गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६३ लंकाकाण्ड तुम वास्तवमें यह सभी कुछ करनेमें समर्थ हो ॥ १ इस समय एक वैद्यकी आवश्यकता है। भगवान्की यह आज्ञा सिरपर रखकर बलशाली वानरराज, जितनी देरमें पलक भी न लगे इतनेहीमें एक वैद्यको उसके घरसहित सोते हुए ही उठा लाये ॥ २ ॥ उस सुषेण नामक वैद्यने विनयपूर्वक कहा—'यदि रात्रिके भीतर ही संजीवनी बूटी मिल सके तो कुंवर जीवित हो सकते हैं।' यह सुनते ही वानरेश्वर हनुमान्जी सीतापति भगवान् रामका स्मरण करते हुए उठे और संजीवनी बूटी लेनेके लिये चल दिये ॥ ३ ॥ उन्होंने मार्गमें कालनेमिको मारकर शीघ्र ही द्रोणाचलको देखा और उसे अपने चित्तसे ही पहचान लिया। वहाँ उन्होंने जहाँ-तहाँ बहुत-सी दिव्य ओषधियाँ देखीं; परंतु वे उस बूटीको न पहचान सके ॥ ४ ॥ तब उन्होंने उस पर्वतको गेंदके समान उठा लिया। उस समयके उनके वेगका वर्णन नहीं किया जा सकता। ऐसा जान पड़ता था, मानो गजराजका उद्धार करनेके लिये बड़ी शीघ्रतासे चक्रपाणि भगवान् विष्णु दौड़े जा रहे हों ॥ ५ ॥ इस प्रकार पहाड़को लाकर उन्होंने प्रभुको प्रणाम किया और वैद्यराजने लक्ष्मणजीकी चिकित्सा की [ इससे लक्ष्मणजी तत्काल सचेत हो गये]। तब करुणासागरभगवान्रामने भाईका आलिंगन किया और इससे उनके दुःखका सारा भार मिट गया ॥ ६ ॥ रीछ और वानरोंका दल भी ऐसा आनन्दित हुआ, मानो उसे संग्रामरूप समुद्रका पार मिल गया हो। तत्पश्चात्, हनुमान्जी उस पर्वतको जहाँ-का-तहाँ रख आये ॥ ७ ॥ उस समय सम्पूर्ण सेनाके सहित परम चतुर भगवान् राम बारंबार अपने सेवककी प्रशंसा करने लगे तथा देवतालोग भी