गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ३४६ भजन-प्रभाउ बिभीषन भाष्यौ, सुनि कपि-कटक जियो। तुलसिदासको प्रभु कोसलपति सब प्रकार बरिया ॥ ४ ॥ 'रघुनाथजीके सिवा और कोई भजने योग्य नहीं है। भला उनके समान और किसका हृदय कृपासे पूर्ण है? ॥ बतलाओ, और किस देवताने शिलाका उद्धार करके केवटको मित्र बनाया है और किसने महापतित गृध्रको पिताके समान अपने हाथोंसे पिण्ड दिया है ॥ २ ॥ ऐसा कौन देवता है जिसने शबरीके फल खाकर जल पिया हो; और बालिके भयरूप समुद्रमें डूबते हुए सुग्रीवको भी किसने बाँह पकड़कर निकाला है;' ॥ ३ ॥ इस प्रकार जब विभीषण- ने भगवान्के भजनका प्रभाव कहा तो सारी वानरसेना सुनकर सजीव हो गयी। वास्तवमें तुलसीदासके प्रभु कौसलपति श्रीराम ही सब प्रकारसे बली (उत्कृष्ट) हैं ॥ ४ ॥ जानकी-त्रिजटा-संवाद राग जैतश्री [ ४७ ] कब देखौंगी नयन वह मधुर मूरति ? राजिवदल-नयन, कोमल, कृपा-अयन, मयननि बहु छबि अंगनि दूरति ॥ १ ॥ सिरसि जटा-कलाप, पानि सायक, चाप, उरसि रुचिर बनमाल लूरति । तुलसिदास रघुबीरकी सोभा सुमिरि, भई है मगन नहि तनकी सूरति ॥ २ ॥ [जानकीजी कहती हैं-] 'मैं इन नयनोंसे वह मधुर मूर्ति कब देखूँगी ! जिसके कमलदलके समान नेत्र हैं, जो अत्यन्त