भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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३३५ सुन्दरकाण्ड अत्यन्त समीप बिठा लिया और उसे सप्रेम अपनाकर, खूब भरोसा दे कुशल-क्षेम पूछने लगे ॥ २ ॥ तब विभीषणने कहा—हे नाथ ! जो लोग आपका नाम जपते हैं, उन्हें भी ब्रह्माजी अच्छी तरह कुशल, कल्याण, मङ्गल और सब प्रकारका सुख प्रदान करते हैं और अपने चारो मुखोंसे उसकी विनती करते हैं [फिर मैं साक्षात् आपहीके समीप बैठा हुआ हूँ, मेरे कुशल-क्षेमका क्या कहना है ? ] ॥ ४ ॥ जिस मूर्तिको बड़े-बड़े मुनि और लोकेश्वरगण भी मनको जीतकर स्वप्नमें भी नहीं देख पाते, उसीने मुझे गोदमें भर निया ! [फिर मेरे सौभाग्यका क्या कहना है ? ] मैं इसमें कोई बात बनाकर नहीं कहता ॥ ५ ॥ [ ३७ ] करुनाकरकी करुना भई । मिटौ मीचु, लहि लंक संक गइ, काहूसो न खुनिस खई ॥ १ ॥ दसमुख तज्यो दूध-माखी-ज्यों, आपु काढ़ि साढ़ी लई । भव-भूषन सोइ कियो बिभीषन मुद मंगल-महिमामई ॥ २ ॥ बिधि-हरि-हर, मुनि-सिद्ध सराहत, मुदित देव दुंदुभी दई । बारहि बार सुमन बरषत, हिय हरषत कहि जै जै जई ॥ ३ ॥ कौसिक-सिला-जनक-संकट हरि भृगुपतिकी टारी टई । खग-मृग, सबर-निसाचर, सबकी पूंजी बिनु बाढ़ी सई । ४ ॥ जुग-जुग कोटि-कोटि करतब, करनी न कछू बरनी नई । राम-भजन-महिमा हुलसी हिय, तुलसीहूकी बनि गई ॥ ५ ॥ इस प्रकार जब करुणाकरकी करुणा हुई तो विभीषणका मरणभय दूर हो गया, लङ्काका राज्य पाकर रावणकी शंका जाती रही तथा किसीसे ईर्ष्या-द्वेष नहीं रहा ॥ १ ॥ जिस विभीषणको