गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
३४७ सुन्दरकाण्ड सुकुमार ओर कृपाकी खान है तथा अपने अङ्गोंसे अनेकों कामदेवों- की महतो छविका भी निरादर करती है ॥ १ ॥ जिसके सिरपर जटाजूट है, हाथमें धनुष-बाण हैं और वक्षःस्थलपर मनोहर वनमाला लटकी रहती है। तुलसीदासजी कहते हैं, इस प्रकार रघुनाथजी- की शोभाका स्मरणकर सीताजी प्रेममें मग्न हो रही हैं; उन्हें अपने शरीरकी भी सुधि नहीं है ॥ २ ॥ राग केदारा [ ४८ ] कहु, कबहुँ देखिहों आली ! आरज-सुवन । सानुज सुभग-तनु जबतें बिछुरे बन, तबतें दव-सी लगी तीनिहू भुवन ॥ १ ॥ मूरति सूरति किये प्रगट प्रीतम हिये, मनके करन चाहें चरन छुवन । चित्त चढ़िगो बियोग दसा न कहिबे जोग, पुलक गात, लागे लोचन चुवन ॥ २ ॥ तुलसी त्रिजटा जानी, सिय अति अकुलानी मृदुबानी कह्यौ ऐहैं दवन-दुवन । तमीचर-तम-हारी सुरकंज-सुखकारी रबिकुल रबि अब चाहत उवन ॥ ३ ॥ 'सखि त्रिजटे ! बता तो क्या मैं कभी भाईके सहित मनोहर मूर्ति आर्यपुत्रका दर्शन कर सकूँगी? जबसे वनमें उनका वियोग हुआ है तबसे मेरे लिये तो तीनों लोकोंमें दावानल-सी लगी हुई है ॥ १ ॥ उस मूर्तिकी याद करते ही प्रियतम मेरे हृदयमें प्रकट हो जाते हैं, मैं मनोमय हाथोंसे उनके चरणस्पर्श करना चाहती हूँ; किन्तु जब चित्तपर उनका वियोग चढ़ता है [अर्थात् जब मुझे उन-
वियोगका स्मरण होता है'] तो मेरी दशा कहने योग्य नहीं रहती; शरीर पुलकित हो जाता है और नेत्रोंसे जल चूने लगता है' ॥ २ ॥ तुलसीदास कहते हैं, ऐसा सुनकर जब त्रिजटाने त्रिजटा सीताजीको अत्यन्त व्याकुल देखा तो मधुर वाणीसे कहा—'शत्रुओंका नाश करनेवाले प्रभु राम शीघ्र ही आवेंगे, निशाचररूप अन्धकारका नाश करनेवाले तथा देवतारूप कमलवनके प्रियकारी वे सूर्यकुल-सूर्य अब प्रकट होना ही चाहते हैं' ॥ ३ ॥ [ ४९ ] अबलौं मैं तोसों न कहे री । सुन त्रिजटा ! प्रिय प्राननाथ बिनु बासर निसि दुख दुसह सहे री ॥१॥ बिरह बिषम बिष-बेलि बढ़ी उर, ते सुख सकल सुभाय दहे री । सोइ सींचिबे लागि मनसिजके रहँट नयन नित रहत नहे री ॥२॥ सर-सरीर सूखे प्रान-बारिचर जीवन-आस तजि चलनु चहे री । तैं प्रभु-सुजस-सुधा सीतल करि राखे, तदपि न तृप्ति लहेरी ॥३॥ रिपु-रिस घोर नदी बिबेक-बल, धीर-सहित हुते जात बहेरी । दै मुद्रिका-टेक तेहि औसर, सुचि समीरसुत पैरि गहे री ॥४॥ तुलसिदास सब सोच पोच मृग मन-कानन भरि पूरि रहे री । अब सखि सिय संदेह परिहरु हिय, आइ गए दोउ बीर अहेरी ॥५॥ 'अरी त्रिजटे ! सुन, मैंने तुझसे अभीतक नहीं कहा । परम प्रिय प्राणनाथके बिना मैंने रात-दिन बड़े दुःसह दुख सहे हैं ॥ १॥ मेरे हृदयमें विरहरूप विषम विषकी बेलि हुई है । उसने स्वभावसे ही सारे सुखोंको दग्ध कर दिया है और उसे सींचनेके लिये ही मानो कामदेवके रँहटमें हमारे नेत्र (रूप बैल) सर्वदा जुते रहते हैं ॥ २॥ हमारा शरीररूप सरोवर सूख गया है; अतः उसमें रहनेवाले
३४६ सुन्दरकाण्ड प्राणरूप जलचर अब जीवनकी आशा छोड़कर उससे कूच करना चाहते हैं। इस समय प्रभुके सुयशरूप अमृतसे सींचकर यद्यपि तूने उन्हें रोक लिया है तो भी उन्हें तृप्ति नहीं हुई है ॥ ३ ॥ वे तो शत्रु की रिसरूप प्रबल नदीमें विवेक बलसे और धैर्यके साथ बहे जाते थे। परन्तु पवित्रचित्त पवनपुत्रने मुद्रिकारूप आधार देकर उन्हें तैरकर पकड़ लिया ॥ ४ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, अरी त्रिजटे ! मेरे मनरूप वनमें तो सब प्रकार शोकरूप तुच्छ मृग भरे हुए हैं। [इसपर त्रिजटा कहती है—] 'सखि सीते ! अब तू अपने हृदयका सन्देह छोड़ दे। देख, दोनों वीर अहेरी (शिकारी) आ गये हैं [वे इन सब मृगोंको मार डालेंगे ]' ॥ ५ ॥ राग बिलावल [ ५० ] सो दिन सोनेको, कहु, कब ऐहै ! जा दिन बँध्यो सिंधु त्रिजटा ! सुनि तू संभ्रम आनि मोहि सुनैहै ॥१॥ बिस्ववन सूर-साधु सतावन रावन कियो आपनो पैहै। कनक-पुरी भयो भूप बिभीषन, बिबुध-समाज बिलोकन धैहै ॥२॥ दिब्य दुंदुभी, प्रसंसिहै मुनिगन, नभतक बिमल बिमाननि छैहै। बरषिहैं कुसुम भानुकुल, मनिपर तब मोको पवनपूत लै जैहै ॥३॥ अनुज सहित सोभिहैं कपिनमहँ, तनु-छबि कोटि मनोजहि तैहै। इन नयनन्हि यहि भाँति प्रानपति निरखि हृदय आनंद न समैहै ॥४॥ बहुरो सदल सनाथ सलछिमन कुसल कुसल बिधि अवध देखैहै । गुर, पुरलोग, सास, दोउ देवर, मिलत दुसह उर तपनि बुतैहै ॥५॥ मंगल-कलस, बधावने घर-घर पैहें मांगने जो जेहि भैहै। बिजय रामराजाधिराजको, तुलसिदास पावन जस गैहै ॥६॥
गीतावली ३५० [सीताजी कहती हैं—] त्रिजटे ! बता, वह सुवर्णदिवस कब आवेगा, जब समुद्रको बँधा सुनकर तू जल्दीसे मेरे पास आकर वह समाचार सुनावेगी; ॥ १ ॥ संसारको दमन करनेवाला और देवता तथा साधुओंको पीड़ित करनेवाला रावण अपने कियेका फल पावेगा, सुवर्णपुरी लंकामें विभीषण राजा हुआ है—यह देखनेके लिये देवता लोग दौड़े आवेंगे? ॥ २ ॥ आकाशमें दिव्य दुन्दुभियोंका घोष होगा, मुनिगण प्रशंसा करेंगे, निर्मल आकाश विमानोंसे आच्छा- दित हो जायगा, जिनसे सूर्यकुलशिरोमणि भगवान् रामपर पुष्पोंकी वर्षा होगी और उसी समय पवनपुत्र हनुमान्जी मुझे प्रभुके पास ले जायँगे ॥ ३ ॥ जिस समय भगवान्राम भाई लक्ष्मणके सहित वानरोंमें विराजमान होंगे और अपने शरीरकी शोभासे करोड़ों कामदेवोंका लज्जावश संतप्त करेंगे, उससमय प्राणपतिको इननेत्रोंसे देखकर मेरा हृदय आनन्दमें फूला न समायेगा ॥ ४ ॥ क्या कुशल विधाता अपने समाज, स्वामी और लक्ष्मणके सहित अयोध्याको फिरसे सकुशल दिखावेगा; उस समय गुरु, पुरजन, सास और दोनों देवरोंसे मिलकर मेरे हृदयकी दुःखह ज्वाला शान्त हो जायगी ॥५॥ उस समय घर-घरमें मंगल कलश सजाये जायँगे और बधाइयाँ बजेंगी; याचकोंमेंसे जिसे जो अच्छा लगेगा वही मिलेगा तथा तुलसीदास राजाधिराज महाराज रामकी विजयका पवित्र यश गान करेगा ॥ ६ ॥ [ ५१ ] सिय ! धीरज धारिये, राघौ अब ऐहैं । पवन पूतपै पाइ तिहारी सुधि, सहज कृपालु, बिलंब न लै हैं ॥१॥
३५१ सुन्दरकाण्ड सेन साजि कपि-भालु का-सम कौतुक ही पाथोधि बँधैहैं । घेरोइपै देखिबो लंकगढ़, बिकल जातुधानी पछितैहैं ॥२॥ निसिचर-सलभ कृसानु राम सर उड़ि-उड़ि परत जरत जड़ जैहैं। रावन करि परिवार अगमनो, जमपुर जात बहुत सकुचैहैं ॥३॥ तिलक सारि, अपनाय बिभीषन, अभय-बाँह दै अमर बसैहैं। जय धुनि मुनि, बरसिहैं सुमनसुर, ब्योम बिमान निसान बजैहैं ॥४॥ बंधु समेत प्रानबल्लभ पद परसि सकल परिताप नसैहैं। राम-बामदिसि देखि तुमहि सब नयनवंत लोचन-फल पैहैं ॥५॥ तुम अति हित चितइहौ नाथ-तनु, बार बार प्रभु तुमहि चितैहैं। यह सोभा, सुख-समय बिलोकत काहू तो पलकैं नहि लैहैं ॥६॥ कपिकुल-लखन-सुयस-जय जानकिसहित कुसल निज नगर सिधैहैं। प्रेम पुलकि आनंद मुदित मन तुलसिदास कल कीरति गैहैं ॥७॥ [त्रिजटा बोली-] 'सीते ! धैर्य धारण करो, अब पवनपुत्रसे तुम्हारी सुधि पाकर रघुनाथजी जल्दी ही आवेंगे। वे स्वभावसे ही कृपालु हैं, इसलिये देरी नहीं करेंगे ॥ १ ॥ वे कालके समान वानर और भालुओंकी सेना सजाकर खेलसे ही समुद्रको बाँध लेंगे। अब तुम लंकाको घिरी ही हुई देखोगी, और राक्षसियाँ व्याकुल होकर पछतायेंगी॥ २॥ राक्षसरूपजड़ पतंगेउड़-उड़करभगवान् रामके बाणरूप अग्निमें गिरकर जलते जायेंगे, तथा रावण अपने परिवारको आगे कर यमलोकको जाते हुए बहुत सकुचावेगा ॥ ३ ॥ भगवान् विभीषणको अपनाकर उसे राजतिलक करेंगे और देवताओंको अभयबाहु देकर देवलोकमें बसायेंगे । उस समय मुनिजन जयध्वनि करेंगे, देवता लोग फूल बरसायेंगे और आकाशमें विमानोंपर चढ़कर बाजे बजायेंगे ॥४॥ तथा भाइयोंसहित अपने प्राण-प्रिय रघुनाथजीके
गीतावली ३५२ चरण-स्पर्श कर अपये सारे संतापोंको नष्ट कर देंगे। भगवान् रामके वाम भागमें तुम्हें विराजमान देखकर सब नेत्रधारी जीव अपने नेत्रोंका फल प्राप्त करेंगे ॥ ५ ॥ तुम अत्यन्त प्रेमसे प्रभुकी ओर देखोगी और प्रभु बार-बार तुम्हें निहारेंगे। यह शोभा और सुखमय समय देखकर किसीके भी नेत्रोके पलक नहीं लगेंगे ॥ ६ ॥ फिर भगवान् राम वानरोंकी सेना, लक्ष्मणजी, सुयड, लंकाकी विजय और सीताजीके सहित कुशलपूर्वक अपने नगरको जायँगे और तुलसीदास प्रेमसे पुलकित हो, आनन्दसे प्रसन्नचित्त होकर प्रभुकी कमनीय कीर्तिका गान करेगा ॥ ७ ॥
लँकाकाण्ड मन्दोदरी-प्रबोध
राग मारू [ १ ] मानु अजहू सिख परिहरि क्रोधु । पिय पूरो आयो अब काहि, कहु, करि रघुबीर-बिरोधु ॥ १ ॥ जेहि ताड़का-सुबाहु मारि, मख-राखि जनायो आपु । कौतुक ही मारीच
३५३ लंकाकाण्ड एकहि बान बालि मारयो जेहि, जो बल उदधि अगाधु । कहु, धौं कंत कुसल बीती केहि कये राम अपराघु ॥ ५ ॥ लांघि न सके लोक विजयी तुम जासु अनुज-कृत-रेषु । उतरि सिंधु जारयो प्रचारि पुर जाको दूत बिसेषु ॥ ६ ॥ कृपासिंधु, खल बन कृसानु सम, जस गावत श्रुति सेषु । सोई बिरुदंत बीर कौसलपति, नाथ ! समुझि जिय देषु ॥ ७ ॥ मुनि पुलस्त्यके जस-मयंक महँ कत कलंक हठि होहि । और प्रकार उबार नहीं कहुँ, मैं देख्यो जग जोहि ॥ ८ ॥ चलु, मिलु बेगु कुसल सादर सिय सहित अग्र करि मोहि । तुलसीदास प्रभु सरन सबद सुनि अभय करेंगे तोहि ॥ ६ ॥ [मन्दोदरी कहती है—] 'प्रियतम ! आप आज भी मेरी सीख मानिये और अपना क्रोध छोड़ दीजिये । भला, आप ही बतलाइये, रघुनाथजीसे विरोध करके कब किसका पूरा पड़ा है ? ॥ १ ॥ जिन्होंने बाल्यावस्थामें ही ताड़का और सुबाहुको मारकर यज्ञकी रक्षा करके अपने प्रभावको प्रकट किया तथा खेलहीमें पापी मारीचके मिससे अपने बाणका प्रताप दिखलाया ॥ २ ॥ फिर समस्त राजाओंके बल-सम्बन्धी अभिमानके सहित शिवजीके कठोर धनुषको तोड़ा और इस प्रकार सम्पूर्ण संसारको जीतकर जानकीसे विवाह किया तथा परशुरामजीका दर्प दूर किया ॥ ३ ॥ जिन्होंने कपट-काक जयन्तको दण्ड दे फिर [शरण आनेपर] उसपर कृपा की, अनायास ही विराधका वध किया तथा खर, दूषण, त्रिशिरा और कबन्धको मारकर देवता और साधुओंको सुखी किया ॥ ४ ॥ फिर जो बलका अगाध समुद्र था उस बालिका एक ही बाणमें वध किया, हे कान्त ! कहो तो उन रामका अपराध करनेपर किसकी कुशल हुई है ? ॥५॥ गी० २३—
गीतावली ३५४ जिनके छोटे भाईकी खींची हुई रेखाको तुम विश्वविजयी होकर भी नहीं लाँघ सके, जिनके एक दूतने समुद्रको पार कर सारे नगरको उलट-पलटकर खूब अच्छी तरह जला दिया ॥ ६ ॥ तथा श्रुति और शेषजी जिनका 'कृपासिन्धु और दुष्टोंके वनके लिये अग्निके समान' ऐसा कहकर सुयश गाते हैं, हे नाथ ! अपने हृदयमें समझकर देख लो, ये यशस्वी वीर वे ही कोशलाधिपति भगवान् राम हैं ॥ ७ ॥ आप इस प्रकार आग्रह करके पुलस्त्य मुनिके यशरूप चन्द्रमामें कंलकरूप क्यों होते हैं ? मैंने संसारको ढूँढ़कर अच्छी तरह देख लिया है, अब और किसी प्रकारसे आपका उद्धार नहीं हो सकता ॥ ८ ॥ अतः अब मुझे आगेकर सीताजीको आदरसहित साथ ले, शीघ्र ही चलकर रघुनाथजीसे मिलिये—इसीमें आपकी कुशल है। आपके मुखसे 'शरण' शब्द सुनते ही प्रभु आपको निर्भय कर देंगे' ॥ ९ ॥ अंगदका दूतकर्म राग कान्हरा [ २ ] तू दसकंठ भले कुल जायो । ता महँ सिव,सेवा, बिरचि-बर, भुजबल बिपुल जगत जस पायो १ खर-दूषन-त्रिसिरा, कबंध रिपु जेहि बाली जमलोक पठायो । ताको दूत पुनीत चरित हरि सुभ संदेस कहन हौं आयो ॥ २ ॥ श्रीमद नृप अभिमान मोहबस, जानत अन जानत हरि लायो ! तजि व्यलीक भजु कारुनीक प्रभु, दैजानकिहि सुनहि समझायो । ३ । जातें तब हित होइ, कुसल कुल. अचल राज चलिहै न चलायो । नाहित रामप्रताप अनलमहँ ह्वै पतंग परि है सठ धायो ॥ ४ ॥
३५५ लंकाकाण्ड जद्यपि अंगद नोति परम हित कह्यो, तथापि न कछु मन भायो । तुलसीदास सुनि बचन क्रोध अति, पावक जरत मनहु घृत नायो ५ [अंगदजी बोले—] 'रावण ! तुम अच्छे कुलमें उत्पन्न हुए हो । तिसपर भी श्रीमहादेवजीकी पूजा, ब्रह्माजीके वरदान और अपने विपुल बाहुबलसे तुमने जगत्में सुयश प्राप्त किया है ॥ १ ॥ जिन्होंने खर, दूषण, त्रिशिरा, कबन्ध और बालि शत्रुओंको यमलोक भेज दिया है, मैं उन्हींका दूत हूँ और तुम्हें पवित्रचरित्र श्रीहरिका सन्देश सुनानेके लिये आया हूँ ॥ २ ॥ तुम ऐश्वर्यके अभिमान, राजपद अथवा मोहके अधीन होकर जानकर या बिना जाने किसी प्रकार जानकीको हर लाये हो, अब उन्हें रघुनाथजीको लौटा दो और कपट त्यागकर उन करुणामय प्रभुका भजन करो— इतनी हमारी शिक्षा मान लो ॥ ३ ॥ जिससे तुम्हारा हित हो और तुम्हारा कुल सकुशल रहे तथा राज्य अविचल होकर किसीका टाला न टले । नहीं तो, हे मूढ़ ! तुम रामचन्द्रजीके प्रतापरूप अग्निमें पतंग होकर दौड़-दौड़कर गिरोगे' ॥ ४ ॥ इस प्रकार यद्यपि अंगद- जीने यह परम हितकारी नीति कही, तथापि रावणको यह कुछ भी अच्छी न लगी । तुलसीदासजी कहते हैं, ये वचन सुनकर उसे बड़ा ही क्रोध हुआ, मानो जलती हुई अग्निमें घृत डाल दिया गया हो ॥५॥ [ ३ ] तैं मेरो मरम कछू नहिं पायो । रे कपि कुटिल ढीठ पसु पाँवर ! मोहि दास-ज्यों डाटन आयो ॥१॥ भ्राता कुंभकरन रिपुघातक, सुत सुरपतिहि बंदि करि ल्यायो । निज भुजबल अति अतुल कहौं क्यों, कंदुक ज्यों कैलास उठायो ॥ २ ॥
गीतावली ३५६ सुर, नर, असुर, नाग, खग, किंनर—सकल करत मेरो मन भायो । निसिचर रुचिर अहार मनुज-तनु, ताको जस खल ! मोहि सुनायो कहा भयो, बानर सहाय मिलि, करि उपाय जो सिंधु बँधायो । धो तरिहै भुज बीस घोर निधि, ऐसौ को त्रिभुवनमें जायो ? ॥४॥ सुनि दससीस-बचन कपि-कुंजर बिहँसि ईसमायहि सिर नायो । तुलसिदास लंकेस कालबस गनत न कोटि जतन समझायो ॥ ५ ॥ [रावण बोला—] 'अरे कुटिल और ढीठ वानर ! तूने मेरा प्रभाव कुछ भी नहीं समझा। रे पामर पशु ! इसीलिये तू मुझे दास- के समान डांटनेके लिये आया है ॥ १ ॥ तू जानता नहीं—मेरा भाई शत्रुओंका नाश करनेवाला कुम्भकर्ण है और पुत्र साक्षात् देवराजको भी बंदी बना लाया था। मैं अपने अतुलित बाहुबलका तो वर्णन ही क्या करूँ, जिसने कैलासको गेंदके समान उठा लिया था ॥ २ ॥ देवता, मनुष्य, राक्षस, नाग, पक्षी और किन्नर—ये सब मेरी इच्छाका अनुवर्तन करते हैं। अरे दुष्ट ! मनुष्योंका शरीर तो राक्षसोंका प्रिय भोजन है। तू मुझे उसका सुयश सुनाने चला है ! ॥ ३ ॥ यदि वानरोंकी सहायता लेकर वह यत्न करके समुद्रको पार भी कर आया तो कौन बड़ी बात हो गयी ? किन्तु जो मेरी बीस भुजारूप घोर समुद्रको पार कर सके ऐसा त्रिलोकीमें कौन उत्पन्न हुआ है ?' ॥ ४ ॥ रावणके ये वचन सुन कपि-केसरी अंगदने ईश्वरकी मायाको सिर नवाया। तुलसीदासजी कहते हैं, अंगदजीने रावणको करोड़ों उपाय करके समझाया, परंतु कालके अधीन होनेके कारण उसने कुछ भी ध्यान नहीं दिया ॥ ५ ॥
३५७ लंकाकाण्ड
[ ४ ]
सुनु खल ! मैं तोहि बहुत बुझायो । एतो मान सठ ! भयो मोहबस, जानतहु चाहत बिष खायो ॥ १ ॥ जगत-बिदित अति बीर बालि-बल जानत हौँ, किधौँ अब बिसरायो । बिनु प्रयास सोउ हत्यो एक सर, सरनागतपर प्रेम दिखायो ॥ २ ॥ पावहुगे निज करम-जनित फल, भले ठौर हठि बैर बढ़ायो । बानर-भालु चपेट चपेटनि मारत, तब ह्वैहै पछितायो ॥ ३ ॥ हौँ ही दसन तोरिबे लायक, कहा करौँ, जो न आयसु पायो । अब रघुबीर-बान-बिदलित उर सोवहिगो रनभूमि सुहायो ॥ ४ ॥ अबिचल राज बिभीषनको सब, जेहि रघुनाथ-चरन चित लायो । तुलसिदास यहि भांति बचन कहि गरजत चल्यो बालि-नृप-जायो
[अंगदजीने कहा—] 'रे दुष्ट ! सुन, मैंने तुझे बहुतेरा समझाया, परन्तु तू मोहवश ऐसे घमण्डमें भर गया है कि जानबूझकर विष खाना चाहता है ॥ १ ॥ जगतप्रसिद्ध महान् वीर बालिका बल तो तू जानता है न, या अब भूल गया ? देख, उसे रघुनाथजीने अनायास एक बाणसे ही मार डाला और अपने शरणागत सुग्रीवपर प्रेम दिखलाया ॥२॥ तुम भी अपने कर्मोंका फल भोगोगे तुमने आग्रह- पूर्वक अच्छी जगह बैर बढ़ाया है ! अब, जिस समय रीछ और वानर तुम्हें चपेटमें लेकर मारेंगे उस समय पश्चात्ताप होगा ॥ ३ ॥ तुम्हारे दाँत तोड़नेके लिये तो मैं ही पर्याप्त हूँ; परंतु करूँ क्या, इसके लिये मैंने प्रभुकी आज्ञा प्राप्त नहीं की है । अब तुम शीघ्र ही रामचन्द्रजीके बाणोंसे छिन्नहृदय होकर सुन्दर युद्धस्थलमें सोओगे ॥४॥ तुम्हारा यह अविचल राज्य तो सारा-का-सारा विभीषणको ही मिलेगा ।
गीतावली ३५८ जिसने रघुनाथजीके चरणोंमें चित्त लगाया है।' तुलसीदासजी कहते हैं, रावणसे ऐसे वचन कह वानरराज बालिके पुत्र अंगदजी गरजते हुए वहांसे चल दिये ॥ ५ ॥ लक्ष्मण-मूर्च्छा राग केदारा [ ५ ] राम-लषन उर लाय लये हैं। भरे नीर राजीव-नयन सब अँग परिताप तए हैं॥ १ ॥ कहत ससोक बिलोकि बंधु-मुख बचन प्रीति गुथए हैं। सेवक-सखा भगति-भायप-गुन चाहत अब अथए हैं॥ २ ॥ निज कीरति-करतूति तात ! तुम सुकृतौ सफल जए हैं। मैं तुम्ह बिनु तनु राखि लोक अपने अपलोक लए हैं॥ ३ ॥ मेरे पनकी लाज इहाँलों हठि प्रिय प्रान दए हैं। लागति सांगि बिभीषन ही पर, सीपर आपु भए हैं॥ ४ ॥ सुनि प्रभु-बचन भालु-कपि-गन, सुर सोच सुखाइ गए हैं। तुलसी आइ पवनसुत-बिधि मानो फिरि निरमये नए हैं॥ ५ ॥ [जिस समय मेघनादकी शक्ति खाकर लक्ष्मणजी मूर्च्छित हो गये और हनुमान्जी उन्हें भगवान् रामके पास ले आये, उस समय] रघुनाथजीने लक्ष्मणजीको उठाकर हृदयसे लगा लिया। उनके नेत्र- कमल जलसे भर आये और सब अङ्ग परितापसे संतप्त हो गये ॥ १ ॥ वे भाईका मुख देखकर अत्यन्त शोकयुक्त हो ये प्रीतिग्रथित वचन कहने लगे—'अब सेवक, सखा, भक्ति भ्रातृत्वके सारे गुण अस्त होनेवाले हैं ॥ २ ॥ हे तात ! अपनी कीर्ति और कृतिसे तुमने समस्त
३५६ लंकाकाण्ड सुकृतियोंको जीत लिया। अब तुम्हारे बिना इस शरीरको रखकर मैंने लोकमें अपकीर्ति ही कमायी है॥ ३॥ अहो! मेरी प्रतिज्ञाकी तुम्हे यहां तक लाज है कि उसके लिये अपने प्रिय प्राणतक दे डाले हैं; इसीलिये यद्यपि शक्ति तो विभीषणके हृदयपर लगनेवाली थी, परंतु उसकी रक्षा करने लिये तुम उसकी ढाल बन गये!'॥ ४॥ प्रभुके ये वचन सुनकर रीछ, वानर और देवतागण शोकसे सूख गये। तुलसीदासजी कहते हैं, इसी समय ब्रह्मारूप हनुमान्जीने [ओषधिके सहित आकर] मानो उन्हें फिरसे नया बना दिया ॥ ५॥ राग सोरठा [६] मोपै तो न कछू ह्वै आई। ओर निबाहि भली बिधि भायप चल्यो लखन-सो भाई ॥ १ ॥ पुर, पितु-मातु, सकल सुख परिहरि जेहि बन-बिपति बँटाई। ता सँग हौं सुरलोक सोक तजि सक्यो न प्रान पठाई ॥ २ ॥ जानत हौं या उर कठोरतें कुलिस कठिनता पाई। सुमिरि सनेह सुमित्रा-सुतको दरकि दरार न जाई ॥ ३ ॥ तात-मरन, तिय-हरन, गीध-बध, भुज दाहिनी गवाई। तुलसी मैं सब भांति आपने कुलहि कालिमा लाई ॥ ४ ॥ 'हाय! मुझसे तो कुछ भी नहीं बना! आज लक्ष्मण-जैसा भाई भ्रातृत्वका अन्ततक अच्छी तरह निर्वाह करके चला गया ॥ १ ॥ जिसने नगर, पिता, माता और सब प्रकारके सुखत्यागकर मेरी वनकी विपत्तिको बँटाया था, उसके साथ मैं अपने प्राणोंको भी शोक त्याग- कर सुरलोक नहीं भेज सका! ॥ २॥ मालूम होता है, वज्रने भी
मेरे इस कठोर हृदयसे ही कठिनता प्राप्त की है, इसीसे सुमित्रा- नन्दनके स्नेहका स्मरण करके इसमें फटकर कोई दरार नहीं पड़ी ॥ ३ ॥ हाय ! मेरे कारण ही पिताजीकी मृत्यु हुई, स्त्रीका अपहरण हुआ, गृध्रराजके प्राण गये और अब मुझे यह दाहिनी भुजा (लक्ष्मण) भी गँवानी पड़ी । इस प्रकार मैंने सब तरह अपने कुलको कलंक ही लगाया है ॥ ४ ॥
[ ७ ]
मेरो सब पुरुषारथ थाको । बिपति बँटावन बंधु-बाहु बिनु करौं भरोसो काको ॥ १ ॥ सुनु, सुग्रीव ! सांचेहू मोपर फेक्यो बदन बिधाता । ऐसे समय समर-संकट हौं तज्यो लखन-सो भ्राता ॥ २ ॥ गिरि, कानन जैहैं साखा-मृग, हौं पुनि अनुज-सँघाती । ह्वै है कहा बिभीषनकी गति रही सोच भरि छाती ॥ ३ ॥ तुलसी सुनि प्रभु-बचन भालु-कपि सकल बिकल हिय हारे । जामवंत हनुमंत बोलि तब, औसर जानि प्रचारे ॥ ४ ॥
‘अब मेरा सारा पुरुषार्थ थक गया । अपनी विपत्तिको बँटाने- वाले भाईरूप भुजाके बिना अब मैं किसका भरोसा करूँ ? ॥ १ ॥ सुग्रीव ! सुनो, विधाताने सचमुच मेरी ओरसे मुंह फेर रखा है, इसीसे ऐसे समय युद्धका संकट उपस्थित होनेपर मुझे लक्ष्मण-जैसे भाईने त्यागदिया ॥२॥ बानर तो पर्वत और वनोंमें चले जायँगे और मैं भैया लक्ष्मणका साथ पकडूंगा, परंतु मेरे हृदयमें यही सोच भरा हुआ है कि विभीषणकी क्या गति होगी’ ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, प्रभुके ये वचन सुनकर सब रीछ-वानर हृदयमें व्याकुल
३६१ लंकाकाण्ड होकर थकित हो गये। तब जाम्बवान्ने हनुमान्जीको बुलाकर उत्तेजित किया ॥ ४ ॥ राग मारू [ ८ ] जौ हौं अब अनुसासन पावौं। तौ चंद्रमहि निचोरि चैल-ज्यौं, आनि सुधा सिर नावौं ॥ १ ॥ कै पाताल दलौं ब्यालावलि अमृत-कुण्ड महि लावौं। भेदि भुवन, करि भानु बाहिरो तुरत राहु दं तावौं ॥ २ ॥ बिबुध-बैद बरबस आनौं धरि, तौ प्रभु-अनुज कहावौं। पटकौं मीच नीच मूषक-ज्यौं, सबहिको पापु बहावौं ॥ ३ ॥ तुम्हरिहि कृपा, प्रताप तिहारेहि नेकु बिलंब न लावौं। दीजै सोइ आयसु तुलसी-प्रभु, जेहि तुम्हरे मन भावौं ॥ ४ ॥ [तब हनुमान्जी कहने लगे—] 'प्रभो ! यदि इस समय मुझे आज्ञा मिले तो मैं चन्द्रमाको वस्त्रके समान निचोड़कर उससे अमृत लाकर ही आपको सिर नवाऊँ ॥ १ ॥ अथवा पातालमें [अमृतकी रक्षा करनेवाले] सर्पोंको मारकर अमृत-कुण्डको भूमिपर उठा लाऊँ [यदि उससे भी काम न चले तो] भुवनकोशको फोड़कर सूर्यको बाहर निकाल दूँ और तुरंत ही उस छिद्रपर राहुको रखकर उसे मूँद दूँ [जिससे फिर सूर्य न आ सके और प्रातःकाल न हो] ॥ २ ॥ यही नहीं, यदि मैं देवताओंके वैद्य अश्विनीकुमारोंको बलपूर्वक ले आऊँ, तभी प्रभुका अनुचर कहलाऊँ । नीच मृत्युको मूषकके समान पटक दूँ और इस प्रकार सभीका पाप काट दूँ [फिर किसीको मरनेका ही भय न रहे] ॥ ३ ॥ प्रभो ! आपकी
गीतावली ३६२ कृपा और आपहीके प्रतापसे मैं इन कार्योंमें तनिक भी देरी नहीं करूँगा। अतः हे तुलसीदासके स्वामी ! जिसके करनेसे मैं तुमको प्रिय लगूँ, वही आज्ञा दीजिये ॥ ४ ॥ [ ९ ] सुनि हनुमंत-बचन रघुबीर। सत्य, समीर-सुवन ! सब लायक, कह्यो राम धरि धीर ॥ १ ॥ चहिये बैद, ईस-आयसु धरि सीस कीस बलऐन। आन्यो सदनसहित सोवत ही, जौलौं पलक परै न ॥ २ ॥ जियै कुँवर, निसि मिले मूलिका, कीन्हीं बिनय सुषेन। उठ्यो कपीस, सुमिरि सीतापति, चल्यो सजीवनि लेन ॥ ३ ॥ कालनेमि दलि बेगि बिलोक्यो द्रोनाचल जिय जानि। देखी दिब्य ओषधी जहँ तहँ जरी, बेग न परि पहिचानि ॥ ४ ॥ लियो उठाय कुधर कंदुक-ज्यों, बेग न जाइ बखानि। ज्यों धाए गजराज-उधारन सपदि सुदरसनपानि ॥ ५ ॥ आनि पहार जोहारे प्रभु, कियो बेदराज उपचार। करुनासिंधु बंधु भेट्यो, मिटि गयो सकल दुख-भार ॥ ६ ॥ मुदित भालु-कपि-कटक, लह्यो कनु समर पयोनिधि पार। बहुरि ठौरही राखि महीधर आयो पवनकुमार ॥ ७ ॥ सेन सहित सेवकहि सराहत पुनि पुनि राम सुजान। बरषि सुमन, हिय हरषि प्रसंसत बिबुध बजाइ निसान ॥ ८ ॥ तुलसिदास सुधि पाइ निसाचर भए मनहु बिनु प्रान। परी भोरही रोर लंकगढ़, दई हाँक हनुमान ॥ ९ ॥ हनुमान्जीके ये वचन सुनकर रघुश्रेष्ठ भगवान् रामने धैर्य धारणकर कहा—'पवनन्दन ! तुम्हारा कथन सर्वथा सत्य है,
३६३ लंकाकाण्ड तुम वास्तवमें यह सभी कुछ करनेमें समर्थ हो ॥ १ इस समय एक वैद्यकी आवश्यकता है। भगवान्की यह आज्ञा सिरपर रखकर बलशाली वानरराज, जितनी देरमें पलक भी न लगे इतनेहीमें एक वैद्यको उसके घरसहित सोते हुए ही उठा लाये ॥ २ ॥ उस सुषेण नामक वैद्यने विनयपूर्वक कहा—'यदि रात्रिके भीतर ही संजीवनी बूटी मिल सके तो कुंवर जीवित हो सकते हैं।' यह सुनते ही वानरेश्वर हनुमान्जी सीतापति भगवान् रामका स्मरण करते हुए उठे और संजीवनी बूटी लेनेके लिये चल दिये ॥ ३ ॥ उन्होंने मार्गमें कालनेमिको मारकर शीघ्र ही द्रोणाचलको देखा और उसे अपने चित्तसे ही पहचान लिया। वहाँ उन्होंने जहाँ-तहाँ बहुत-सी दिव्य ओषधियाँ देखीं; परंतु वे उस बूटीको न पहचान सके ॥ ४ ॥ तब उन्होंने उस पर्वतको गेंदके समान उठा लिया। उस समयके उनके वेगका वर्णन नहीं किया जा सकता। ऐसा जान पड़ता था, मानो गजराजका उद्धार करनेके लिये बड़ी शीघ्रतासे चक्रपाणि भगवान् विष्णु दौड़े जा रहे हों ॥ ५ ॥ इस प्रकार पहाड़को लाकर उन्होंने प्रभुको प्रणाम किया और वैद्यराजने लक्ष्मणजीकी चिकित्सा की [ इससे लक्ष्मणजी तत्काल सचेत हो गये]। तब करुणासागरभगवान्रामने भाईका आलिंगन किया और इससे उनके दुःखका सारा भार मिट गया ॥ ६ ॥ रीछ और वानरोंका दल भी ऐसा आनन्दित हुआ, मानो उसे संग्रामरूप समुद्रका पार मिल गया हो। तत्पश्चात्, हनुमान्जी उस पर्वतको जहाँ-का-तहाँ रख आये ॥ ७ ॥ उस समय सम्पूर्ण सेनाके सहित परम चतुर भगवान् राम बारंबार अपने सेवककी प्रशंसा करने लगे तथा देवतालोग भी
गीतावली ३६४ पुष्पोंकी वर्षा कर, हृदयमें आनन्दित हो दुन्दुभी बजाते हुए उनकी बड़ाई करने लगे ॥ ८ ॥ तुलसीदास कहते हैं, इस समाचारको पाकर राक्षसगण तो मानो प्राणहीन हो गये । प्रातःकाल होते ही जब हनुमान्जीने हाँक लगायी तो लंकापुरीमें हाहाकार मच गया ॥ ९ ॥ राग केदारा [ १० ] कौतुक ही कपि कुधर लियो है। चल्यो नभ नाइ माथ रघुनाथहि, सरिस न बेग बियो है ॥ १ ॥ देख्यो जात जानि निसिचर, बिनु फर सर हन्यो हियो है। परचो कहि राम, पवन राख्यो गिरि, पुर तेहि तेज पियो है ॥ २ ॥ जाइ भरत भरि अंक भेंटि निज, जांवन दान दियो है। दुख लघु लषन मरम घायल सुनि, सुख बड़ो कीस जियो है ॥ ३ ॥ आयसु इतहि, स्वामि संकट उत, परत न कछू कियो है। तुलसिदास बिदरचो अकास, सो कैसेंकें जात सियो है ॥ ४ ॥ [अब पर्वत लाते समय मार्गमें जो घटना हुई उसका वर्णन करते हैं—] हनुमान्जीने खेलसे ही पर्वत उठा लिया और रघुनाथ- जीको सिर नवा आकाशमार्गसे चल दिये । उस समय उनके समान और किसीका वेग नहीं था ॥ १ ॥ उन्हें [अयोध्याके ऊपर होकर ] जाते देख भरतजीने राक्षस जानकर उनके हृदयमें बिना गाँसीका बाण मारा । तब वे 'राम' ऐसा कहते हुए गिर पड़े । पवनने [अयोध्याकी रक्षा करनेके लिये] पर्वतको रोक लिया, मानो नगरने उनका तेज पी लिया हो ॥ २ ॥ तब भरतजीने
३६५ लंकाकाण्ड [उनके मुखसे रामनाम सुन] उनके समीप जा अपनी भुजाओंमें भरकरउनका आलिङ्गनकिया और उन्हें जीवनदान दिया। लक्ष्मणजी मर्माहत हुए हैं—यह सुनकर तो उन्हें थोड़ा-सा दुःख हुआ, परंतु हनूमान्जीको जीवित देखकर वे परम आनन्दित हुए ॥ ३ ॥ स्वामीकी आज्ञा इधर आयोध्यामें ही रहनेकी है और उधर उनपर युद्धका संकट पड़ा हुआ है—इसपर भरतजीने बहुत कुछ विचार किया, परंतु उनसे कुछ करते न बना। तुलसीदासजी कहते हैं, [भरतजीकी अवस्था उस समय ऐसी थी] जैसे आकाश फट जाय तो उसे कैसे सिया जाय ? ॥ ४ ॥ [ ११ ] भरत-सत्रुसूदन बिलोकी कपि चकित भयो है। राम-लषन रन जीति अवध आए, कैधौं मोहि भ्रम, कैधौं काहू कपट ठयो है॥ १ ॥ प्रेम पुलकि, पहिचानिकैं पदपदुम नयो है। कह्यो न परत जेहि भांति दुहु भाइन सनेहसों उर लाय लयो है॥ २ ॥ समाचार कह गहरु भो, तेहि ताप तयो है। कुधर सहित चढ़ौ बिसिख, बेगि, पठवौं, सुनि हरि हिय गरब गूढ़ उपयो है॥ ३ ॥ तीरतें उतरि जस कह्यो चहैं, गुनगननि जयो है। धनि भरत ! धनि भरत ! करत भयो, मगन मौन रह्यो मन अनुराग रयो है॥ ४ ॥ यह जलनिधि खन्यो, मथ्यो, लँघ्यो,बांध्यो,अँचयो है। तुलसिदास रघुबीर बंधु-महिमाको सिंधु तरि को कसि पार गयो है ? ॥ ५ ॥
गीतावली ३६६ हनूमान्जी भरत और शत्रुघ्नको देखकर बड़े विस्मित हुए । वे सोचने लगे—क्या राम और लक्ष्मण युद्धमें विजय प्राप्तकर अयोध्यामेंआ गये हैं या मुझे भ्रम होरहा है ? अथवा यहकिसीने कपट किया है ॥१॥ फिर उन्हें पहचानकर उन्होंने प्रेमसे पुलकित हो उनके चरणकमलोंमें प्रणाम किया । उस समय उन्हें दोनों भाइयोंने जैसे प्रेमसे हृदयसे लगाया, वह कहा नहीं जाता ॥ २ ॥ फिर उन्हें सारे समाचार सुनाकर कहा—'मुझे विलम्ब हो रहा है।' वे सब बातें सुनकर भरतजी दुःखसे संतप्त हो गये और बोले—'तुम पर्वतसहित मेरे बाणपर चढ़ जाओ, मैं तुरन्त ही तुम्हें रघुनाथजीके प'स भेज दूंगा !' यह सुनकर हनुमान्जीके हृदयमें गुप्तरूपसे गर्वका आविर्भाव हुआ ॥ ३ ॥ [वे उनके बाणपर चढ़े और जब देखा कि उनके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है । ] तो उससे उतरकर उनका सुयश कहना चाहा । भरतजीके गुणोंने उन्हें जीतलिया । उनकामन अनुराग- में डूब गया तथा 'भरतजी धन्य हैं, भरतजी धन्य हैं, इस प्रकार कहते हुए प्रेममें मग्न होकर वे चुप रह गये ॥४॥ तुलसीदासजी कहते हैं, इस समुद्रको तो [सगर-पुत्रोंने] खोदा है, [देवता और दैत्योंने] मथा है, [हनूमान्जीने] लांघा है, [नल-नीलने बांधा है और [अस्त्यजीने] पिया है; किन्तु रघुनाथजीके भाई भरतजीकी महिमाके समुद्रको तरकर भला कौन कवि पार गया है ? ॥ ५ ॥ [ १२ ] होतो नहि जौ जग जनम भरतको । तौ, कपि कहत, कृपान-धार मग चलि आचरत बरत को ? ॥ १ ॥