भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 345

३३१ सुन्दरकाण्ड भला हो सकता है। यह बात तुलसीदासने शंकरको साक्षी कर भुजा उठा सौगन्ध खाकर कही है ॥ ६ ॥ [ ४० ] कहो, क्यों न विभीषनकी बनै ? गयो छोड़ि छल सरन रामकी, जो फल चारि चारहौं जनै ॥ १ ॥ मंगलमूल प्रनाम जासु जग, मूल अमंगलके खनै ! तेहि रघुनाथ हाथ माथे दियो, को ताकी महिमा भनै ? ॥ २ ॥ नाम-प्रताप पतितपावन किए, जे न अघाने अघ अनै ॥ कोउ उलटो, कोउ सूधो जपि भए राजहंस बायस-तनै ॥ ३ ॥ हुतो ललात कृसगात खात खरि, मोद पाइ कोदो-कनै । सो तुलसी चातक भयो जाचक राम स्यामसुंदर घनै ॥ ४ ॥ कहो, विभीषणकी बात क्यों न बने। जो छल त्यागकर भगवान् रामकी शरण गये थे, जो कि चार प्रकारके भक्तोंके लिये चारों प्रकारके फल उत्पन्न करते हैं ॥ १ ॥ जिनको किया हुआ मङ्गलमूलप्रणाम संसारमें अमङ्गलकी जड़को उखाड़ डालता है. उन्हीं रघुनाथजीने जिनके सिरपर अपना हाथ रक्खा, उन विभीषणजीकी महिमा कौन कह सकता है ॥ २ ॥ जो पाप और अनीति करते कभी नहीं अघाये थे, उन पतितोंको भी प्रभुने अपने नामके प्रतापसे ही पवित्र कर दिया। कोई उलटा और कोई सीधा नाम जपकर ही काकवत् आचरणवाले भी राजहंसवत् शुद्ध हो गये ॥ ३ ॥ जो दुर्बल शरीरवाला था और खली खाता था [जिसे खानेको निस्सार वस्तुएँ ही मिलती थीं], जो एक-एक टुकड़े के लियेलालायित रहता था और कोदोके कण (साधारण भोजन) पाकर भी बड़ा आनन्द