भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 342

गीतावली ३३६ रावणने दूधकी मक्खीके समान निकालकर स्वयं मलाई [ साररूप लङ्काकी विभूति ] ले ली थी, उसीको भगवान्‌ने संसारका भूषण तथा मुद-मङ्गलमयी महिमासे सम्पन्न बना दिया ॥ २ ॥ उस समय ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, मुनि और सिद्धगण उसके भाग्यकी प्रशंसा करने लगे तथा देवताओंने प्रसन्न होकर दुन्दुभी बजाना और हृदय- में प्रसन्न होकर जय-जयकार करते हुए बारंबार पुष्प बरसाना आरम्भ कर दिया ॥ ३ ॥ भगवान्‌ विश्वामित्रजी, जनकजी और पाषाणरूपा अहल्याका संकट दूर कर परशुरामजीके आतंकको नष्ट किया तथा पक्षी ( जटायु ), मृग (मारीच ), शबरी और निशाचर (विभीषण) इन सबकी बिना पूँजीके ही उन्नति की ॥ ४ ॥ इस प्रकार युग- युगमें प्रभुके करोड़ों दिव्य कर्म हैं—यह उनके कुछ नये कार्य नहीं बतलाये गये । हृदयमें रामभजनकी महिमाका उल्लास होनेसे इस समय तुलसीकी भी बान बन गयी है ॥ ५ ॥ [ ३८ ] मंजुल मूरति मंगलमई । भयो बिसोक बिलोकि बिभीषन, नेह देह-सुधि-सीव गई ॥ १ ॥ उठि दाहिनी ओरतें सनमुख सुखद माँगि बैठक लई । नखसिख निरखि-निरखिसुखपावतभावत कछु, कछुऔर भई ॥ २ ॥ बार कोटि सिर काटि, साटि लटि, रावन संकरपै लई । सोइ लंका लखि अतिथि अनवसर राम तृनासन ज्यों दई ॥ ३ ॥ प्रीति-प्रतीति-रीति-सोभा-सरि, थाहत जहँ जहँ तहँ घई । बाहु-बली, बानैत बोलको, बीर बिस्वबिजई जई ॥ ४ ॥ को दयालु दूसरो दुनी, जेहि जरनि दीन-हियकी हई ? तुलसी काको नाम जपत जग जगती जामति बिनु बई ॥ ५ ॥