गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ३४० मानता था [अर्थात् महादरिद्र था] वही तुलसी अब पपीहा होकर रामरूप श्यामसुन्दर मेघसे याचना करता है ॥ ४ ॥ [ ४१ ] अति भाग बिभीषनके भले । एक प्रनाम प्रसन्न राम भए, दुरित-दोष-दारिद दले ॥ १ ॥ रावन-कुंभकरन बर माँगत सिव-बिरंचि बाचा छले । राम-दरस पायो अबिचल पद, सुदिन सगुन नीके चले ॥ २ ॥ मिलनि बिलोकि स्वामि-सेवककी ऊकठे तरु फूले-फले । तुलसी सुनि सनमान बंधुको दसकंधर हँसि हिये जले ॥ ३ ॥ विभीषणजीके भाग्य बड़े ही अच्छे हैं, जिनके एक प्रणामसे ही भगवान् राम प्रसन्न हो गये और उनके सारे पाप, दोष तथा दरिद्रता दूर कर दी ॥ १ ॥ जिस समय रावण और कुम्भकर्णने वर मांगा था, उस समय वे शिव और ब्रह्माद्वारा वाणीके फेरसे छले गये [अर्थात् वे माँगना कुछ चाहते थे और शब्दार्थके फेर-फारसे उन्हें कुछ और ही मिला] किन्तु विभीषणने तो रामके दर्शनमात्रसे ही अविचल पद प्राप्त कर लिया (उन्हें मांगनेकी भी आवश्यकता नहीं पड़ी) वास्तवमें वे अच्छे दिन अच्छे शकुनसे चले थे ॥ २ ॥ स्वामी और सेवकका वह सम्मिलन देखकर सूखे वृक्ष भी फूलने-फलने लगे। तुलसीदासजी कहते हैं, भाईका सम्मान हुआ सुनकर रावण मुखसे तो हँसने लगा, किन्तु हृदयमें ईर्ष्यानल से जल उठा ॥ ३ ॥ [ ४२ ] गये राम सरन सबको भलो । गनी-गरीब, बड़ो-छोटो, बुध-मूढ़, हीनबल-अतिबलो ॥ १ ॥