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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 334, कुल 454 में से

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पृष्ठ 334

लोलुप विषयोंकी लालसासे परेशान होता हुआ कहाँ जाकर मरता?' तुलसीदासजी कहते हैं, किन्तु अब तो अभय-दुन्दुभी बजाकर मैं रघुनाथजीका ही भजन करूँगा ॥ ८ ॥ [ २९ ] पदपदुम गरीबनिवाजके। देखिहौं जाइ पाइ लोचन-फल हित सुर-साधु-समाजके ॥ १ ॥ गईं बहोर, ओर निरबाहक, साजक बिगरे साजके। सबरी सुखद, गीध-गतिदायक, समन सोक कपिराजके ॥ २ ॥ नाहिन मोहि और कतहूँ कछु, जैसे काग जहाजके। आयो सरन सुखद पदपंकज चौथै रावन-बाजके ॥ ३ ॥ आरतिहरन सरन, समरथ सब दिन अपनेकी लाजके। तुलसी 'पाहि' कहत नत-पालक मोहुसे निपट निकाजके ॥ ४ ॥ 'अहो ! अब मैं गरीबनिवाज भगवान् रामके उन चरणकमलों- को जाकर देखूँगा और नयनोंका फल पाऊँगा जो देवता और साधुसमाजके लिये अत्यन्त हितकर हैं ॥ १ ॥ भगवान् राम बीते सुखको वापिस लानेवाले, अन्ततक रक्षा करनेवाले और बिगड़ी बातको बना देनेवाले हैं। वे शबरीको सुख देनेवाले, गृध्रकी मुक्ति करनेवाले और कपिराज सुग्रीवके शोकको शान्त करनेवाले हैं ॥ २ ॥ जहाजके कागके समान मुझे और कहीं कोई आश्रय नहीं है, अतः अब मैं रावणरूप बाजसे पीड़ित होकर उन्हींके सुखदायक चरणकमलोंकी शरण आया हूँ ॥ ३ ॥ वे सदा ही अपने भक्तोंकी लज्जा रखनेमें समर्थ और शरणागतोंके दुःखको दूर करनेवाले हैं।' तुलसीदासजी कहते हैं कि 'रक्षा करो' ऐसा कहनेपर तो वे मुझ- जैसे अत्यन्त निकम्मे पुरुषोंके भी शरणागत-पालक हैं ॥ ४ ॥

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