गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबुरा, अब इसका स्नेह और आदरपूर्वक पालन कीजिये अथवा जैसा करना उचित हो वह अपने धनुष-बाणसे ही पूछ लीजिये क्योंकि यह स्वभावसे ही दुष्टोंके घातक और साधुजनोंके प्रतिपालक हैं' ॥ ३ ॥ [ ३४ ] सांचेहु बिभीषन आइहै ? बूझत बिहँसि कृपालु लषन सुनि कहत सकुचि सिर नाइ है ॥ १ ॥ ऐहै कहा, नाथ ? आयो ह्याँ, क्यों कहि जाति बनाइ है। रावन-रिपुहि राखि, रघुबर बिनु, को त्रिभुवन पति पाइहै ॥ २ ॥ प्रभु प्रसन्न, सब सभा सराहित, दूत-बचन मन भाइहै। तुलसी, 'बोलिये बेगि,' लषनसों भइ महाराज-रजाइ है ॥ ३ ॥ कृपामय श्रीरामचन्द्र हँसकर पूछते हैं—'क्या सचमुच विभीषण यहाँ आवेगा?' यह सुनकर लक्ष्मणजीने सिर नवाकर सकुचाते हुए कहा—॥ १ ॥ 'प्रभो ! आवेगा क्या, वह तो यहाँ आ गया। आपके सामने ऐसी बात बनाकर कैसे कही जा सकती है? भला रावणके शत्रुको रखकर, एक रघुनाथजीको छोड़कर, और ऐसा कौन तीनों लोकोंमें है जो अपनी प्रतिष्ठा रख सके [अर्थात् त्रिलोकीके अन्य सभी लोगोंको रावण अप्रतिष्ठित कर सकता है, पर आपके यहाँ उसकी कुछ नहीं चलती, इसीसे विभीषण आपकी शरणमें आये हैं]' ॥ २ ॥ प्रभु प्रसन्न हुए, सब सभा प्रशंसा करने लगी और दूतकों भी ये वचन मनमें प्रिय लगे। तुलसीदासजी कहते हैं, उस समय लक्ष्मणजीको महाराजकी आज्ञा हुई कि उसे शीघ्र ही बुला लो ॥ ३ ॥