भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 351

३४५ सुन्दरकाण्ड सुनि रघुपतिके बचन बिभीषन प्रेम-मगन, मन चाउ। तुलसिदास तजि आस-त्रास सब ऐसे प्रभु कहँ गाउ॥ ५॥ [भगवान्रामने कहा—] 'मित्र सुग्रीव और लंकापति विभीषण! सुनिये, आपलोगोंसे क्या छिपाना है; जो मेरा प्राकृतिक स्वभाव है वह सच-सच बतलाता हूँ॥ १॥ जो सब प्रकार पतित, दीन और अत्यन्त जड़बुद्धि है और जिसका कहीं भी ठिकाना नहीं है वह यदि शरण आता है तो मैं उसकी सब प्रकार सेवा करता हूँ और उसे कभी नहीं त्यागता—यह बात बाल्मीकि आदि ऋषीश्वर जानते हैं॥ २॥ जिनके चित्तमें एकमात्र मैं ही परम हितकारी हूँ तथाजिन्हें और कोई भी उपाय नहीं सूझता उन्हींके लिये मैं देह धारण कर सारे कार्य करता हूँ और 'मेरा सुयश नष्ट हो जायगा' इस बातसे नहीं डरता॥ ३॥ मैं बारम्बार भुजा उठाकर कहता हूँ, सम्पूर्ण सभा मेरा विश्वास करे—'मुझे अपने दासके समान कोई प्रिय नहीं है। हाँ; निष्कपट प्रीति करनेवाला दास होना चाहिये (क्योंकि 'मोहि कपट छल छिद्र न भावा')' ॥ ४ ॥ रघुनाथजीके ये वचन सुनकर विभीषण प्रेम मगन हो गये और उनके मनमें बड़ा चाव बढ़ा। तुलसीदासजी कहते हैं, 'सब प्रकार- की आशा और भय छोड़कर ऐसे प्रभुका ही गुणगान करो' ॥ ५ ॥ [ ४६ ] नाहिन भजिबे जोग बियो। श्रीरघुबीर समान आन को पूरन-कृपा-हियो ॥ १ ॥ कहहु, कौन सुर सिला तारि पुनि केवट मीत कियो ? कौने गीध अधमको पितु-ज्यों निज कर पिंड दियो ? ॥ २ ॥ कौन देव सबरीके फल करि भोजन सलिल पियो ? बालित्रास-बारिधि बूड़त कपि केहि गहि बाँह लियो ? ॥ ३ ॥