गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६१ लंकाकाण्ड होकर थकित हो गये। तब जाम्बवान्ने हनुमान्जीको बुलाकर उत्तेजित किया ॥ ४ ॥ राग मारू [ ८ ] जौ हौं अब अनुसासन पावौं। तौ चंद्रमहि निचोरि चैल-ज्यौं, आनि सुधा सिर नावौं ॥ १ ॥ कै पाताल दलौं ब्यालावलि अमृत-कुण्ड महि लावौं। भेदि भुवन, करि भानु बाहिरो तुरत राहु दं तावौं ॥ २ ॥ बिबुध-बैद बरबस आनौं धरि, तौ प्रभु-अनुज कहावौं। पटकौं मीच नीच मूषक-ज्यौं, सबहिको पापु बहावौं ॥ ३ ॥ तुम्हरिहि कृपा, प्रताप तिहारेहि नेकु बिलंब न लावौं। दीजै सोइ आयसु तुलसी-प्रभु, जेहि तुम्हरे मन भावौं ॥ ४ ॥ [तब हनुमान्जी कहने लगे—] 'प्रभो ! यदि इस समय मुझे आज्ञा मिले तो मैं चन्द्रमाको वस्त्रके समान निचोड़कर उससे अमृत लाकर ही आपको सिर नवाऊँ ॥ १ ॥ अथवा पातालमें [अमृतकी रक्षा करनेवाले] सर्पोंको मारकर अमृत-कुण्डको भूमिपर उठा लाऊँ [यदि उससे भी काम न चले तो] भुवनकोशको फोड़कर सूर्यको बाहर निकाल दूँ और तुरंत ही उस छिद्रपर राहुको रखकर उसे मूँद दूँ [जिससे फिर सूर्य न आ सके और प्रातःकाल न हो] ॥ २ ॥ यही नहीं, यदि मैं देवताओंके वैद्य अश्विनीकुमारोंको बलपूर्वक ले आऊँ, तभी प्रभुका अनुचर कहलाऊँ । नीच मृत्युको मूषकके समान पटक दूँ और इस प्रकार सभीका पाप काट दूँ [फिर किसीको मरनेका ही भय न रहे] ॥ ३ ॥ प्रभो ! आपकी