गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३७ सुन्दरकाण्ड प्रभुकी अति मनोहर और मङ्गलमयी मूर्ति देखकर विभीषण शोकहीन हो गये और उसके प्रेममें वे देहानुसंधानकी सीमाका अतिक्रमण कर गये ॥ १ ॥ फिर उन्होंने दाहिनी ओरसे उठकर प्रभुके सामनेकी सुखप्रद बैठक माँग ली। वहाँ प्रभुको नखसे सिख- तक देख-देखकर आनन्दित होने लगे। देखिये, वे चाहते कुछ थे ओर हो कुछ और ही गया ! ॥ २ ॥ जिस लङ्काको रावणने करोड़ों बार अपने सिर काट-काटकर अत्यन्त क्लेश उठानेके अनन्तर श्री- महादेवजीसे प्राप्त किया था, वही भगवान्ने विभीषणको अपना अनवसरका अतिथि समझकर [संकोचवश] तृणके आसनके समान दी ! ॥ ३ ॥ प्रभु प्रीति, प्रतीति, रीति और शोभाकी नदीके समान हैं। उनको जहाँ-जहाँ (जिस-जिस गुणकी) थाह ली जाती है, कहीं वे अथाह दिखायी देते हैं ! वे भुजाओंके बड़े पराक्रमी, प्रतिज्ञा के पक्के और (परशुराम आदि) विश्वविजयी वीरोंको जीतनेवाले हैं ॥ ४ ॥ संसारमे ऐसा दयालु और कौन है जिसने दीनजनोंके हृदयोंकी जलन दूर की हो; तुलसीदासजी कहते हैं, संसारमें रामके सिवा और किसका नाम जपनेसे पृथ्वी बिना बोये ही जमती है [अर्थात् सुकृत किये बिना ही पुण्यफल प्राप्त होता है] ? ॥ ५ ॥ [ ३९ ] सब भाँति बिभीषनकी बनी। कियो कृपालु अभय कालहुतें, गइ संसृति-सांसति घनी ॥ १ ॥ सखा लषन-हनुमान, सभु गुर, धनी राम कोसलधनी। हिय ही और, और कीन्हों बिधि, रामकृपा औरै ठनी ॥ २ ॥ कलुष-कलंक-कलेस-कोस भयो जो पद पाय रावन रनी। सोइ पद पाय बिभीषन भो भव-भूषन दलि दूषन-अनी ॥ ३ ॥ गी० २२—