गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमेरे इस कठोर हृदयसे ही कठिनता प्राप्त की है, इसीसे सुमित्रा- नन्दनके स्नेहका स्मरण करके इसमें फटकर कोई दरार नहीं पड़ी ॥ ३ ॥ हाय ! मेरे कारण ही पिताजीकी मृत्यु हुई, स्त्रीका अपहरण हुआ, गृध्रराजके प्राण गये और अब मुझे यह दाहिनी भुजा (लक्ष्मण) भी गँवानी पड़ी । इस प्रकार मैंने सब तरह अपने कुलको कलंक ही लगाया है ॥ ४ ॥
[ ७ ]
मेरो सब पुरुषारथ थाको । बिपति बँटावन बंधु-बाहु बिनु करौं भरोसो काको ॥ १ ॥ सुनु, सुग्रीव ! सांचेहू मोपर फेक्यो बदन बिधाता । ऐसे समय समर-संकट हौं तज्यो लखन-सो भ्राता ॥ २ ॥ गिरि, कानन जैहैं साखा-मृग, हौं पुनि अनुज-सँघाती । ह्वै है कहा बिभीषनकी गति रही सोच भरि छाती ॥ ३ ॥ तुलसी सुनि प्रभु-बचन भालु-कपि सकल बिकल हिय हारे । जामवंत हनुमंत बोलि तब, औसर जानि प्रचारे ॥ ४ ॥
‘अब मेरा सारा पुरुषार्थ थक गया । अपनी विपत्तिको बँटाने- वाले भाईरूप भुजाके बिना अब मैं किसका भरोसा करूँ ? ॥ १ ॥ सुग्रीव ! सुनो, विधाताने सचमुच मेरी ओरसे मुंह फेर रखा है, इसीसे ऐसे समय युद्धका संकट उपस्थित होनेपर मुझे लक्ष्मण-जैसे भाईने त्यागदिया ॥२॥ बानर तो पर्वत और वनोंमें चले जायँगे और मैं भैया लक्ष्मणका साथ पकडूंगा, परंतु मेरे हृदयमें यही सोच भरा हुआ है कि विभीषणकी क्या गति होगी’ ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, प्रभुके ये वचन सुनकर सब रीछ-वानर हृदयमें व्याकुल