्मणसे संकेतद्वारा कहा कि 'सेना सजाकर चलो' ॥ ४ ॥ वानरसेनाकी लंकायात्रा राग मारू [ २२ ] जब रघुबीर पयानो कीन्हों। क्षुभित सिंधु, डगमगत महीधर, सजि साहँग कर लीन्हों ॥ १ ॥ सुनि कठोर टंकोर घोर अति चौंके बिधि-त्रिपुरारि। जटापटल ते चली सुरसरी सकत न संभु संभारि ॥ २ ॥ भए बिकल दिग्पाल सकल, भय भरे भुवन दसचारि। खरभर लंक, ससंक दसानन, गरभ स्रवहिं अरि-नारि ॥ ३ ॥ कटकटात भट भालु, बिकट मरकट करि केहरि-नाद। कूदत करि रघुनाथ-सपथ उपरी-उपरा बदि बाद ॥ ४ ॥ गिरि तरुधर, नख मुख कराल, रद फालहु करत बिषाद। चले दस दिसि रिस भरि 'धनु धरु' कहि, 'को बराक मनुजाद'? ॥ ५ ॥ पवन पंगु पावक-पतंग-ससि दुरि गए, थके बिमान। जाचत सुर निमेष, सुरनायक नयन-भार अकुलान ॥ ६ ॥ गए पूरि सर धूरि, भूरि भय अग थल जलधि समान। नभ-निसान, हनुमान-हांक सुनि समुझत कोउ न अपान ॥ ७ ॥ दिग्गज-कमठ-कोल-सहसानन धरत धरनि धरि धीर। बारहि बार अमरषत, करषत, करकें परीं सरीर ॥ ८ ॥ चली चमू, चहु ओर सोर, कछु बनै न बरने भीर। किलकिलात, कसमसत, कोलाहल होत नीरनिधि तीर ॥ ९ ॥

गीतावली ३१८ जातुधानपति जानि कालबस मिले बिभीषन आइ। सरनागत-पालक कृपालु कियो तिलक, लियो अपनाइ॥ १०॥ कौतुकही बारिधि बँधाइ उतरे सुबेल-तट जाइ। तुलसिदास गढ़ देखि फिरे कपि, प्रभु-आगमन सुनाइ॥ ११॥ जिस समय रघुनाथजीने प्रयाण किया उस समय समुद्र क्षुभित हो गया और पर्वत डगमगाने लगे। इसी समय भगवान्ने अपना धनुष चढ़ाकर हाथमें उठाया॥ १॥ उसकी अति कठोर और भयंकर टंकार सुनकर ब्रह्मा और महादेव आदि चौंक पड़े। गङ्गाजी भगवान् शंकरके जटाजूटसे खिसकने लगीं, वे उन्हें सँभाल न सके। ॥ २॥ सारे दिक्पाल व्याकुल हो गये, चौदहों भुवन भयसे भर गये। लंकामें खलबली पड़ गयी, रावणके कान खड़े हो गये तथा शत्रुओंकी स्त्रियोंके गर्भ गिरने लगे॥४॥ रीछ और वानर बीर विकट सिंहनाद करते हुए दाँत पीसने लगे और शर्त लगाकर रघुनाथजीकी शपथ खाकर वे चढ़ा,ऊपरी करते हुए कूदने लगे ॥ ४॥ वे पर्वत तथा वृक्षोंको उठाये हुए थे; उनके तीखे नख तथा मुखमें पैने दाँत देखकर साक्षात् काल भी भय मानता था। वे दसों दिशाओंमें क्रोधसे भरकर 'पकड़ लो, पकड़ लो, यह बेचारा राक्षस है ही क्या चीज!' इस प्रकार कहते हुए चल रहे थे॥ ५॥ [इस वानर-सेनाके चलते समय इतनी धूल उड़ी कि] पवन पंगु हो गया, अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा छिप गये तथा विमान थकित हो गये; देवता लोग पलक मारनेके लिये प्रार्थना करने लगे* और इन्द्र *क्योंकि देवताओंके पलक बंद नहीं होत और इस समय धूलिके कारण उन्हें बहुत दुःख हो रहा था। इन्द्रके सहस्र नेत्रोंमें धूलि भरकर पूरा बोझा हो गया।

३१६ सुन्दरकाण्ड नेत्रोंके भारसे व्याकुल हो गया ॥ ६ ॥ बहुतसे सरोवर धूलसे भर गये और अत्यन्त भयसे [पर्वतोंके उखड़ जानेसे उनके स्थानमें जल भर जानेके कारण] अनेकों पहाड़ी प्रदेश समुद्रवत् हो गये । आकाशमें देवताओंके ढोल और हनूमान्‌जीकी गर्जनाका कोलाहल सुनकर कोई अपने कथनको भी नहीं समझ सकता था ॥ ७ ॥ दिग्गज, कूर्म, वराह और शेषनाग जैसे-तैसे धीरज धरकर पृथिवीको धारण करते थे । उनके शरीरोंमें बोझको सहते-सहते हड्डियाँ कड़क उठी हैं, इसलिये वे बारम्बार झुंझलाकर उसे तानते थे ॥ ८ ॥ इस प्रकार जब वानरोंकी सेनाने कूच किया तो चारों ओर कोलाहल छा गया । उसभीड़का कुछ वर्णनकरते नहीं बनता । वानरगण किलकिलाते थे और वे एक दूसरेसे ठसे हुए थे । इस प्रकार उस समय समुद्रतट- पर बड़ा कोलाहल हो रहा था ॥ ९ ॥ इसी समय राक्षसको कालके अधीन देख विभीषणजी भगवान्‌से आकर मिले; तब शरणागतवत्सल प्रभुने उनका वहीं अभिषेक करके अपना लिया ॥ १० ॥ फिर कौतुकसे ही समुद्रपर पुल बाँधकर वे सुबेल पर्वतके पास जाकर ठहर गये । तुलसीदास कहते हैं, वहाँ पहुँचकर वानरगण लंकाका किला देखकर प्रभुके आगमनकी सूचना देकर लौट आये ॥ ११ ॥ रावणकी मन्त्रणा राग आसावरी [ २३ ] आये देखि दूत, सुनि सोच सठ-मनमैं । बाहर बजावै गाल, भालु-कपि कालबस मोसे बीरसों चहत जीत्यो रारि रनमैं ॥ १ ॥

गीतावली ३२० राम छाम, लरिका लषन, बालि-बालकहि घालि को गनत ? रीछ जल ज्यों न घनमैं । काजको न कपिराज, कायर कपिसमाज, मेरे अनुमान हनुमान हरिगनमैं ॥ २ ॥ समय सयानी मृदु बानी रानी कहै पिय ! पावक न होइ जातुधान बेनु-बनमैं । तुलसी जानकी दिए, स्वामीसों सनेह किये कुसल, नतरु सब ह्वै हैं छार छनमैं ॥ ३ ॥ रावणके दूत भगवान्‌की सेनाको देख आये थे । दूतोंसे उनका समाचार सुन वह मनमें सोच रखकर ऊपरसे गाल बजाने लगा कि 'अहो ! कालके वशीभूत होकर ये रीछ और वानर युद्धमें मुझ- जैसे वीरसे लड़कर विजय प्राप्त करना चाहते हैं ! ॥ १ ॥ राम तो [सीताके वियोगमें] बहुत दुर्बल हैं; लक्ष्मण अभी लड़का ही है; बालिका पुत्र अपने ही कुलका घातक है, उसे तो गिनता ही कौन है ? और जाम्बवान् जलहीन मेघकी भाँति निस्सार है । सुग्रीव किसी भी अर्थका नहीं है और सारा ही वानरसमाज कायर है । हाँ, मेरे अनुमानसे इन वानरोंमें एक हनूमान् अवश्य ही शूरवीर है' ॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, इसी समय परम चतुर महारानी मंदोदरीने मधुरस्वरसे कहा—'प्रियतम ! आप राक्षसकुलरूप बाँसोंके वनमें अग्नि न बनें, इस समय जानकीको देने और प्रभुसे प्रेम करनेमें ही कुशल है; नहीं तो एक क्षणमें ही सब नष्ट हो जायगा' ॥ ३ ॥

३२१ सुन्दरकाण्ड [ २४ ] आपनी आपनी भाँति सब काहू की है। मंदोदरी, महोदर, मालवान महामति, राजनीति पहुँच जहाँलौं जाकी रही है ॥ १ ॥ महामद-अंध दसकंध न करत कान, मीचु-बस नीच हठि कुगहनि गही है। हँसि कहै, सचिव सयाने मोसों यों कहत, चहै मेरु उड़न, बड़ी बयारि बही है ॥ २ ॥ भालु, नर, बानर अहार निसिचरनिको, सोऊ नृप-बालकनि मांगी छारि लही है। देखो कालकौतुक, पिपीलिकनि पंख लागो, भाग मेरे लोगनिके भई चित-चही है ॥ ३ ॥ 'तोसो न तिलोक आजु साहस, समाज-साजु, महाराज-आयसु भो जोई, सोई सही है'। तुलसी प्रनामकै बिभीषन बिनती करै 'खग्राल बेधे ताल, कपि केलि लंका दही है' ॥ ४ ॥ इसी प्रकार मन्दोदरी, महोदर और महापति माल्यवान् आदि सभीने जिसकी जहाँतक राजनीतिमें पहुँच थी, अपनी-अपनी विधिसे रावणसे बहुत कुछ कहा ॥ १ ॥ किन्तु महान् मदसे अंधा रहनेके कारण उसने कुछ भी नहीं सुना। उस नीचने मृत्युके वशीभूत होकर आग्रहपूर्वक कुमार्गको ही ग्रहण किया। वह हँसकर कहने लगा—'अहा ! हमारे चतुरमन्त्री मानो ऐसी बात कहते हैं कि भाई ! बड़ी तेज हवा चल रही हैं, इसलिये सुमेरु पर्वत उड़ना चाहता है ! ॥ २ ॥ अरे ! रीछ, वानर और मनुष्य तो स्वभावसे ही गी० २१—

गीतावली ३२२ राक्षसोंके आहार हैं; तिसपर भी इन राजकुमारोंको यह माँगी हुई सेना प्राप्त हुई है। कालका खेल तो देखो, आज चींटियोंके पर लगने लगे; मेरे भाग्यसे ही लोगोंकी चितचाही हुई है [इसीसे उन्हें अनायास भरपेट आहार मिला है] ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, तब विभीषणने प्रणाम कर कहा—'महाराज ! आपकी जैसी आज्ञा है वही होगा, सचमुच आज त्रिलोकीमें साहस और सैन्य- बलमें आपके समान कोई नहीं है; [परंतु उधरका भी बल देख लीजिये।] भगवान् रामने [बालिवधके समय] संकल्पमात्रसे ही सात तालवृक्षोंको वेध दिया था और वानर हनुमान्ने खेलहीमें लङ्काको भस्म कर दिया था !' ॥ ४ ॥ [ २५ ] दूसरो न देखतु साहिब सम रामै । बेदऊ पुरान, कबि-कोबिद बिरंच-रत, जाको जस सुनत गावत गुन-ग्रामै ॥ १ ॥ माया-जीव, जग-जाल, सुभाउ, करम-काल, सबको सासकु, सब मैं, सब जामैँ । बिधि-से करनिहार, हरिसे, पालनिहार हर-से हरनिहार जपै जाके नामैँ ॥ २ ॥ सोइ नरबेष जानि, जनकी बिनती मानि, मतौ नाथ सोई, जातें भलो परिनामैं । सुभट-सिरोमनि कुठारपानि सारिखेहू लखी श्रौ लखाई, इहाँ किए सुभ सामैं ॥ ३ ॥ बचन-बिभूषन बिभीषन-बचन सुनि लागे दुख दूषन-से दाहिनेउ बामैं ।

३२३ सुन्दरकाण्ड तुपसो हुमकि हिये हन्यो लात, 'भले तात,' चल्यो सुरतरु ताकि तजि घोर घामैं ॥ ४ ॥ [विभीषण रावणसे कह रहा है—] 'रामके समान कोई और स्वामी दिखलायी नहीं देता, जिनके बिरदके बखानमें वेद, पुराण, कवि और विद्वज्जन रत रहते हैं तथा जिनके सुयशका श्रवण और गुणसमूहका गान करते रहते हैं ॥१॥ जो माया जीव, जगज्जाल, स्वभाव कर्म और काल—सबका शासक है, जो सबमें व्याप्त है और जिसमें सब स्थित हैं तथा जिनके नामको ब्रह्मा-जैसे रचयिता, विष्णु- जैसे पालक और शंकर-जैसे संहारक जपते रहते हैं ॥ २ ॥ वे ही राम नर-वेषमें अवतरित हुए हैं ऐसा जानो और मुझ दासकी विनय मान- कर ऐसी सलाह करो जिससे अन्तमें भला हो । देखो, कुठारधारी परशु जैसे शूरशिरोमणिने भी देख-दिखाकर समझ लिया कि यहाँ [अर्थात् रामसे] सन्धि कर लेनेमें ही कल्याण है' ॥ ३ ॥ विभीषण- के ये वाणीको विभूषित करनेवाले वचन सुनकर रावणको अनुकूल होनेपर भी अत्यन्त प्रतिकूल तथा दुःखमय और दूषित जान पड़े । अतः उसने हुमकर उनकी छातीमें लात मारी, तब विभीषण 'भैया ! अच्छा ! !' ऐसा कह [रावणरूप] घोर घामको त्यागकर [रामरूप] कल्पवृक्षकी ओर चल पड़े ॥ ४ ॥ विभीषण-शरणागति [ २६ ] जाय माय पायँ परि कथा सो सुनाई है । समाधान करति बिभीषनको बार बार, 'कहा भयो तात ! लात मारे, बड़ो भाई ॥ १ ॥

गीतावली ३२४ साहिब, पितु समान, जातुधानको तिलक, ताके अपमान तेरी बड़िए बड़ाई है। गरत गलानि जानि, सनमानि सिख देति, 'रोष किये दोष, सहें समुझें भलाई है ॥ २ ॥ इहांतें बिमुख भये, रामको सरन गए भलो नेकु, लोक राखे निपट निकाई हैं'। मातु-पंग सीस नाइ, तुलसी असीस पाइ चले भले सगुन, कहत 'मन भाई' है ॥ ३ ॥ विभीषणने अपनी माताके पास जाकर उसके चरणोंमें गिर वह सब वृत्तान्त सुना दिया। माता बारम्बार उन्हें समझाने लगी— 'भैया ! उसके लात मारनेसे क्या हुआ, आखिर तो वह तेरा बड़ा भाई ही है ॥ १ ॥ वह प्रथम तो तेरा स्वामी, दूसरे पिताके समान ज्येष्ठ भ्राता और तिसपर भी राक्षसकुलका तिलक है। उसके तो अपमान करनेमें भी तेरा बड़ा सम्मान ही है।' विभीषणको अत्यन्त खिन्न देख वह इसी प्रकार बहुत सत्कारपूर्वक समझाने लगी और बोली—'भैया ! इस समय क्रोध करनेमें तो बड़ा भारी दोष है और सहने-समझ लेनेमें सब प्रकार भलाई है ॥ २ ॥ हाँ, यहाँसे विमुख होकर रामकी शरण चले जानेमें थोड़ी-सी भलाई अवश्य है, फिर भी यदि लोककी रक्षा कर सको तो पूरी भलाई है।' [अर्थात् भाई का पक्ष छोड़नेकी अपेक्षा उसका पक्ष ग्रहण करके व्यवहारकी रक्षा करना ही उत्तम है।] तुलसीदासजी कहते हैं, तब विभीषण माताके चरणोंमें सिर नवा उसका आशीर्वाद पा वहाँसे चल पड़े। मार्गमें अच्छे-अच्छे शकुन होते देखकर कहने लगे—'मेरा तो मन- चाहा हो गया' ॥ ३ ॥

३२५ सुन्दरकाण्ड 【 २७ 】 'भाई को सो करौं, डरौं कठिन कुफेरें । सुकृत-संकट परचो, जात गलानिन्ह गरचो, कृपानिधिको मिलौं पै मिलिकै कुबेरें' ॥ १ ॥ जाइ गह पांय, धाइ धनद उठाइ भेट्यो, समाचार पाइ पोच सोचत सुमेरें । तहँई मिले महेस, दियो हित उपदेस, रामकी सरन जाहि 'सुदिनु न हेरें ॥ २ ॥ जाको नाम कुंभज कलेस-सिंधु सोखिबेको, मेरो कह्यो मानि, तात ! बांधे जिनि बेरें । तुलसी मुदित चले, पाये हैं सगुन भले, रंक लूटिबेको मानो मनिगन-ढेरें ॥ ३ ॥ विभीषणजी इस प्रकार चिन्ता करने लगे—'मुझे भाईका-सा व्यवहार करना चाहिये, परन्तु बड़े भारी कुफेर (अड़चन) से मैं डर रहा हूँ।' इस प्रकार विभीषण धर्म-संकटमें पड़कर ग्लानिसे गले जा रहे थे। फिर उन्होंने निश्चय किया कि—'अच्छा, पहले भाई कुबेरसे मिलकर फिर कृपानिधान भगवान् रामसे मिलूंगा'॥१॥ ऐसा सोचकर उन्होंने कुबेरके पास जा उनके चरण पकड़ लिये । कुबेरजीने दौड़कर उन्हें उठाकर गले लगाया। फिर विभीषणसे कुसमाचार सुन, वे सुमेरुपर्वतपर खड़े-खड़े सोच-विचार करने लगे । उसी स्थानपर उन्हें श्रीमहादेवजी मिले; उन्होंने यह हितकर उपदेश दिया—'विभीषण ! तुम भगवान् रामकी शरण जाओ, इसमें कोई शुभ दिन देखनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ २ ॥ हे तात ! जिनका नाम क्लेशरूप समुद्रको सोखनेके लिये अगस्त्यके समान है, उनके

गीतावली ३२६ . पास पहुँचनेके लिये, मेरा उपदेश मानकर तुम किसी प्रकारका बेड़ा मत बाँधो [अर्थात् किसी प्रकारकी तैयारी मत करो]।' तुलसीदासजी कहते हैं, यह सुनकर विभीषणजी प्रसन्न होकर चल दिये। राहमें उन्हें अनेकों शुभ शकुन हुए, मानो कोई कंगाल मणियों- की ढेरी लूटनेके लिये जाता हो ॥ ३ ॥ राग केदारा [ २८ ] संकर-सिख-आसिष पाइकैं। चले मनहि मन कहत बिभीषन सीस महेसहि नाइकै ॥ १ ॥ गए सोच, भए सगुन, सुमंगल दस दिसि देत देखाइकें। सजल नयन, सानंद हृदय, तनु प्रेम-पुलक अधिकाइकें ॥ २ ॥ अंतहु भाव भलो भाईको, कियो अनभलो मनाइकै। भइ कूबरकी लात, बिधाता राखी बात बनाइकै ॥ ३ ॥ नाहित क्यों कुबेर घर मिलि हर हितु कहते चित लाइकै। जो सुनि सरन राम ताके मैं निज बामता बिहाइकै ॥ ४ ॥ अनायास अनुकूल कूलधर मग मुदमूल जनाइकै। कृपासिंधु सनमानि, जानि जन दीन लियो अपनाइकै ॥ ५ ॥ स्वारथ-परमारथ करतलगत, श्रमपथ गयो सिराइकै। सपने के सौतुक, सुख-सस सुर सींचत देत निराइकै ॥ ६ ॥ गुरु गौरीस, साँइ सीतापति, हित हनुमानहि जाइकै। मिलिहौं, मोहि कहा कीबे अब, अभिमत, अवधि अघाइकें ॥ ७ ॥ मरतो कहाँ जाइ, को जाने, लटि लालची ललाइकै। तुलसिदास भजिहौं रघुबीरहि अभय-निसान बजाइकै ॥ ८ ॥ श्रीमहादेवजीका उपदेश और आशीर्वाद पा विभीषणजी उन्हें

३२७ सुन्दरकाण्ड

सिर नवा मन-ही-मन यह कहते हुए चले ॥ १ ॥ दसों दिशाओंमें मङ्गलमय शकुन होते दिखायी दे रहे हैं—इससे उनका शोक दूर हो गया, नेत्रोंमें जल भर आया, हृदय आनन्दपूर्ण हो गया और शरीर प्रेमवश अत्यन्त पुलकित हो गया ॥ २ ॥ [वे कहने लगे—] 'आखिर, भाईका भाव तो मेरे लिये अच्छा ही हुआ, यद्यपि उसने यह कार्य तो मेरा अहित चाहकर ही किया था । विधाताने मेरी बात बना दी, अतः रावणकी लात मेरे लिये तो कूबरकी लात हो गयी [ अर्थात् जैसे कूबरमें लात लगनेसे वह सीधा हो जाता है, उसी प्रकार रावणकी लात लगनेसे मुझे भगवान् रामकी मङ्गलमयी शरण मिलनेकी सम्भावना हो गयी ] ॥ ३ ॥ यदि ऐसा न होता तो महादेवजी कुबेरके घर मिलकर हृदयमें मेरा हित विचार कर ऐसी बात क्यों कहते; जिसे सुनकर मैंने अपनी कुटिलता छोड़कर श्रीरामचन्द्रजीकी शरण ताकी है ॥ ४ ॥ उन कृपासागर त्रिशूलधरने अनायास ही अनुकूल होकर मुझे आनन्दजनक मार्ग दिखलाया और अपना दीनजन जानकर इस दासको आदरपूर्वक अपना लिया ॥ ५ ॥ उनकी कृपासे मुझे स्वार्थ और परमार्थ-दोनों ही करतलगत हो गये और श्रमका मार्ग निवृत्त हो गया । यह मैं स्वप्न देख रहा हूँ या प्रत्यक्ष ही हो रहा है। [मेरी अवस्था तो ऐसी है कि] मेरे सुखरूप अन्नको आज स्वयं देवतालोग सींच और ला रहे हैं [अर्थात् मुझे अत्यन्त सुख मिल रहा है] ॥ ६ ॥ अब मैं अपने गुरु भगवान् शंकर, स्वामी सीतापति श्रीराम और हितकारी हनुमान्जीसे जाकर मिलूँगा । अब मुझे करना ही क्या है; मुझे तो अब अघाकर अभीष्ट फलकी सीमा मिल गयी ॥ ७ ॥ कौन जाने मैं महान् विषय-

लोलुप विषयोंकी लालसासे परेशान होता हुआ कहाँ जाकर मरता?' तुलसीदासजी कहते हैं, किन्तु अब तो अभय-दुन्दुभी बजाकर मैं रघुनाथजीका ही भजन करूँगा ॥ ८ ॥ [ २९ ] पदपदुम गरीबनिवाजके। देखिहौं जाइ पाइ लोचन-फल हित सुर-साधु-समाजके ॥ १ ॥ गईं बहोर, ओर निरबाहक, साजक बिगरे साजके। सबरी सुखद, गीध-गतिदायक, समन सोक कपिराजके ॥ २ ॥ नाहिन मोहि और कतहूँ कछु, जैसे काग जहाजके। आयो सरन सुखद पदपंकज चौथै रावन-बाजके ॥ ३ ॥ आरतिहरन सरन, समरथ सब दिन अपनेकी लाजके। तुलसी 'पाहि' कहत नत-पालक मोहुसे निपट निकाजके ॥ ४ ॥ 'अहो ! अब मैं गरीबनिवाज भगवान् रामके उन चरणकमलों- को जाकर देखूँगा और नयनोंका फल पाऊँगा जो देवता और साधुसमाजके लिये अत्यन्त हितकर हैं ॥ १ ॥ भगवान् राम बीते सुखको वापिस लानेवाले, अन्ततक रक्षा करनेवाले और बिगड़ी बातको बना देनेवाले हैं। वे शबरीको सुख देनेवाले, गृध्रकी मुक्ति करनेवाले और कपिराज सुग्रीवके शोकको शान्त करनेवाले हैं ॥ २ ॥ जहाजके कागके समान मुझे और कहीं कोई आश्रय नहीं है, अतः अब मैं रावणरूप बाजसे पीड़ित होकर उन्हींके सुखदायक चरणकमलोंकी शरण आया हूँ ॥ ३ ॥ वे सदा ही अपने भक्तोंकी लज्जा रखनेमें समर्थ और शरणागतोंके दुःखको दूर करनेवाले हैं।' तुलसीदासजी कहते हैं कि 'रक्षा करो' ऐसा कहनेपर तो वे मुझ- जैसे अत्यन्त निकम्मे पुरुषोंके भी शरणागत-पालक हैं ॥ ४ ॥

३२६ सुन्दरकाण्ड [ ३० ] महाराज रामपहँ जाउँगो। सुख-स्वारथ परिहरि करिहौं सोइ, ज्यौं साहिबहि सुहाउँगो ॥ १ ॥ सरनागत सुनि बेगि बोलि हैं, हौं निपटहि सकुचाउँगो। राम गरीवनिवाज निवाजिहैं, जानिहैं, ठाकुर-ठाउँगो ॥ २ ॥ धरिहैं नाथ हाथ माथे, एहितें केहि लाभ अघाउँगो। सपनो-सो अपनो न कछू लखि, लघु लालच न लोभाउँगो ॥ ३ ॥ कहिहौं, बलि, रोटिहा रावरो, बिनु मोलही बिकाउँगो। तुलसी पट ऊतरे ओढिहौं, उबरी जूठनि खाउँगो ॥ ४ ॥ 'अब मैं महाराज रामके पास जाऊँगा और सब प्रकारका सुख तथा स्वार्थ त्याग कर वही उपाय करूँगा जिससे स्वामीको प्रिय लगूँ ॥ १ ॥ मुझे शरणमें आया सुनकर स्वामी शीघ्र ही बुला लेंगे; किन्तु मैं अन्यन्त सकुचाऊँगा । तब गरीवनिवाज प्रभु राम मुझे बिना स्वामी और ठौर-ठिकानेका जानकर मेरी रक्षा करेंगे ॥ २ ॥ अहा ! प्रभु मेरे इस माथेपर अपने हाथ रक्खेंगे ! उससे बढ़कर और कौन लाभ होगा जिससे मैं अघाऊँगा; यह संसार स्वप्नवत् है; इसकी किसी वस्तुको अपनी न समझकर मैं तुच्छ लालचोंमें नहीं लुभाऊँगा ॥ ३ ॥ मैं कहूँगा—'प्रभो ! बलिहारी जाऊँ, मैं तो आपके टुकड़े खाकर रहूँगा और बिना मोल ही आपके हाथ बिक जाऊँगा, फिर मैं प्रभुके उतरे हुए वस्त्र पहनूँगा तथा बची हुई जूठन खाऊँगा' ॥४॥ [ ३१ ] आइ सचिव बिभीषनके कही । कृपासिंधु ! दसकंधबंधु लघु चरन-सरन आयो सही ॥ १ ॥

गीतावली ३३० बिषम बिषाद-बारिनिधि बूड़त थाह कपीस-कथा लही। गये दुख-दोष देखि पदपंकज, अब न साथ एकौ रही ॥ २ ॥ सिथिल-सनेह सराहत नख-सिख नीक निकाई निरबही। तुलसी मुदित दूत भयो, मानहु अमिय-लाहु माँगत मही ॥ ३ ॥ [वानरसेनाके समीप पहुँचनेपर] विभीषणके मन्त्रीने रघुनाथजी- से आकर कहा—'कृपासिन्धो ! रावणका छोटा भाई निष्कपट भावसे आपके चरणोंके शरणमें आया है ॥ १ ॥ वह अत्यन्त विषादरूप समुद्रमें डूब रहा था कि उसी समय उसे सुग्रीवकी कथारूप थाह मिली। अब आपके चरणकमलोंका दर्शन करके तो उसके सारे दुःख और दोष निवृत्त हो गये हैं और उसे किसी प्रकारकी कामना नहीं रही है' ॥ २ ॥ प्रभुके अङ्ग-अङ्गमें सुन्दरता अच्छी तरह छायी हुई थी। उसे देखकर वह मन्त्री स्नेहसे शिथिल होकर उसकी सराहना करने लगा। तुलसीदासजी कहते हैं, उस समय वह दूत ऐसा प्रसन्न हुआ, मानो उसे मट्ठा माँगते हुए अमृत प्राप्त हो गया हो ॥ ३ ॥ [ ३२ ] बिनती सुनि प्रभु प्रमुदित भए । रीछराज, कपिराज नील-नल बोलि बालिनंदन लए ॥ १ ॥ बूझिये कहा ! रजाइ पाइ नय-धरम सहित ऊतर दए । बली बंधु ताको जेहि बिमोह-बस बैर-बीज बरबस बए ॥ २ ॥ बाँह-पगार द्वार तेरे तैं सभय कबहुँ फिरि गए । तुलसी असरन-सरन स्वामिके बिरद बिराजत नित नए ॥ ३ ॥ दूतकी विनय सुनकर प्रभु परम प्रसन्न हुए। उन्होंने ऋक्षराज जाम्बवान्, कपिपति सुग्रीव, नील, नल और बालिकुमार अंगदको

३३१ सुन्दरकाण्ड. बुलाया ॥ १ ॥ [ तथा उनसे पूछा— ] 'आपलोग इस सम्बन्धमें क्या समझते हैं ?' प्रभुकी आज्ञा पा उन्होंने धर्म और नीतिके अनुकूल उत्तर दिये । वे बोले—प्रभो ! यह महाबलवान् और उसका भाई है जिसने मोहबस बरबस ही आपके प्रति शत्रुताके बीज बोये हैं [ इसलिये इससे सावधान रहना ही ठीक है ] ॥ २ ॥ परंतु हे बाँह-पगार (अपनी भुजारूप दीवारसे आश्रितकी रक्षा करनेवाले) ! आपके द्वारपर आकर कोई भी भयभीत कभी उलटा नहीं लौटा।' तुलसीदासजी कहते हैं, प्रभुके 'अशरण-शरण' ऐसे विरद तो नित्य नये विराजमान हैं ॥ ३ ॥ [ ३३ ] हिय बिहसि कहत हनुमानसों । सुमति साधु सुचि सुहृद बिभीषन बूझि परत अनुमानसों ॥ १ ॥ 'हौं बलि जाउँ और को जानै ?' कह्यो कपि कृपानिधानसों । छली न होइ स्वामि सनमुख, ज्यों तिमिर सातहय-जानसों ॥ २ ॥ खोटो खरो सभीत पालिये सो, सनेह सनमानसों । तुलसी प्रभु कीबो जो भलो, सोइ बूझि सरासन-बानसों ॥ ३ ॥ तब रघुनाथजी हृदयमें हँसकर हनूमान्‌जीसे कहने लगे— 'अनुमानसे तो मुझे विभीषण सुमति, साधु, शुद्धचित्त और सुहृद ही जान पड़ता है' ॥ १ ॥ तब हनूमान्‌जीने कृपानिधान भगवान् रामसे कहा—'मैं बलिहारी जाऊँ, आपसे बढ़कर इस विषयमें और कौन जान सकता है ? जिस प्रकार अन्धकार सूर्यके सम्मुख नहीं ठहर सकता, उसी प्रकार छली पुरुष तो प्रभुके सामने भी नहीं आ सकता ॥ २ ॥ यह भयभीत है; अतः यह अच्छा हो या