गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५६ लंकाकाण्ड सुकृतियोंको जीत लिया। अब तुम्हारे बिना इस शरीरको रखकर मैंने लोकमें अपकीर्ति ही कमायी है॥ ३॥ अहो! मेरी प्रतिज्ञाकी तुम्हे यहां तक लाज है कि उसके लिये अपने प्रिय प्राणतक दे डाले हैं; इसीलिये यद्यपि शक्ति तो विभीषणके हृदयपर लगनेवाली थी, परंतु उसकी रक्षा करने लिये तुम उसकी ढाल बन गये!'॥ ४॥ प्रभुके ये वचन सुनकर रीछ, वानर और देवतागण शोकसे सूख गये। तुलसीदासजी कहते हैं, इसी समय ब्रह्मारूप हनुमान्जीने [ओषधिके सहित आकर] मानो उन्हें फिरसे नया बना दिया ॥ ५॥ राग सोरठा [६] मोपै तो न कछू ह्वै आई। ओर निबाहि भली बिधि भायप चल्यो लखन-सो भाई ॥ १ ॥ पुर, पितु-मातु, सकल सुख परिहरि जेहि बन-बिपति बँटाई। ता सँग हौं सुरलोक सोक तजि सक्यो न प्रान पठाई ॥ २ ॥ जानत हौं या उर कठोरतें कुलिस कठिनता पाई। सुमिरि सनेह सुमित्रा-सुतको दरकि दरार न जाई ॥ ३ ॥ तात-मरन, तिय-हरन, गीध-बध, भुज दाहिनी गवाई। तुलसी मैं सब भांति आपने कुलहि कालिमा लाई ॥ ४ ॥ 'हाय! मुझसे तो कुछ भी नहीं बना! आज लक्ष्मण-जैसा भाई भ्रातृत्वका अन्ततक अच्छी तरह निर्वाह करके चला गया ॥ १ ॥ जिसने नगर, पिता, माता और सब प्रकारके सुखत्यागकर मेरी वनकी विपत्तिको बँटाया था, उसके साथ मैं अपने प्राणोंको भी शोक त्याग- कर सुरलोक नहीं भेज सका! ॥ २॥ मालूम होता है, वज्रने भी