भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 368

गीतावली ३६२ कृपा और आपहीके प्रतापसे मैं इन कार्योंमें तनिक भी देरी नहीं करूँगा। अतः हे तुलसीदासके स्वामी ! जिसके करनेसे मैं तुमको प्रिय लगूँ, वही आज्ञा दीजिये ॥ ४ ॥ [ ९ ] सुनि हनुमंत-बचन रघुबीर। सत्य, समीर-सुवन ! सब लायक, कह्यो राम धरि धीर ॥ १ ॥ चहिये बैद, ईस-आयसु धरि सीस कीस बलऐन। आन्यो सदनसहित सोवत ही, जौलौं पलक परै न ॥ २ ॥ जियै कुँवर, निसि मिले मूलिका, कीन्हीं बिनय सुषेन। उठ्यो कपीस, सुमिरि सीतापति, चल्यो सजीवनि लेन ॥ ३ ॥ कालनेमि दलि बेगि बिलोक्यो द्रोनाचल जिय जानि। देखी दिब्य ओषधी जहँ तहँ जरी, बेग न परि पहिचानि ॥ ४ ॥ लियो उठाय कुधर कंदुक-ज्यों, बेग न जाइ बखानि। ज्यों धाए गजराज-उधारन सपदि सुदरसनपानि ॥ ५ ॥ आनि पहार जोहारे प्रभु, कियो बेदराज उपचार। करुनासिंधु बंधु भेट्यो, मिटि गयो सकल दुख-भार ॥ ६ ॥ मुदित भालु-कपि-कटक, लह्यो कनु समर पयोनिधि पार। बहुरि ठौरही राखि महीधर आयो पवनकुमार ॥ ७ ॥ सेन सहित सेवकहि सराहत पुनि पुनि राम सुजान। बरषि सुमन, हिय हरषि प्रसंसत बिबुध बजाइ निसान ॥ ८ ॥ तुलसिदास सुधि पाइ निसाचर भए मनहु बिनु प्रान। परी भोरही रोर लंकगढ़, दई हाँक हनुमान ॥ ९ ॥ हनुमान्जीके ये वचन सुनकर रघुश्रेष्ठ भगवान् रामने धैर्य धारणकर कहा—'पवनन्दन ! तुम्हारा कथन सर्वथा सत्य है,