गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२७ सुन्दरकाण्ड
सिर नवा मन-ही-मन यह कहते हुए चले ॥ १ ॥ दसों दिशाओंमें मङ्गलमय शकुन होते दिखायी दे रहे हैं—इससे उनका शोक दूर हो गया, नेत्रोंमें जल भर आया, हृदय आनन्दपूर्ण हो गया और शरीर प्रेमवश अत्यन्त पुलकित हो गया ॥ २ ॥ [वे कहने लगे—] 'आखिर, भाईका भाव तो मेरे लिये अच्छा ही हुआ, यद्यपि उसने यह कार्य तो मेरा अहित चाहकर ही किया था । विधाताने मेरी बात बना दी, अतः रावणकी लात मेरे लिये तो कूबरकी लात हो गयी [ अर्थात् जैसे कूबरमें लात लगनेसे वह सीधा हो जाता है, उसी प्रकार रावणकी लात लगनेसे मुझे भगवान् रामकी मङ्गलमयी शरण मिलनेकी सम्भावना हो गयी ] ॥ ३ ॥ यदि ऐसा न होता तो महादेवजी कुबेरके घर मिलकर हृदयमें मेरा हित विचार कर ऐसी बात क्यों कहते; जिसे सुनकर मैंने अपनी कुटिलता छोड़कर श्रीरामचन्द्रजीकी शरण ताकी है ॥ ४ ॥ उन कृपासागर त्रिशूलधरने अनायास ही अनुकूल होकर मुझे आनन्दजनक मार्ग दिखलाया और अपना दीनजन जानकर इस दासको आदरपूर्वक अपना लिया ॥ ५ ॥ उनकी कृपासे मुझे स्वार्थ और परमार्थ-दोनों ही करतलगत हो गये और श्रमका मार्ग निवृत्त हो गया । यह मैं स्वप्न देख रहा हूँ या प्रत्यक्ष ही हो रहा है। [मेरी अवस्था तो ऐसी है कि] मेरे सुखरूप अन्नको आज स्वयं देवतालोग सींच और ला रहे हैं [अर्थात् मुझे अत्यन्त सुख मिल रहा है] ॥ ६ ॥ अब मैं अपने गुरु भगवान् शंकर, स्वामी सीतापति श्रीराम और हितकारी हनुमान्जीसे जाकर मिलूँगा । अब मुझे करना ही क्या है; मुझे तो अब अघाकर अभीष्ट फलकी सीमा मिल गयी ॥ ७ ॥ कौन जाने मैं महान् विषय-