गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ३५० [सीताजी कहती हैं—] त्रिजटे ! बता, वह सुवर्णदिवस कब आवेगा, जब समुद्रको बँधा सुनकर तू जल्दीसे मेरे पास आकर वह समाचार सुनावेगी; ॥ १ ॥ संसारको दमन करनेवाला और देवता तथा साधुओंको पीड़ित करनेवाला रावण अपने कियेका फल पावेगा, सुवर्णपुरी लंकामें विभीषण राजा हुआ है—यह देखनेके लिये देवता लोग दौड़े आवेंगे? ॥ २ ॥ आकाशमें दिव्य दुन्दुभियोंका घोष होगा, मुनिगण प्रशंसा करेंगे, निर्मल आकाश विमानोंसे आच्छा- दित हो जायगा, जिनसे सूर्यकुलशिरोमणि भगवान् रामपर पुष्पोंकी वर्षा होगी और उसी समय पवनपुत्र हनुमान्जी मुझे प्रभुके पास ले जायँगे ॥ ३ ॥ जिस समय भगवान्राम भाई लक्ष्मणके सहित वानरोंमें विराजमान होंगे और अपने शरीरकी शोभासे करोड़ों कामदेवोंका लज्जावश संतप्त करेंगे, उससमय प्राणपतिको इननेत्रोंसे देखकर मेरा हृदय आनन्दमें फूला न समायेगा ॥ ४ ॥ क्या कुशल विधाता अपने समाज, स्वामी और लक्ष्मणके सहित अयोध्याको फिरसे सकुशल दिखावेगा; उस समय गुरु, पुरजन, सास और दोनों देवरोंसे मिलकर मेरे हृदयकी दुःखह ज्वाला शान्त हो जायगी ॥५॥ उस समय घर-घरमें मंगल कलश सजाये जायँगे और बधाइयाँ बजेंगी; याचकोंमेंसे जिसे जो अच्छा लगेगा वही मिलेगा तथा तुलसीदास राजाधिराज महाराज रामकी विजयका पवित्र यश गान करेगा ॥ ६ ॥ [ ५१ ] सिय ! धीरज धारिये, राघौ अब ऐहैं । पवन पूतपै पाइ तिहारी सुधि, सहज कृपालु, बिलंब न लै हैं ॥१॥