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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 336, कुल 454 में से

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पृष्ठ 336

गीतावली ३३० बिषम बिषाद-बारिनिधि बूड़त थाह कपीस-कथा लही। गये दुख-दोष देखि पदपंकज, अब न साथ एकौ रही ॥ २ ॥ सिथिल-सनेह सराहत नख-सिख नीक निकाई निरबही। तुलसी मुदित दूत भयो, मानहु अमिय-लाहु माँगत मही ॥ ३ ॥ [वानरसेनाके समीप पहुँचनेपर] विभीषणके मन्त्रीने रघुनाथजी- से आकर कहा—'कृपासिन्धो ! रावणका छोटा भाई निष्कपट भावसे आपके चरणोंके शरणमें आया है ॥ १ ॥ वह अत्यन्त विषादरूप समुद्रमें डूब रहा था कि उसी समय उसे सुग्रीवकी कथारूप थाह मिली। अब आपके चरणकमलोंका दर्शन करके तो उसके सारे दुःख और दोष निवृत्त हो गये हैं और उसे किसी प्रकारकी कामना नहीं रही है' ॥ २ ॥ प्रभुके अङ्ग-अङ्गमें सुन्दरता अच्छी तरह छायी हुई थी। उसे देखकर वह मन्त्री स्नेहसे शिथिल होकर उसकी सराहना करने लगा। तुलसीदासजी कहते हैं, उस समय वह दूत ऐसा प्रसन्न हुआ, मानो उसे मट्ठा माँगते हुए अमृत प्राप्त हो गया हो ॥ ३ ॥ [ ३२ ] बिनती सुनि प्रभु प्रमुदित भए । रीछराज, कपिराज नील-नल बोलि बालिनंदन लए ॥ १ ॥ बूझिये कहा ! रजाइ पाइ नय-धरम सहित ऊतर दए । बली बंधु ताको जेहि बिमोह-बस बैर-बीज बरबस बए ॥ २ ॥ बाँह-पगार द्वार तेरे तैं सभय कबहुँ फिरि गए । तुलसी असरन-सरन स्वामिके बिरद बिराजत नित नए ॥ ३ ॥ दूतकी विनय सुनकर प्रभु परम प्रसन्न हुए। उन्होंने ऋक्षराज जाम्बवान्, कपिपति सुग्रीव, नील, नल और बालिकुमार अंगदको

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