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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

३२६ सुन्दरकाण्ड [ ३० ] महाराज रामपहँ जाउँगो। सुख-स्वारथ परिहरि करिहौं सोइ, ज्यौं साहिबहि सुहाउँगो ॥ १ ॥ सरनागत सुनि बेगि बोलि हैं, हौं निपटहि सकुचाउँगो। राम गरीवनिवाज निवाजिहैं, जानिहैं, ठाकुर-ठाउँगो ॥ २ ॥ धरिहैं नाथ हाथ माथे, एहितें केहि लाभ अघाउँगो। सपनो-सो अपनो न कछू लखि, लघु लालच न लोभाउँगो ॥ ३ ॥ कहिहौं, बलि, रोटिहा रावरो, बिनु मोलही बिकाउँगो। तुलसी पट ऊतरे ओढिहौं, उबरी जूठनि खाउँगो ॥ ४ ॥ 'अब मैं महाराज रामके पास जाऊँगा और सब प्रकारका सुख तथा स्वार्थ त्याग कर वही उपाय करूँगा जिससे स्वामीको प्रिय लगूँ ॥ १ ॥ मुझे शरणमें आया सुनकर स्वामी शीघ्र ही बुला लेंगे; किन्तु मैं अन्यन्त सकुचाऊँगा । तब गरीवनिवाज प्रभु राम मुझे बिना स्वामी और ठौर-ठिकानेका जानकर मेरी रक्षा करेंगे ॥ २ ॥ अहा ! प्रभु मेरे इस माथेपर अपने हाथ रक्खेंगे ! उससे बढ़कर और कौन लाभ होगा जिससे मैं अघाऊँगा; यह संसार स्वप्नवत् है; इसकी किसी वस्तुको अपनी न समझकर मैं तुच्छ लालचोंमें नहीं लुभाऊँगा ॥ ३ ॥ मैं कहूँगा—'प्रभो ! बलिहारी जाऊँ, मैं तो आपके टुकड़े खाकर रहूँगा और बिना मोल ही आपके हाथ बिक जाऊँगा, फिर मैं प्रभुके उतरे हुए वस्त्र पहनूँगा तथा बची हुई जूठन खाऊँगा' ॥४॥ [ ३१ ] आइ सचिव बिभीषनके कही । कृपासिंधु ! दसकंधबंधु लघु चरन-सरन आयो सही ॥ १ ॥

गीतावली ३३० बिषम बिषाद-बारिनिधि बूड़त थाह कपीस-कथा लही। गये दुख-दोष देखि पदपंकज, अब न साथ एकौ रही ॥ २ ॥ सिथिल-सनेह सराहत नख-सिख नीक निकाई निरबही। तुलसी मुदित दूत भयो, मानहु अमिय-लाहु माँगत मही ॥ ३ ॥ [वानरसेनाके समीप पहुँचनेपर] विभीषणके मन्त्रीने रघुनाथजी- से आकर कहा—'कृपासिन्धो ! रावणका छोटा भाई निष्कपट भावसे आपके चरणोंके शरणमें आया है ॥ १ ॥ वह अत्यन्त विषादरूप समुद्रमें डूब रहा था कि उसी समय उसे सुग्रीवकी कथारूप थाह मिली। अब आपके चरणकमलोंका दर्शन करके तो उसके सारे दुःख और दोष निवृत्त हो गये हैं और उसे किसी प्रकारकी कामना नहीं रही है' ॥ २ ॥ प्रभुके अङ्ग-अङ्गमें सुन्दरता अच्छी तरह छायी हुई थी। उसे देखकर वह मन्त्री स्नेहसे शिथिल होकर उसकी सराहना करने लगा। तुलसीदासजी कहते हैं, उस समय वह दूत ऐसा प्रसन्न हुआ, मानो उसे मट्ठा माँगते हुए अमृत प्राप्त हो गया हो ॥ ३ ॥ [ ३२ ] बिनती सुनि प्रभु प्रमुदित भए । रीछराज, कपिराज नील-नल बोलि बालिनंदन लए ॥ १ ॥ बूझिये कहा ! रजाइ पाइ नय-धरम सहित ऊतर दए । बली बंधु ताको जेहि बिमोह-बस बैर-बीज बरबस बए ॥ २ ॥ बाँह-पगार द्वार तेरे तैं सभय कबहुँ फिरि गए । तुलसी असरन-सरन स्वामिके बिरद बिराजत नित नए ॥ ३ ॥ दूतकी विनय सुनकर प्रभु परम प्रसन्न हुए। उन्होंने ऋक्षराज जाम्बवान्, कपिपति सुग्रीव, नील, नल और बालिकुमार अंगदको

३३१ सुन्दरकाण्ड. बुलाया ॥ १ ॥ [ तथा उनसे पूछा— ] 'आपलोग इस सम्बन्धमें क्या समझते हैं ?' प्रभुकी आज्ञा पा उन्होंने धर्म और नीतिके अनुकूल उत्तर दिये । वे बोले—प्रभो ! यह महाबलवान् और उसका भाई है जिसने मोहबस बरबस ही आपके प्रति शत्रुताके बीज बोये हैं [ इसलिये इससे सावधान रहना ही ठीक है ] ॥ २ ॥ परंतु हे बाँह-पगार (अपनी भुजारूप दीवारसे आश्रितकी रक्षा करनेवाले) ! आपके द्वारपर आकर कोई भी भयभीत कभी उलटा नहीं लौटा।' तुलसीदासजी कहते हैं, प्रभुके 'अशरण-शरण' ऐसे विरद तो नित्य नये विराजमान हैं ॥ ३ ॥ [ ३३ ] हिय बिहसि कहत हनुमानसों । सुमति साधु सुचि सुहृद बिभीषन बूझि परत अनुमानसों ॥ १ ॥ 'हौं बलि जाउँ और को जानै ?' कह्यो कपि कृपानिधानसों । छली न होइ स्वामि सनमुख, ज्यों तिमिर सातहय-जानसों ॥ २ ॥ खोटो खरो सभीत पालिये सो, सनेह सनमानसों । तुलसी प्रभु कीबो जो भलो, सोइ बूझि सरासन-बानसों ॥ ३ ॥ तब रघुनाथजी हृदयमें हँसकर हनूमान्‌जीसे कहने लगे— 'अनुमानसे तो मुझे विभीषण सुमति, साधु, शुद्धचित्त और सुहृद ही जान पड़ता है' ॥ १ ॥ तब हनूमान्‌जीने कृपानिधान भगवान् रामसे कहा—'मैं बलिहारी जाऊँ, आपसे बढ़कर इस विषयमें और कौन जान सकता है ? जिस प्रकार अन्धकार सूर्यके सम्मुख नहीं ठहर सकता, उसी प्रकार छली पुरुष तो प्रभुके सामने भी नहीं आ सकता ॥ २ ॥ यह भयभीत है; अतः यह अच्छा हो या

बुरा, अब इसका स्नेह और आदरपूर्वक पालन कीजिये अथवा जैसा करना उचित हो वह अपने धनुष-बाणसे ही पूछ लीजिये क्योंकि यह स्वभावसे ही दुष्टोंके घातक और साधुजनोंके प्रतिपालक हैं' ॥ ३ ॥ [ ३४ ] सांचेहु बिभीषन आइहै ? बूझत बिहँसि कृपालु लषन सुनि कहत सकुचि सिर नाइ है ॥ १ ॥ ऐहै कहा, नाथ ? आयो ह्याँ, क्यों कहि जाति बनाइ है। रावन-रिपुहि राखि, रघुबर बिनु, को त्रिभुवन पति पाइहै ॥ २ ॥ प्रभु प्रसन्न, सब सभा सराहित, दूत-बचन मन भाइहै। तुलसी, 'बोलिये बेगि,' लषनसों भइ महाराज-रजाइ है ॥ ३ ॥ कृपामय श्रीरामचन्द्र हँसकर पूछते हैं—'क्या सचमुच विभीषण यहाँ आवेगा?' यह सुनकर लक्ष्मणजीने सिर नवाकर सकुचाते हुए कहा—॥ १ ॥ 'प्रभो ! आवेगा क्या, वह तो यहाँ आ गया। आपके सामने ऐसी बात बनाकर कैसे कही जा सकती है? भला रावणके शत्रुको रखकर, एक रघुनाथजीको छोड़कर, और ऐसा कौन तीनों लोकोंमें है जो अपनी प्रतिष्ठा रख सके [अर्थात् त्रिलोकीके अन्य सभी लोगोंको रावण अप्रतिष्ठित कर सकता है, पर आपके यहाँ उसकी कुछ नहीं चलती, इसीसे विभीषण आपकी शरणमें आये हैं]' ॥ २ ॥ प्रभु प्रसन्न हुए, सब सभा प्रशंसा करने लगी और दूतकों भी ये वचन मनमें प्रिय लगे। तुलसीदासजी कहते हैं, उस समय लक्ष्मणजीको महाराजकी आज्ञा हुई कि उसे शीघ्र ही बुला लो ॥ ३ ॥

३३३ सुन्दरकाण्ड 【 ३५ 】 चले लेन लषन-हनुमान हैं। मिले मुदित बूझि कुसल परसपर-सकुचत करि सनमान हैं ॥ १ ॥ भयो रजायसु पांउ धारिए, बोलत कृपानिधान हैं। दूरितें दीनबंधु देखे, जनु देत अभय-बरदान हैं ॥ २ ॥ सील सहस हिमभानु, तेज सतकोटि भानुहूके भानु हैं। भगतनिकोहित कोटि मातु-पितु अरिन्हको कोटि कुसानु हैं ॥ ३ ॥ जनगुनरज गिरि गनि, सकुचत निज गुन गिरि रज परमानु हैं। बाँह-पगारु, बोलको अबिचल, बेद करत गुनगान हैं ॥ ४ ॥ चारु चाप-तूनोर तामरस-करनि सुधारत बान हैं। चरचा चलति बिभीषनकी, सोइ सुनत सुचित दै कान हैं ॥ ५ ॥ हरषत सुर, बरषत प्रसून सुभ सगुन कहत कल्यान हैं। तुलसी ते कृतकृत्य, जे सुमिरत समय सुहावनो ध्यान हैं ॥ ६ ॥ तब विभीषणको लेनेके लिये लक्ष्मणजी और हनुमान्‌जी चले। वे प्रसन्नतापूर्वक मिले और कुशल पूछकर परस्पर सम्मान करते हुए सकुचाने लगे ॥ १ ॥ वे बोले—'पधारिये, भगवान्‌की आज्ञा हो गयी है, कृपानिधान रघुनाथजी आपको बुला रहे हैं।' तब विभीषण- ने दूरहीसे प्रभुको देखा, मानो वे अभयका वर दे रहे हैं ॥ २ ॥ तथा शान्तिमें सहस्रों चन्द्रमाओंके समान, तेजमें अरबों सूर्योंके भी सूर्य, भक्तोंके लिये करोड़ों माता-पिताओंके समान हितकारी और शत्रुओंके लिये करोड़ों अग्नियोंके समान हैं ॥ ३ ॥ वे अपने भक्तके रजंतुल्य गुणोंको पर्वत-समान समझकर सकुचाते हैं और अपने पर्वततुल्य गुणको रजवत् समझते हैं। प्रभु अपनी भुजाओंसे शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले और प्रतिज्ञाके पक्के हैं, ऐसा वेद

गीतावली ३३४ भी उनका गुण गाते हैं ॥ ४ ॥ वे अपने करकमलोंसे सुन्दर धनुष, तरकस और बाणको सुधार रहे हैं; और उस समय जो विभीषणकी चर्चा चल रही है उसे एकाग्रचित्तसे कान लगाकर सुन रहे हैं ॥ ५ ॥ देवतालोग प्रसन्न होकर पुष्पोंकी वर्षा कर रहे हैं। ये शुभ शकुन भावी कल्याणकी सूचना देते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं, जो लोग उस सुहावने समयका ध्यान और स्मरण करते हैं वे कृतकृत्य हैं ॥ ६ ॥ [ ३६ ] रामहि करत प्रणाम निहारिकैं। उठे उमँगि आनंद-प्रेम-परिपूरन बिरद बिचारिकैं ॥ १ ॥ भयो बिदेह बिभीषन उत, इत प्रभु अपनपौ बिसारिकैं। भलीभाँति भावते भरत-ज्यौं भेंट्यौ भुजा पसारिकैं ॥ २ ॥ सादर सबहि मिलाइ समाजहि निपट निकट बैठारिकैं। बूझत छेम-कुसल सप्रेम अपनाइ भरोसे भारिकैं ॥ ३ ॥ नाथ ! कुसल-कल्यान-सुमंगल बिधि सुख सकल सुधारिकैं। देत-लेत जे नाम रावरो, बिनय करत मुख चारिकैं ॥ ४ ॥ जो मूरति सपने न बिलोकत मुनि-महेस मन मारिकैं। तुलसी तेहि हौं लियो अंक भरि, कहत कछू न सँवारिकैं ॥ ५ ॥ भगवान् रामको देखकर विभीषणने प्रमाण किया तब प्रभु अपना विरद [शर०गतपालकत्व] स्मरणकर आनन्द और प्रेमसे परिपूर्ण हो उमगकर उठे ॥ १ ॥ इस समय उधर तो विभीषण विदेह हो गये [ उन्हें शरीरकी कुछ भी सुध न रही ] और इधर प्रभु अपनेको भूलकर प्रिय भाई भरतकी तरह भुजा फैलाकर खूब अच्छी तरह मिले ॥ २ ॥ फिर आदरपूर्वक सारे समाजसे भेंट करा अपने

३३५ सुन्दरकाण्ड अत्यन्त समीप बिठा लिया और उसे सप्रेम अपनाकर, खूब भरोसा दे कुशल-क्षेम पूछने लगे ॥ २ ॥ तब विभीषणने कहा—हे नाथ ! जो लोग आपका नाम जपते हैं, उन्हें भी ब्रह्माजी अच्छी तरह कुशल, कल्याण, मङ्गल और सब प्रकारका सुख प्रदान करते हैं और अपने चारो मुखोंसे उसकी विनती करते हैं [फिर मैं साक्षात् आपहीके समीप बैठा हुआ हूँ, मेरे कुशल-क्षेमका क्या कहना है ? ] ॥ ४ ॥ जिस मूर्तिको बड़े-बड़े मुनि और लोकेश्वरगण भी मनको जीतकर स्वप्नमें भी नहीं देख पाते, उसीने मुझे गोदमें भर निया ! [फिर मेरे सौभाग्यका क्या कहना है ? ] मैं इसमें कोई बात बनाकर नहीं कहता ॥ ५ ॥ [ ३७ ] करुनाकरकी करुना भई । मिटौ मीचु, लहि लंक संक गइ, काहूसो न खुनिस खई ॥ १ ॥ दसमुख तज्यो दूध-माखी-ज्यों, आपु काढ़ि साढ़ी लई । भव-भूषन सोइ कियो बिभीषन मुद मंगल-महिमामई ॥ २ ॥ बिधि-हरि-हर, मुनि-सिद्ध सराहत, मुदित देव दुंदुभी दई । बारहि बार सुमन बरषत, हिय हरषत कहि जै जै जई ॥ ३ ॥ कौसिक-सिला-जनक-संकट हरि भृगुपतिकी टारी टई । खग-मृग, सबर-निसाचर, सबकी पूंजी बिनु बाढ़ी सई । ४ ॥ जुग-जुग कोटि-कोटि करतब, करनी न कछू बरनी नई । राम-भजन-महिमा हुलसी हिय, तुलसीहूकी बनि गई ॥ ५ ॥ इस प्रकार जब करुणाकरकी करुणा हुई तो विभीषणका मरणभय दूर हो गया, लङ्काका राज्य पाकर रावणकी शंका जाती रही तथा किसीसे ईर्ष्या-द्वेष नहीं रहा ॥ १ ॥ जिस विभीषणको

गीतावली ३३६ रावणने दूधकी मक्खीके समान निकालकर स्वयं मलाई [ साररूप लङ्काकी विभूति ] ले ली थी, उसीको भगवान्‌ने संसारका भूषण तथा मुद-मङ्गलमयी महिमासे सम्पन्न बना दिया ॥ २ ॥ उस समय ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, मुनि और सिद्धगण उसके भाग्यकी प्रशंसा करने लगे तथा देवताओंने प्रसन्न होकर दुन्दुभी बजाना और हृदय- में प्रसन्न होकर जय-जयकार करते हुए बारंबार पुष्प बरसाना आरम्भ कर दिया ॥ ३ ॥ भगवान्‌ विश्वामित्रजी, जनकजी और पाषाणरूपा अहल्याका संकट दूर कर परशुरामजीके आतंकको नष्ट किया तथा पक्षी ( जटायु ), मृग (मारीच ), शबरी और निशाचर (विभीषण) इन सबकी बिना पूँजीके ही उन्नति की ॥ ४ ॥ इस प्रकार युग- युगमें प्रभुके करोड़ों दिव्य कर्म हैं—यह उनके कुछ नये कार्य नहीं बतलाये गये । हृदयमें रामभजनकी महिमाका उल्लास होनेसे इस समय तुलसीकी भी बान बन गयी है ॥ ५ ॥ [ ३८ ] मंजुल मूरति मंगलमई । भयो बिसोक बिलोकि बिभीषन, नेह देह-सुधि-सीव गई ॥ १ ॥ उठि दाहिनी ओरतें सनमुख सुखद माँगि बैठक लई । नखसिख निरखि-निरखिसुखपावतभावत कछु, कछुऔर भई ॥ २ ॥ बार कोटि सिर काटि, साटि लटि, रावन संकरपै लई । सोइ लंका लखि अतिथि अनवसर राम तृनासन ज्यों दई ॥ ३ ॥ प्रीति-प्रतीति-रीति-सोभा-सरि, थाहत जहँ जहँ तहँ घई । बाहु-बली, बानैत बोलको, बीर बिस्वबिजई जई ॥ ४ ॥ को दयालु दूसरो दुनी, जेहि जरनि दीन-हियकी हई ? तुलसी काको नाम जपत जग जगती जामति बिनु बई ॥ ५ ॥

३३७ सुन्दरकाण्ड प्रभुकी अति मनोहर और मङ्गलमयी मूर्ति देखकर विभीषण शोकहीन हो गये और उसके प्रेममें वे देहानुसंधानकी सीमाका अतिक्रमण कर गये ॥ १ ॥ फिर उन्होंने दाहिनी ओरसे उठकर प्रभुके सामनेकी सुखप्रद बैठक माँग ली। वहाँ प्रभुको नखसे सिख- तक देख-देखकर आनन्दित होने लगे। देखिये, वे चाहते कुछ थे ओर हो कुछ और ही गया ! ॥ २ ॥ जिस लङ्काको रावणने करोड़ों बार अपने सिर काट-काटकर अत्यन्त क्लेश उठानेके अनन्तर श्री- महादेवजीसे प्राप्त किया था, वही भगवान्ने विभीषणको अपना अनवसरका अतिथि समझकर [संकोचवश] तृणके आसनके समान दी ! ॥ ३ ॥ प्रभु प्रीति, प्रतीति, रीति और शोभाकी नदीके समान हैं। उनको जहाँ-जहाँ (जिस-जिस गुणकी) थाह ली जाती है, कहीं वे अथाह दिखायी देते हैं ! वे भुजाओंके बड़े पराक्रमी, प्रतिज्ञा के पक्के और (परशुराम आदि) विश्वविजयी वीरोंको जीतनेवाले हैं ॥ ४ ॥ संसारमे ऐसा दयालु और कौन है जिसने दीनजनोंके हृदयोंकी जलन दूर की हो; तुलसीदासजी कहते हैं, संसारमें रामके सिवा और किसका नाम जपनेसे पृथ्वी बिना बोये ही जमती है [अर्थात् सुकृत किये बिना ही पुण्यफल प्राप्त होता है] ? ॥ ५ ॥ [ ३९ ] सब भाँति बिभीषनकी बनी। कियो कृपालु अभय कालहुतें, गइ संसृति-सांसति घनी ॥ १ ॥ सखा लषन-हनुमान, सभु गुर, धनी राम कोसलधनी। हिय ही और, और कीन्हों बिधि, रामकृपा औरै ठनी ॥ २ ॥ कलुष-कलंक-कलेस-कोस भयो जो पद पाय रावन रनी। सोइ पद पाय बिभीषन भो भव-भूषन दलि दूषन-अनी ॥ ३ ॥ गी० २२—

गीतावली ३३८ बांह पगार, उदार सिरोमनि, नत-पालक, पावन पनी। सुमन बरषि रघुबर-गुन बरनत, हरषि देव दुंदभी हनी॥ ४ ॥ रंक-निवाज रंक राजा किए गए गरब गरि गरि गनी। राम-प्रनाम महामहिमा-खनि, सकल-सुमंगलमनि-जनी॥ ५ ॥ होय भलो ऐसे ही अजहुँ गये राम-सरन परिहरि मनी। भुजा उठाइ, साखि संकर करि, कसम खाइ तुलसी भनी॥ ६ ॥ विभीषणकी बात सब प्रकार बन गयी। कृपालु रघुनाथजीने उसे कालसेभी निर्भय करदिया और उसे संसारका घोर त्रास भी नहीं रहा ॥ १॥ उसे लक्ष्मण और हनूमान्-जैसे सखा, शंकर-जैसे गुरु और कोसलेश्वर राम-जैसे स्वामी मिले। उसके हृदयमें तो कुछ और था; किन्तु विधाताने कर कुछ और ही दिया तथा अब रामकृपासे कुछ और ही बानक बन गया ॥ २ ॥ रणधीर रावण जिस [लङ्केश्वर] पदको पाकर पाप, कलंक और क्लेशोंका कोष बनाहुआ था, विभीषण उसी पदको पाकर सम्पूर्ण दोषोंके दलका दलन कर संसारका भूषण बन गया ॥ ३ ॥ जिसकी भुजाएँ दोनोंकी रक्षा करनेके लिये दीवाररूप हैं तथा जो उदारशिरोमणी, प्रणतपालक और पवित्र प्रण करनेवाले हैं, उन रघुनाथजीके गुणोंका देवतालोग प्रसन्न होकर पुष्प बरसाते तथा दुन्दुभी बजाते गान करने लगे ॥ ४ ॥ गरीबनिवाज रघुनाथजीने गरीब विभीषणको राजा बना दिया। इससे बड़े-बड़े धनियोंका (अपनेको भक्तशिरोमणि समझनेवालोंका) मान मर्दन हो गया। भगवान् रामको किया हुआ प्रणाम महामहिमाकी खान है; उससे सब प्रकारके मङ्गलरूप मणियोंका प्रादुर्भाव होता है ॥ ५ ॥ आज भी अभिमान छोड़कर भगवान् रामकी शरण जानेसे इसी प्रकार

३३१ सुन्दरकाण्ड भला हो सकता है। यह बात तुलसीदासने शंकरको साक्षी कर भुजा उठा सौगन्ध खाकर कही है ॥ ६ ॥ [ ४० ] कहो, क्यों न विभीषनकी बनै ? गयो छोड़ि छल सरन रामकी, जो फल चारि चारहौं जनै ॥ १ ॥ मंगलमूल प्रनाम जासु जग, मूल अमंगलके खनै ! तेहि रघुनाथ हाथ माथे दियो, को ताकी महिमा भनै ? ॥ २ ॥ नाम-प्रताप पतितपावन किए, जे न अघाने अघ अनै ॥ कोउ उलटो, कोउ सूधो जपि भए राजहंस बायस-तनै ॥ ३ ॥ हुतो ललात कृसगात खात खरि, मोद पाइ कोदो-कनै । सो तुलसी चातक भयो जाचक राम स्यामसुंदर घनै ॥ ४ ॥ कहो, विभीषणकी बात क्यों न बने। जो छल त्यागकर भगवान् रामकी शरण गये थे, जो कि चार प्रकारके भक्तोंके लिये चारों प्रकारके फल उत्पन्न करते हैं ॥ १ ॥ जिनको किया हुआ मङ्गलमूलप्रणाम संसारमें अमङ्गलकी जड़को उखाड़ डालता है. उन्हीं रघुनाथजीने जिनके सिरपर अपना हाथ रक्खा, उन विभीषणजीकी महिमा कौन कह सकता है ॥ २ ॥ जो पाप और अनीति करते कभी नहीं अघाये थे, उन पतितोंको भी प्रभुने अपने नामके प्रतापसे ही पवित्र कर दिया। कोई उलटा और कोई सीधा नाम जपकर ही काकवत् आचरणवाले भी राजहंसवत् शुद्ध हो गये ॥ ३ ॥ जो दुर्बल शरीरवाला था और खली खाता था [जिसे खानेको निस्सार वस्तुएँ ही मिलती थीं], जो एक-एक टुकड़े के लियेलालायित रहता था और कोदोके कण (साधारण भोजन) पाकर भी बड़ा आनन्द

गीतावली ३४० मानता था [अर्थात् महादरिद्र था] वही तुलसी अब पपीहा होकर रामरूप श्यामसुन्दर मेघसे याचना करता है ॥ ४ ॥ [ ४१ ] अति भाग बिभीषनके भले । एक प्रनाम प्रसन्न राम भए, दुरित-दोष-दारिद दले ॥ १ ॥ रावन-कुंभकरन बर माँगत सिव-बिरंचि बाचा छले । राम-दरस पायो अबिचल पद, सुदिन सगुन नीके चले ॥ २ ॥ मिलनि बिलोकि स्वामि-सेवककी ऊकठे तरु फूले-फले । तुलसी सुनि सनमान बंधुको दसकंधर हँसि हिये जले ॥ ३ ॥ विभीषणजीके भाग्य बड़े ही अच्छे हैं, जिनके एक प्रणामसे ही भगवान् राम प्रसन्न हो गये और उनके सारे पाप, दोष तथा दरिद्रता दूर कर दी ॥ १ ॥ जिस समय रावण और कुम्भकर्णने वर मांगा था, उस समय वे शिव और ब्रह्माद्वारा वाणीके फेरसे छले गये [अर्थात् वे माँगना कुछ चाहते थे और शब्दार्थके फेर-फारसे उन्हें कुछ और ही मिला] किन्तु विभीषणने तो रामके दर्शनमात्रसे ही अविचल पद प्राप्त कर लिया (उन्हें मांगनेकी भी आवश्यकता नहीं पड़ी) वास्तवमें वे अच्छे दिन अच्छे शकुनसे चले थे ॥ २ ॥ स्वामी और सेवकका वह सम्मिलन देखकर सूखे वृक्ष भी फूलने-फलने लगे। तुलसीदासजी कहते हैं, भाईका सम्मान हुआ सुनकर रावण मुखसे तो हँसने लगा, किन्तु हृदयमें ईर्ष्यानल से जल उठा ॥ ३ ॥ [ ४२ ] गये राम सरन सबको भलो । गनी-गरीब, बड़ो-छोटो, बुध-मूढ़, हीनबल-अतिबलो ॥ १ ॥

३४१ सुन्दरकाण्ड पंगु-अंध, निरगुनी-निसंबल, जो न लहै जाचे जलो । सो निबह्यो नीके, जो जनमि जग राम-राजमारग चलो ॥ २ ॥ नाम-प्रताप-दिवाकर कर खर गरत तुहिन ज्यों कलिमलो । सुतहित नाम लेत भवनिधि तरि गयो अजामिल सो खलो ॥ ३ ॥ प्रभुपद प्रेम प्रनाम-कामतरु सद्य बिभीषनको फलो । तुलसी सुमिरत नाम सबन्हिको मंगलमय नभ-जल थलो ॥ ४ ॥ रामकी शरण जानेपर सभीका भला होता है, चाहे वह धनी हो या निर्धन, बड़ा हो या छोटा, बुद्धिमान् हो या मूर्ख अथवा दुर्बल हो या अति बलवान् ॥ १ ॥ जो पंगु, अन्धे, गुणहीन और अकिञ्चन हैं, जिन्हें माँगनेपर जबतक नहीं मिलता, उन्होंने भी यदि संसारमें जन्म लेकर रामके राजमार्ग (भक्तियोग) का अवलम्बन किया है तो प्रभुने उनको खूब निभाया ॥ २ ॥ रामनामके प्रताप- रूप सूर्यकी प्रखर किरणोंमें कलिकल्मष भी तुषारके समान पिघल जाता है। देखो, पुत्रके मिससे ही उनका नाम लेनेके कारण अजामिल-जैसा दुष्ट भी भवसागरसे पार हो गया था ॥ ३ ॥ प्रभुके चरणोंमें प्रेमपूर्वक किया हुआ विभीषणका प्रणामरूप कल्पवृक्ष तत्काल ही फलित हो गया। तुलसीदासजी कहते हैं, इसी प्रकार प्रभुका नाम-स्मरण करते ही सबके लिये आकाश, जल और स्थल सभी मङ्गलमय हो जाते हैं ॥ ४ ॥ [ ४३ ] सुजस सुनि श्रवन हौं नाथ आयो सरन । उपल-केवट-गीध-सबरी-संसृति-समन, सोक-श्रम-सीव सुग्रीव आरतिहरन ॥ १ ॥

गीतावली ३४१ राम राजीव-लोचन बिमोचन बिपति, स्याम नव-तामरस-दाम बारिद-बरन । लसत जटाछूट सिर, चारु मुनिचीर कटि, घोर रघुबीर तूनीर-सर-धनु-धरन ॥ २ ॥ जातुधानेस-भ्राता बिभीषन नाम बंधु-अपमान गुरु ग्लानि चाहत गरन । पतितपावन ! प्रनतपाल ! करुनासिंधु ! राखिए मोहि सौमित्रि-सेवित-चरन ॥ ३ ॥ दीनता-प्रीति-संकलित मृदुबचन सुनि पुलकि तन प्रेम, जल नयन लागे भरन । बोलि, 'लंकेस' कहि अंक भरि भेंटि प्रभु, तिलक दियो दीन-दुख-दोष-दारिद-दरन ॥ ४ ॥ रातिचर-जाति, अकारि सब भाँति गत कियो सो कल्यान-भाजन सुमंगलकरन । दास तुलसी सदयहृदय रघुबंसमनि 'पाहि' कहे काहि इन्हों न तारन तरन ? ॥ ५ ॥ [विभीषण कहते हैं—] 'नाथ ! मैं अपने कानोंसे आपकी सुयश सुनकर शरणमें आया हूँ। आप पाषाणरूपी अहल्या, केवट, गृध्र, और शबरीके आवागमनरूप संसृतिचक्रको शांत करनेवाले तथा शोक और श्रमके सीमारूप सुग्रीवका दुःख करनेवाले हैं ॥ १ ॥ हे राम ! आप कमलके समान नेत्रोंवाले, सब प्रकारकी विपत्तियोंके नाशक, नवीन नीलकमलकी-सी श्यामल कान्तिवाले तथा मेघवर्ण हैं, आपके सिरपर जटाजूट शोभायमान हैं। कमरमें मनोहर मुनिवस्त्र है तथा आप धनुष-बाण और तरकस

३४३ सुन्दरकाण्ड धारण करनेवाले परम धीर रघुवंशी वीर हैं ॥ २ ॥ मैं राक्षसराज रावणका भाई हूँ, मेरा नाम विभीषण है, मैं भाईके तिरस्कारसे उत्पन्न हुई महान् ग्लानिसे गला जा रहा हूँ हे पतितपावन ! हे प्रणतपाल ! हे करुणासिन्धो ! आप मुझे लक्ष्मणजीद्वारा सेवित अपने चरणोंमें आश्रय दीजिये' ॥ ३ ॥ विभीषणके ये दीनता और प्रीतिसे सने हुए मधुर वचन सुनकर प्रभुका शरीर प्रेमसे पुलकित हो गया और नेत्रोंमें जल भरने लगा। तब दीनोंके दुःख दोष और दरिद्रता दूर करनेवाले प्रभुने उन्हें 'लङ्केश' कहकर बुलाया और भुजाओंमें भर आलिंगन कर उनका राजतिलक कर दिया ॥ ४ ॥ विभीषण जातिका राक्षस और अपना शत्रु होनेसे सब प्रकार त्याज्य था, तब मङ्गलकर्ता श्रीहरिने उसे सब प्रकार कल्याणका पात्र कर दिया । तुलसीदासजी कहते हैं, रघुवंशमणि भगवान् राम बड़े ही दयालुचित्त हैं; उन्होंने 'रक्षा करो' ऐसा कहते ही किसे दूसरों- को तारनेवाला नहीं बना दिया? ॥ ५ ॥ [ ४४ ] दीन-हित बिरद पुराननि गायो । आरत-बंधु, कृपालु, मृदुल-चित जानि सरन हौं आयो ॥ १ ॥ तुम्हरे रिपुको अनुज बिभीषन, बंस निसाचर जायो । सुनि गुन-सील-सुभाउ नाथको मैं चरननि चितु लायो ॥ २ ॥ जानत प्रभु दुख-सुख दासनिको, तातें कहि न सुनायो । करि करुना भरि नयन बिलोकहु, तब जानौं अपनायो ॥ ३ ॥ बचन बिनीत सुनत रघुनायक हँसि करि निकट बुलायो । भेट्यो हरि भरि अंक भरत-ज्यों, लंकापति मन भायो ॥ ४ ॥ करपंकज सिर परसि अभय कियो, जनपर हेतु दिखायो । तुलसिदास रघुबीर भजन करि को न परमपद पायो ? ॥ ५ ॥

गीतावली ३४४ 'प्रभो ! पुरुषोंने आपका 'दीनहितकारी' ऐसा सुयश गाया है। मैं भी आपको दीनबन्धु, कृपालु और मृदुलचित्त जानकर ही शरणमें आया हूँ ॥ १ ॥ मैं राक्षसवंशमें उत्पन्न हुआ आपके शत्रु रावणका छोटा भाई विभीषण हूँ । प्रभुका गुण, शील और स्वभाव सुनकर मैंने आपके ही चरणोंमें चित्त लगाया है ॥ २ ॥ प्रभु अपने दासोंका सुख-दुःख जानते ही हैं, इसलिये मैंने उसका कथन नही किया। अब तो जब आप मुझे करुणा करके नेत्र भरकर निहारेंगे तभी मैं जानूँगा कि आपने मुझे अपनाया है, ॥ ३ ॥ विभीषणके ये विनीत वचन सुनकर रघुनाथजीने उसे हँसकर अपने पास बुलाया, फिर भगवान्‌ने उसे भरतजीके समान भुजाओंमें भरकर आलिंगन किया और उसे मन-ही-मन लङ्कापति मान। ॥ ४ ॥ फिर अपने करकमलसे उसका सिर स्पर्श कर उसे अभय किया और इस प्रकार प्रभुने अपने भक्तपर प्रेम प्रगट किया । तुलसीदासजी कहते हैं, रघुनाथजीका भजन करके भला किसने परमपद प्राप्त नहीं किया; ॥ ५ ॥ राग धनाश्री [ ४५ ] सत्य कहौं मेरो सहज सुभाउ । सुनहु सखा कपिपति लंकापति, तुम्हसन कौन दुराउ ॥ १ ॥ सब बिधि हीन-दीन, अति जड़-मति जाको कतहूँ न ठाउँ । आयो सरन भजौं, न तजौं तिहि, यह जानत रिषिराउ ॥ २ ॥ जिन्हके हौ हित सब प्रकार चित, नाहिन और उपाउ । तिन्हहि लागि धरि देह करौं सब, डरौं न सुजस नसाउ ॥ ३ ॥ पुनि पुनि भुजा उठाइ कहत हौं, सकल सभा पतिआउ । नहि कोऊ प्रिय मोहि दास सम, कपट-प्रीति र्बाह जाउ ॥ ४ ॥

३४५ सुन्दरकाण्ड सुनि रघुपतिके बचन बिभीषन प्रेम-मगन, मन चाउ। तुलसिदास तजि आस-त्रास सब ऐसे प्रभु कहँ गाउ॥ ५॥ [भगवान्रामने कहा—] 'मित्र सुग्रीव और लंकापति विभीषण! सुनिये, आपलोगोंसे क्या छिपाना है; जो मेरा प्राकृतिक स्वभाव है वह सच-सच बतलाता हूँ॥ १॥ जो सब प्रकार पतित, दीन और अत्यन्त जड़बुद्धि है और जिसका कहीं भी ठिकाना नहीं है वह यदि शरण आता है तो मैं उसकी सब प्रकार सेवा करता हूँ और उसे कभी नहीं त्यागता—यह बात बाल्मीकि आदि ऋषीश्वर जानते हैं॥ २॥ जिनके चित्तमें एकमात्र मैं ही परम हितकारी हूँ तथाजिन्हें और कोई भी उपाय नहीं सूझता उन्हींके लिये मैं देह धारण कर सारे कार्य करता हूँ और 'मेरा सुयश नष्ट हो जायगा' इस बातसे नहीं डरता॥ ३॥ मैं बारम्बार भुजा उठाकर कहता हूँ, सम्पूर्ण सभा मेरा विश्वास करे—'मुझे अपने दासके समान कोई प्रिय नहीं है। हाँ; निष्कपट प्रीति करनेवाला दास होना चाहिये (क्योंकि 'मोहि कपट छल छिद्र न भावा')' ॥ ४ ॥ रघुनाथजीके ये वचन सुनकर विभीषण प्रेम मगन हो गये और उनके मनमें बड़ा चाव बढ़ा। तुलसीदासजी कहते हैं, 'सब प्रकार- की आशा और भय छोड़कर ऐसे प्रभुका ही गुणगान करो' ॥ ५ ॥ [ ४६ ] नाहिन भजिबे जोग बियो। श्रीरघुबीर समान आन को पूरन-कृपा-हियो ॥ १ ॥ कहहु, कौन सुर सिला तारि पुनि केवट मीत कियो ? कौने गीध अधमको पितु-ज्यों निज कर पिंड दियो ? ॥ २ ॥ कौन देव सबरीके फल करि भोजन सलिल पियो ? बालित्रास-बारिधि बूड़त कपि केहि गहि बाँह लियो ? ॥ ३ ॥

गीतावली ३४६ भजन-प्रभाउ बिभीषन भाष्यौ, सुनि कपि-कटक जियो। तुलसिदासको प्रभु कोसलपति सब प्रकार बरिया ॥ ४ ॥ 'रघुनाथजीके सिवा और कोई भजने योग्य नहीं है। भला उनके समान और किसका हृदय कृपासे पूर्ण है? ॥ बतलाओ, और किस देवताने शिलाका उद्धार करके केवटको मित्र बनाया है और किसने महापतित गृध्रको पिताके समान अपने हाथोंसे पिण्ड दिया है ॥ २ ॥ ऐसा कौन देवता है जिसने शबरीके फल खाकर जल पिया हो; और बालिके भयरूप समुद्रमें डूबते हुए सुग्रीवको भी किसने बाँह पकड़कर निकाला है;' ॥ ३ ॥ इस प्रकार जब विभीषण- ने भगवान्‌के भजनका प्रभाव कहा तो सारी वानरसेना सुनकर सजीव हो गयी। वास्तवमें तुलसीदासके प्रभु कौसलपति श्रीराम ही सब प्रकारसे बली (उत्कृष्ट) हैं ॥ ४ ॥ जानकी-त्रिजटा-संवाद राग जैतश्री [ ४७ ] कब देखौंगी नयन वह मधुर मूरति ? राजिवदल-नयन, कोमल, कृपा-अयन, मयननि बहु छबि अंगनि दूरति ॥ १ ॥ सिरसि जटा-कलाप, पानि सायक, चाप, उरसि रुचिर बनमाल लूरति । तुलसिदास रघुबीरकी सोभा सुमिरि, भई है मगन नहि तनकी सूरति ॥ २ ॥ [जानकीजी कहती हैं-] 'मैं इन नयनोंसे वह मधुर मूर्ति कब देखूँगी ! जिसके कमलदलके समान नेत्र हैं, जो अत्यन्त

३४७ सुन्दरकाण्ड सुकुमार ओर कृपाकी खान है तथा अपने अङ्गोंसे अनेकों कामदेवों- की महतो छविका भी निरादर करती है ॥ १ ॥ जिसके सिरपर जटाजूट है, हाथमें धनुष-बाण हैं और वक्षःस्थलपर मनोहर वनमाला लटकी रहती है। तुलसीदासजी कहते हैं, इस प्रकार रघुनाथजी- की शोभाका स्मरणकर सीताजी प्रेममें मग्न हो रही हैं; उन्हें अपने शरीरकी भी सुधि नहीं है ॥ २ ॥ राग केदारा [ ४८ ] कहु, कबहुँ देखिहों आली ! आरज-सुवन । सानुज सुभग-तनु जबतें बिछुरे बन, तबतें दव-सी लगी तीनिहू भुवन ॥ १ ॥ मूरति सूरति किये प्रगट प्रीतम हिये, मनके करन चाहें चरन छुवन । चित्त चढ़िगो बियोग दसा न कहिबे जोग, पुलक गात, लागे लोचन चुवन ॥ २ ॥ तुलसी त्रिजटा जानी, सिय अति अकुलानी मृदुबानी कह्यौ ऐहैं दवन-दुवन । तमीचर-तम-हारी सुरकंज-सुखकारी रबिकुल रबि अब चाहत उवन ॥ ३ ॥ 'सखि त्रिजटे ! बता तो क्या मैं कभी भाईके सहित मनोहर मूर्ति आर्यपुत्रका दर्शन कर सकूँगी? जबसे वनमें उनका वियोग हुआ है तबसे मेरे लिये तो तीनों लोकोंमें दावानल-सी लगी हुई है ॥ १ ॥ उस मूर्तिकी याद करते ही प्रियतम मेरे हृदयमें प्रकट हो जाते हैं, मैं मनोमय हाथोंसे उनके चरणस्पर्श करना चाहती हूँ; किन्तु जब चित्तपर उनका वियोग चढ़ता है [अर्थात् जब मुझे उन-

वियोगका स्मरण होता है'] तो मेरी दशा कहने योग्य नहीं रहती; शरीर पुलकित हो जाता है और नेत्रोंसे जल चूने लगता है' ॥ २ ॥ तुलसीदास कहते हैं, ऐसा सुनकर जब त्रिजटाने त्रिजटा सीताजीको अत्यन्त व्याकुल देखा तो मधुर वाणीसे कहा—'शत्रुओंका नाश करनेवाले प्रभु राम शीघ्र ही आवेंगे, निशाचररूप अन्धकारका नाश करनेवाले तथा देवतारूप कमलवनके प्रियकारी वे सूर्यकुल-सूर्य अब प्रकट होना ही चाहते हैं' ॥ ३ ॥ [ ४९ ] अबलौं मैं तोसों न कहे री । सुन त्रिजटा ! प्रिय प्राननाथ बिनु बासर निसि दुख दुसह सहे री ॥१॥ बिरह बिषम बिष-बेलि बढ़ी उर, ते सुख सकल सुभाय दहे री । सोइ सींचिबे लागि मनसिजके रहँट नयन नित रहत नहे री ॥२॥ सर-सरीर सूखे प्रान-बारिचर जीवन-आस तजि चलनु चहे री । तैं प्रभु-सुजस-सुधा सीतल करि राखे, तदपि न तृप्ति लहेरी ॥३॥ रिपु-रिस घोर नदी बिबेक-बल, धीर-सहित हुते जात बहेरी । दै मुद्रिका-टेक तेहि औसर, सुचि समीरसुत पैरि गहे री ॥४॥ तुलसिदास सब सोच पोच मृग मन-कानन भरि पूरि रहे री । अब सखि सिय संदेह परिहरु हिय, आइ गए दोउ बीर अहेरी ॥५॥ 'अरी त्रिजटे ! सुन, मैंने तुझसे अभीतक नहीं कहा । परम प्रिय प्राणनाथके बिना मैंने रात-दिन बड़े दुःसह दुख सहे हैं ॥ १॥ मेरे हृदयमें विरहरूप विषम विषकी बेलि हुई है । उसने स्वभावसे ही सारे सुखोंको दग्ध कर दिया है और उसे सींचनेके लिये ही मानो कामदेवके रँहटमें हमारे नेत्र (रूप बैल) सर्वदा जुते रहते हैं ॥ २॥ हमारा शरीररूप सरोवर सूख गया है; अतः उसमें रहनेवाले