भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 344

गीतावली ३३८ बांह पगार, उदार सिरोमनि, नत-पालक, पावन पनी। सुमन बरषि रघुबर-गुन बरनत, हरषि देव दुंदभी हनी॥ ४ ॥ रंक-निवाज रंक राजा किए गए गरब गरि गरि गनी। राम-प्रनाम महामहिमा-खनि, सकल-सुमंगलमनि-जनी॥ ५ ॥ होय भलो ऐसे ही अजहुँ गये राम-सरन परिहरि मनी। भुजा उठाइ, साखि संकर करि, कसम खाइ तुलसी भनी॥ ६ ॥ विभीषणकी बात सब प्रकार बन गयी। कृपालु रघुनाथजीने उसे कालसेभी निर्भय करदिया और उसे संसारका घोर त्रास भी नहीं रहा ॥ १॥ उसे लक्ष्मण और हनूमान्-जैसे सखा, शंकर-जैसे गुरु और कोसलेश्वर राम-जैसे स्वामी मिले। उसके हृदयमें तो कुछ और था; किन्तु विधाताने कर कुछ और ही दिया तथा अब रामकृपासे कुछ और ही बानक बन गया ॥ २ ॥ रणधीर रावण जिस [लङ्केश्वर] पदको पाकर पाप, कलंक और क्लेशोंका कोष बनाहुआ था, विभीषण उसी पदको पाकर सम्पूर्ण दोषोंके दलका दलन कर संसारका भूषण बन गया ॥ ३ ॥ जिसकी भुजाएँ दोनोंकी रक्षा करनेके लिये दीवाररूप हैं तथा जो उदारशिरोमणी, प्रणतपालक और पवित्र प्रण करनेवाले हैं, उन रघुनाथजीके गुणोंका देवतालोग प्रसन्न होकर पुष्प बरसाते तथा दुन्दुभी बजाते गान करने लगे ॥ ४ ॥ गरीबनिवाज रघुनाथजीने गरीब विभीषणको राजा बना दिया। इससे बड़े-बड़े धनियोंका (अपनेको भक्तशिरोमणि समझनेवालोंका) मान मर्दन हो गया। भगवान् रामको किया हुआ प्रणाम महामहिमाकी खान है; उससे सब प्रकारके मङ्गलरूप मणियोंका प्रादुर्भाव होता है ॥ ५ ॥ आज भी अभिमान छोड़कर भगवान् रामकी शरण जानेसे इसी प्रकार