भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 353

३४७ सुन्दरकाण्ड सुकुमार ओर कृपाकी खान है तथा अपने अङ्गोंसे अनेकों कामदेवों- की महतो छविका भी निरादर करती है ॥ १ ॥ जिसके सिरपर जटाजूट है, हाथमें धनुष-बाण हैं और वक्षःस्थलपर मनोहर वनमाला लटकी रहती है। तुलसीदासजी कहते हैं, इस प्रकार रघुनाथजी- की शोभाका स्मरणकर सीताजी प्रेममें मग्न हो रही हैं; उन्हें अपने शरीरकी भी सुधि नहीं है ॥ २ ॥ राग केदारा [ ४८ ] कहु, कबहुँ देखिहों आली ! आरज-सुवन । सानुज सुभग-तनु जबतें बिछुरे बन, तबतें दव-सी लगी तीनिहू भुवन ॥ १ ॥ मूरति सूरति किये प्रगट प्रीतम हिये, मनके करन चाहें चरन छुवन । चित्त चढ़िगो बियोग दसा न कहिबे जोग, पुलक गात, लागे लोचन चुवन ॥ २ ॥ तुलसी त्रिजटा जानी, सिय अति अकुलानी मृदुबानी कह्यौ ऐहैं दवन-दुवन । तमीचर-तम-हारी सुरकंज-सुखकारी रबिकुल रबि अब चाहत उवन ॥ ३ ॥ 'सखि त्रिजटे ! बता तो क्या मैं कभी भाईके सहित मनोहर मूर्ति आर्यपुत्रका दर्शन कर सकूँगी? जबसे वनमें उनका वियोग हुआ है तबसे मेरे लिये तो तीनों लोकोंमें दावानल-सी लगी हुई है ॥ १ ॥ उस मूर्तिकी याद करते ही प्रियतम मेरे हृदयमें प्रकट हो जाते हैं, मैं मनोमय हाथोंसे उनके चरणस्पर्श करना चाहती हूँ; किन्तु जब चित्तपर उनका वियोग चढ़ता है [अर्थात् जब मुझे उन-