गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवियोगका स्मरण होता है'] तो मेरी दशा कहने योग्य नहीं रहती; शरीर पुलकित हो जाता है और नेत्रोंसे जल चूने लगता है' ॥ २ ॥ तुलसीदास कहते हैं, ऐसा सुनकर जब त्रिजटाने त्रिजटा सीताजीको अत्यन्त व्याकुल देखा तो मधुर वाणीसे कहा—'शत्रुओंका नाश करनेवाले प्रभु राम शीघ्र ही आवेंगे, निशाचररूप अन्धकारका नाश करनेवाले तथा देवतारूप कमलवनके प्रियकारी वे सूर्यकुल-सूर्य अब प्रकट होना ही चाहते हैं' ॥ ३ ॥ [ ४९ ] अबलौं मैं तोसों न कहे री । सुन त्रिजटा ! प्रिय प्राननाथ बिनु बासर निसि दुख दुसह सहे री ॥१॥ बिरह बिषम बिष-बेलि बढ़ी उर, ते सुख सकल सुभाय दहे री । सोइ सींचिबे लागि मनसिजके रहँट नयन नित रहत नहे री ॥२॥ सर-सरीर सूखे प्रान-बारिचर जीवन-आस तजि चलनु चहे री । तैं प्रभु-सुजस-सुधा सीतल करि राखे, तदपि न तृप्ति लहेरी ॥३॥ रिपु-रिस घोर नदी बिबेक-बल, धीर-सहित हुते जात बहेरी । दै मुद्रिका-टेक तेहि औसर, सुचि समीरसुत पैरि गहे री ॥४॥ तुलसिदास सब सोच पोच मृग मन-कानन भरि पूरि रहे री । अब सखि सिय संदेह परिहरु हिय, आइ गए दोउ बीर अहेरी ॥५॥ 'अरी त्रिजटे ! सुन, मैंने तुझसे अभीतक नहीं कहा । परम प्रिय प्राणनाथके बिना मैंने रात-दिन बड़े दुःसह दुख सहे हैं ॥ १॥ मेरे हृदयमें विरहरूप विषम विषकी बेलि हुई है । उसने स्वभावसे ही सारे सुखोंको दग्ध कर दिया है और उसे सींचनेके लिये ही मानो कामदेवके रँहटमें हमारे नेत्र (रूप बैल) सर्वदा जुते रहते हैं ॥ २॥ हमारा शरीररूप सरोवर सूख गया है; अतः उसमें रहनेवाले