गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ३६४ पुष्पोंकी वर्षा कर, हृदयमें आनन्दित हो दुन्दुभी बजाते हुए उनकी बड़ाई करने लगे ॥ ८ ॥ तुलसीदास कहते हैं, इस समाचारको पाकर राक्षसगण तो मानो प्राणहीन हो गये । प्रातःकाल होते ही जब हनुमान्जीने हाँक लगायी तो लंकापुरीमें हाहाकार मच गया ॥ ९ ॥ राग केदारा [ १० ] कौतुक ही कपि कुधर लियो है। चल्यो नभ नाइ माथ रघुनाथहि, सरिस न बेग बियो है ॥ १ ॥ देख्यो जात जानि निसिचर, बिनु फर सर हन्यो हियो है। परचो कहि राम, पवन राख्यो गिरि, पुर तेहि तेज पियो है ॥ २ ॥ जाइ भरत भरि अंक भेंटि निज, जांवन दान दियो है। दुख लघु लषन मरम घायल सुनि, सुख बड़ो कीस जियो है ॥ ३ ॥ आयसु इतहि, स्वामि संकट उत, परत न कछू कियो है। तुलसिदास बिदरचो अकास, सो कैसेंकें जात सियो है ॥ ४ ॥ [अब पर्वत लाते समय मार्गमें जो घटना हुई उसका वर्णन करते हैं—] हनुमान्जीने खेलसे ही पर्वत उठा लिया और रघुनाथ- जीको सिर नवा आकाशमार्गसे चल दिये । उस समय उनके समान और किसीका वेग नहीं था ॥ १ ॥ उन्हें [अयोध्याके ऊपर होकर ] जाते देख भरतजीने राक्षस जानकर उनके हृदयमें बिना गाँसीका बाण मारा । तब वे 'राम' ऐसा कहते हुए गिर पड़े । पवनने [अयोध्याकी रक्षा करनेके लिये] पर्वतको रोक लिया, मानो नगरने उनका तेज पी लिया हो ॥ २ ॥ तब भरतजीने