भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 347, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 347

३४१ सुन्दरकाण्ड पंगु-अंध, निरगुनी-निसंबल, जो न लहै जाचे जलो । सो निबह्यो नीके, जो जनमि जग राम-राजमारग चलो ॥ २ ॥ नाम-प्रताप-दिवाकर कर खर गरत तुहिन ज्यों कलिमलो । सुतहित नाम लेत भवनिधि तरि गयो अजामिल सो खलो ॥ ३ ॥ प्रभुपद प्रेम प्रनाम-कामतरु सद्य बिभीषनको फलो । तुलसी सुमिरत नाम सबन्हिको मंगलमय नभ-जल थलो ॥ ४ ॥ रामकी शरण जानेपर सभीका भला होता है, चाहे वह धनी हो या निर्धन, बड़ा हो या छोटा, बुद्धिमान् हो या मूर्ख अथवा दुर्बल हो या अति बलवान् ॥ १ ॥ जो पंगु, अन्धे, गुणहीन और अकिञ्चन हैं, जिन्हें माँगनेपर जबतक नहीं मिलता, उन्होंने भी यदि संसारमें जन्म लेकर रामके राजमार्ग (भक्तियोग) का अवलम्बन किया है तो प्रभुने उनको खूब निभाया ॥ २ ॥ रामनामके प्रताप- रूप सूर्यकी प्रखर किरणोंमें कलिकल्मष भी तुषारके समान पिघल जाता है। देखो, पुत्रके मिससे ही उनका नाम लेनेके कारण अजामिल-जैसा दुष्ट भी भवसागरसे पार हो गया था ॥ ३ ॥ प्रभुके चरणोंमें प्रेमपूर्वक किया हुआ विभीषणका प्रणामरूप कल्पवृक्ष तत्काल ही फलित हो गया। तुलसीदासजी कहते हैं, इसी प्रकार प्रभुका नाम-स्मरण करते ही सबके लिये आकाश, जल और स्थल सभी मङ्गलमय हो जाते हैं ॥ ४ ॥ [ ४३ ] सुजस सुनि श्रवन हौं नाथ आयो सरन । उपल-केवट-गीध-सबरी-संसृति-समन, सोक-श्रम-सीव सुग्रीव आरतिहरन ॥ १ ॥