गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 339, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें३३३ सुन्दरकाण्ड 【 ३५ 】 चले लेन लषन-हनुमान हैं। मिले मुदित बूझि कुसल परसपर-सकुचत करि सनमान हैं ॥ १ ॥ भयो रजायसु पांउ धारिए, बोलत कृपानिधान हैं। दूरितें दीनबंधु देखे, जनु देत अभय-बरदान हैं ॥ २ ॥ सील सहस हिमभानु, तेज सतकोटि भानुहूके भानु हैं। भगतनिकोहित कोटि मातु-पितु अरिन्हको कोटि कुसानु हैं ॥ ३ ॥ जनगुनरज गिरि गनि, सकुचत निज गुन गिरि रज परमानु हैं। बाँह-पगारु, बोलको अबिचल, बेद करत गुनगान हैं ॥ ४ ॥ चारु चाप-तूनोर तामरस-करनि सुधारत बान हैं। चरचा चलति बिभीषनकी, सोइ सुनत सुचित दै कान हैं ॥ ५ ॥ हरषत सुर, बरषत प्रसून सुभ सगुन कहत कल्यान हैं। तुलसी ते कृतकृत्य, जे सुमिरत समय सुहावनो ध्यान हैं ॥ ६ ॥ तब विभीषणको लेनेके लिये लक्ष्मणजी और हनुमान्जी चले। वे प्रसन्नतापूर्वक मिले और कुशल पूछकर परस्पर सम्मान करते हुए सकुचाने लगे ॥ १ ॥ वे बोले—'पधारिये, भगवान्की आज्ञा हो गयी है, कृपानिधान रघुनाथजी आपको बुला रहे हैं।' तब विभीषण- ने दूरहीसे प्रभुको देखा, मानो वे अभयका वर दे रहे हैं ॥ २ ॥ तथा शान्तिमें सहस्रों चन्द्रमाओंके समान, तेजमें अरबों सूर्योंके भी सूर्य, भक्तोंके लिये करोड़ों माता-पिताओंके समान हितकारी और शत्रुओंके लिये करोड़ों अग्नियोंके समान हैं ॥ ३ ॥ वे अपने भक्तके रजंतुल्य गुणोंको पर्वत-समान समझकर सकुचाते हैं और अपने पर्वततुल्य गुणको रजवत् समझते हैं। प्रभु अपनी भुजाओंसे शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले और प्रतिज्ञाके पक्के हैं, ऐसा वेद