गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२६ सुन्दरकाण्ड [ ३० ] महाराज रामपहँ जाउँगो। सुख-स्वारथ परिहरि करिहौं सोइ, ज्यौं साहिबहि सुहाउँगो ॥ १ ॥ सरनागत सुनि बेगि बोलि हैं, हौं निपटहि सकुचाउँगो। राम गरीवनिवाज निवाजिहैं, जानिहैं, ठाकुर-ठाउँगो ॥ २ ॥ धरिहैं नाथ हाथ माथे, एहितें केहि लाभ अघाउँगो। सपनो-सो अपनो न कछू लखि, लघु लालच न लोभाउँगो ॥ ३ ॥ कहिहौं, बलि, रोटिहा रावरो, बिनु मोलही बिकाउँगो। तुलसी पट ऊतरे ओढिहौं, उबरी जूठनि खाउँगो ॥ ४ ॥ 'अब मैं महाराज रामके पास जाऊँगा और सब प्रकारका सुख तथा स्वार्थ त्याग कर वही उपाय करूँगा जिससे स्वामीको प्रिय लगूँ ॥ १ ॥ मुझे शरणमें आया सुनकर स्वामी शीघ्र ही बुला लेंगे; किन्तु मैं अन्यन्त सकुचाऊँगा । तब गरीवनिवाज प्रभु राम मुझे बिना स्वामी और ठौर-ठिकानेका जानकर मेरी रक्षा करेंगे ॥ २ ॥ अहा ! प्रभु मेरे इस माथेपर अपने हाथ रक्खेंगे ! उससे बढ़कर और कौन लाभ होगा जिससे मैं अघाऊँगा; यह संसार स्वप्नवत् है; इसकी किसी वस्तुको अपनी न समझकर मैं तुच्छ लालचोंमें नहीं लुभाऊँगा ॥ ३ ॥ मैं कहूँगा—'प्रभो ! बलिहारी जाऊँ, मैं तो आपके टुकड़े खाकर रहूँगा और बिना मोल ही आपके हाथ बिक जाऊँगा, फिर मैं प्रभुके उतरे हुए वस्त्र पहनूँगा तथा बची हुई जूठन खाऊँगा' ॥४॥ [ ३१ ] आइ सचिव बिभीषनके कही । कृपासिंधु ! दसकंधबंधु लघु चरन-सरन आयो सही ॥ १ ॥