भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 340

गीतावली ३३४ भी उनका गुण गाते हैं ॥ ४ ॥ वे अपने करकमलोंसे सुन्दर धनुष, तरकस और बाणको सुधार रहे हैं; और उस समय जो विभीषणकी चर्चा चल रही है उसे एकाग्रचित्तसे कान लगाकर सुन रहे हैं ॥ ५ ॥ देवतालोग प्रसन्न होकर पुष्पोंकी वर्षा कर रहे हैं। ये शुभ शकुन भावी कल्याणकी सूचना देते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं, जो लोग उस सुहावने समयका ध्यान और स्मरण करते हैं वे कृतकृत्य हैं ॥ ६ ॥ [ ३६ ] रामहि करत प्रणाम निहारिकैं। उठे उमँगि आनंद-प्रेम-परिपूरन बिरद बिचारिकैं ॥ १ ॥ भयो बिदेह बिभीषन उत, इत प्रभु अपनपौ बिसारिकैं। भलीभाँति भावते भरत-ज्यौं भेंट्यौ भुजा पसारिकैं ॥ २ ॥ सादर सबहि मिलाइ समाजहि निपट निकट बैठारिकैं। बूझत छेम-कुसल सप्रेम अपनाइ भरोसे भारिकैं ॥ ३ ॥ नाथ ! कुसल-कल्यान-सुमंगल बिधि सुख सकल सुधारिकैं। देत-लेत जे नाम रावरो, बिनय करत मुख चारिकैं ॥ ४ ॥ जो मूरति सपने न बिलोकत मुनि-महेस मन मारिकैं। तुलसी तेहि हौं लियो अंक भरि, कहत कछू न सँवारिकैं ॥ ५ ॥ भगवान् रामको देखकर विभीषणने प्रमाण किया तब प्रभु अपना विरद [शर०गतपालकत्व] स्मरणकर आनन्द और प्रेमसे परिपूर्ण हो उमगकर उठे ॥ १ ॥ इस समय उधर तो विभीषण विदेह हो गये [ उन्हें शरीरकी कुछ भी सुध न रही ] और इधर प्रभु अपनेको भूलकर प्रिय भाई भरतकी तरह भुजा फैलाकर खूब अच्छी तरह मिले ॥ २ ॥ फिर आदरपूर्वक सारे समाजसे भेंट करा अपने