भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 355

३४६ सुन्दरकाण्ड प्राणरूप जलचर अब जीवनकी आशा छोड़कर उससे कूच करना चाहते हैं। इस समय प्रभुके सुयशरूप अमृतसे सींचकर यद्यपि तूने उन्हें रोक लिया है तो भी उन्हें तृप्ति नहीं हुई है ॥ ३ ॥ वे तो शत्रु की रिसरूप प्रबल नदीमें विवेक बलसे और धैर्यके साथ बहे जाते थे। परन्तु पवित्रचित्त पवनपुत्रने मुद्रिकारूप आधार देकर उन्हें तैरकर पकड़ लिया ॥ ४ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, अरी त्रिजटे ! मेरे मनरूप वनमें तो सब प्रकार शोकरूप तुच्छ मृग भरे हुए हैं। [इसपर त्रिजटा कहती है—] 'सखि सीते ! अब तू अपने हृदयका सन्देह छोड़ दे। देख, दोनों वीर अहेरी (शिकारी) आ गये हैं [वे इन सब मृगोंको मार डालेंगे ]' ॥ ५ ॥ राग बिलावल [ ५० ] सो दिन सोनेको, कहु, कब ऐहै ! जा दिन बँध्यो सिंधु त्रिजटा ! सुनि तू संभ्रम आनि मोहि सुनैहै ॥१॥ बिस्ववन सूर-साधु सतावन रावन कियो आपनो पैहै। कनक-पुरी भयो भूप बिभीषन, बिबुध-समाज बिलोकन धैहै ॥२॥ दिब्य दुंदुभी, प्रसंसिहै मुनिगन, नभतक बिमल बिमाननि छैहै। बरषिहैं कुसुम भानुकुल, मनिपर तब मोको पवनपूत लै जैहै ॥३॥ अनुज सहित सोभिहैं कपिनमहँ, तनु-छबि कोटि मनोजहि तैहै। इन नयनन्हि यहि भाँति प्रानपति निरखि हृदय आनंद न समैहै ॥४॥ बहुरो सदल सनाथ सलछिमन कुसल कुसल बिधि अवध देखैहै । गुर, पुरलोग, सास, दोउ देवर, मिलत दुसह उर तपनि बुतैहै ॥५॥ मंगल-कलस, बधावने घर-घर पैहें मांगने जो जेहि भैहै। बिजय रामराजाधिराजको, तुलसिदास पावन जस गैहै ॥६॥